भगवद्गीता 16.18
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ||१६-१८||
ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ . māmātmaparadeheṣu pradviṣanto.abhyasūyakāḥ ||16-18||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध के वश में हो जाते हैं, वे स्वयं परमात्मा (भगवान) का द्वेष करने लगते हैं। ये पापी व्यक्ति न तो अपने शरीर की सच्चाई को जानते हैं और न ही दूसरों के भीतर उसी ईश्वर को देख सकते हैं, जिससे उनकी मानसिक शांति विनाशित हो जाती है। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जब मन पाँच बुराइयों में लिप्त होता है, तो व्यक्ति स्वतः ही भगवान के साथ वैरी बन जाता है और नरक की ओर बढ़ता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह शिक्षा 'संख्य' दर्शन के अंतर्गत आती है जो पांच पापों (पाँच क्लेश) पर आधारित मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है और उन्हें दूर करके 'मन की शुद्धि' की ओर ले जाता है। यह भक्ति योग का भी एक पहलू है, क्योंकि ईश्वर से द्वेष करना ही सबसे बड़ा पाप माना गया है जो आत्मा को मोक्ष के मार्ग से रोकता है। इसमें 'कर्म योग' का सिद्धांत प्रभावी होता है कि जब कर्ता अहंकारी होकर कार्य करता है, तो वह नष्टिकारक परिणामों की ओर जाता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश का हिस्सा है, जो अध्याय 16 में आता है। इससे पहले कृष्ण ने 'दैवी' और 'आसुरी' स्वभावों के विवरण दिए हैं कि कैसे दैवी गुण मुक्ति देते हैं जबकि आसुरी गुण बंधन डालते हैं। अर्जुन युद्ध से भ्रमित थे, लेकिन कृष्ण अब उन्हें स्पष्ट बता रहे हैं कि 'आसुर' स्वभाव के लोग पांच विशेष खराबीयों में फंसकर ईश्वर विरोधी हो जाते हैं। यह संवाद अर्जुन को सैनिक न होने से पहले एक आध्यात्मिक दृष्टि देने का कदम है कि असली शत्रु बाहर नहीं, बल्कि भीतर के पापों में निहित है।
आज के जीवन में
आज की दुनिया में जब कोई व्यक्ति ऑफिस या सोशल मीडिया पर अपनी ताकत और पदावन को दिखाकर दूसरों का अपमान करता है (दर्प), तो वह अहंकार के वश हो जाता है। यदि आप गुस्से में आकर किसी सहकर्मी या परिवार के सदस्य को कष्ट देते हैं, तो वास्तव में आप अपने भीतर की शांति और ईश्वर से दूरी बना रहे होते हैं। इस स्थिति का समाधान यह है कि निर्णय लेने से पहले खुद से पूछें: 'क्या मैं गुस्से या घमंड के कारण बोल रहा हूं?' यदि हाँ, तो तुरंत रुक जाएं और शारीरिक रूप में ईश्वर की उपस्थिति को पहचानकर विनम्रता अपनाएं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे एक बहुत ताकतवर लड़का दूसरे बच्चों को धक्का देकर कहता है कि 'मैं सबसे बेस्ट हूँ', वह डरावनी आवाज़ निकालता है या गुस्से में सबको मारने की बात करता है। अगर कोई ऐसा करे, तो उसकी दोस्तें और परिवज उसे प्यार नहीं करेंगी बल्कि नफरत करने लगेगा। कृष्ण भगवान कहते हैं कि जो लोग इतना घमंड करते हैं या गुस्से में आकर दूसरों को दुख देते हैं, वे असल में ईश्वर से दूर हो जाते हैं क्योंकि ईश्वर सबके दिल में प्यार और शांति रखता है।
दैनिक चिंतन
क्या आपने कभी महसूस किया है कि अहंकार, बल या क्रोध जैसे गुण हमें दूसरों से दूर कर देते हैं? जब हम इन विकारों में डूब जाते हैं, तो यह लगता है कि केवल 'मैं' ही सत्य हूँ और बाकी सब मेरे विरोधी। लेकिन भगवान कृष्ण बताते हैं कि ये भावनाएँ वास्तव में अंधेरा फैलाती हैं जो हमें अपने भीतर और दूसरों की आत्माओं में निवास करने वाले ईश्वर से द्वेष (दुश्मनी) का अनुभव कराने लगता है। आज इस जागरूकता के साथ जीएं कि जहाँ तक आपका क्रोध या घमंड बढ़ता है, वहां भगवान की प्रेम-भक्ति कम होती जाती है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में उठ रहे अहंकार, घमंड और क्रोध को पहचानें। जब भी इन भावनाओं का प्रभाव महसूस हो, स्वयं से पूछें कि क्या मैं दूसरों के शरीर या आत्मा में स्थित उस एक परमात्मा (भगवान) की उपस्थिति को अनदेखा कर रहा हूँ? इस पल को शांत भावनाओं और समर्पण के साथ व्यतीत करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- पाँच शत्रुओं का पहचानना
यह श्लोक पांच बड़े आध्यात्मिक बाधाओं—अहंकार, अति-बल, घमंड, काम और क्रोध—की सूची देता है जो मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। ये सभी गुण एकत्रित होकर व्यक्ति के धैर्य और बुद्धि का नाश करते हैं। - परनिन्दा और द्वेष का स्रोत
जब मनुष्य इन पाँच विकारों में फंस जाता है, तो वह स्वयं की आत्मा के साथ-साथ दूसरों की आत्माओं (परात्म) में निवास करने वाले ईश्वर का भी द्वेष करने लगता है। यह अहंकारित मन दूसरे को कम समझकर भगवान से वैमनस्य रखने वाला बन जाता है। - दानवीय और असुरी स्वभाव की स्पष्ट रेखा
इस श्लोक के माध्यम से गीता अस्पष्ट रूप में 'असुरी' प्रकृति (दैत्यिक गुण) को परिभाषित करती है जो दानवीय या पवित्र स्वभाव का विरोध करती है। यह समझना आवश्यक है कि इन पाँच दोषों से मुक्ति ही आत्म-साक्षात्कार की ओर पहला कदम है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 16.5 — इस श्लोक में 'द्वेष' (शत्रुता) को और स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जो वर्तमान श्लोक के विस्तार का एक अच्छा प्रस्तावना होगा।
- 16.2 — यह अगला श्लोक 'दानवी' (दैवी) गुणों की सूची देता है, जो 16.18 में वर्णित पाँच असुरी दोषों का विपरीत और संतुलन प्रस्तुत करता है।
- 3.7 — काम और क्रोध के नियंत्रण पर कृष्ण द्वारा दिए गए व्यावहारिक मार्गदर्शन को समझने के लिए यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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