भगवद्गीता 16.2

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.2 — "अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया,"
भगवद्गीता 16.2 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ||१६-२||

लिप्यंतरण

ahiṃsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam . dayā bhūteṣvaloluptvaṃ mārdavaṃ hrīracāpalam ||16-2||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि देवीय स्वभाव (दिव्य गुण) में नकारात्मक भावों का पूर्ण अभाव और सत्य, दया, और शांति जैसे धर्मिक गुण होते हैं। इस श्लोक में उन्होंने बारह मुख्य गুणों की सूची दी है जो एक आत्मा को उच्च स्थान पर ले जाते हैं और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। यह शिक्षा कहती है कि क्रोध, लोभ या निन्दा न करना केवल बाहरी नियम नहीं बल्कि जीवन में सच्चा सुख पाने का मार्ग है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग (Karma Yoga) के अंतर्गत आता है क्योंकि यह सही कार्यों की नींव, यानी 'सत्गुण' या पुण्यात्मक स्वभाव पर जोर देता है। इसमें ज्ञान और भक्ति का एक मिश्रण है कि यदि व्यक्ति अपने कर्मों को शुद्ध भावनाओं (जैसे दया और सत्य) से करे, तो वह मोक्ष की ओर बढ़ सकता है। यह सिखाता है rằng 'स्वरूप' या स्वभाव ही उस मूल आधार पर निर्भर करता है जिससे सभी आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है।

शब्दार्थ
अहिंसा harmlessness, सत्यम् truth, अक्रोधः absence of anger, त्यागः renunciation, शान्तिः peacefulness, अपैशुनम् absence of crookedness, दया compassion, भूतेषु in beings, अलोलुप्त्वम् noncovetousness, मार्दवम् gentleness, ह्रीः modesty, अचापलम् absence of fickleness
पारंपरिक भाष्य
Ahimsa Noninjury in thought, word and deed. By refraining from injuring living creatures the outgoing forces of Rajas are curbed. Ahimsa is divided into physical, verbal and mental. Satyam Truth Speaking of things as they are, without uttering unpleasant words or lies. This includes selfrestraint, absence of jealousy, forgiveness, patience, endurance and kindness. Akrodhah Absence of anger when insulted, ruked or beaten, i.e., even under the gravest provocation. Tyagah Renunciation -- literally, giving up giving up of Vasanas, egoism and the fruits of action. Charity is also Tyaga. This has already been mentioned in the previous verse. Santih Serenity of the mind. Apaisunam Absence of narrowmindedness. Daya Compassion to those who are in distress. A man of compassion has a tender heart. He lives only for the benefit of the world. Compassion indicates realisation of unity or oneness with other creatures. Aloluptvam Noncovetousness. The senses are not affected or excited when they come in contact with their respective objects the senses are withdrawn from the objects of the senses, just as the limbs of the tortoise are withdrawn by it into its own shell. Hrih It is shame felt in the performance of actions contrary to the rules of the Vedas or of society. Achapalam Not to speak or move the hands and legs in vain avoidance of useless action. Straightforwardness, noninjury, absence of anger, etc., are special alities of the Brahmanas. They are the Sattvic virtues which belong to them. Moreover --

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर स्थित भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश है, जो पांडवों के पक्ष में लड़ने से वंचित होकर उदास थे। इससे पहले श्लोक 16.1-2 में कृष्ण ने 'दैवी' और 'आसुरी' स्वभाव का विस्तृत वर्णन शुरू किया है ताकि अर्जुन के मन में भ्रम दूर हो सके। अर्जुन युद्ध की निष्ठुरता से घबराए हुए थे, इसलिए कृष्ण उन्हें बता रहे हैं कि एक योद्धा और मनुष्य दोनों रूपों में देवीय गुण अपनाने के बिना आत्म-ज्ञान नहीं मिल सकता।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप ऑफिस में किसी सहकर्मचारी द्वारा की गई गलती पर बहुत क्रोधित हैं और उन्हें सार्वजनिक रूप से चिढ़ाकर बताने का मन बना रहे हैं; इस श्लोक के अनुसार, आपको 'अक्रोध' (गुस्से का अभाव) और 'मार्दव' (कोमलता) को अपनाते हुए शांतिपूर्वक बात करनी चाहिए। यदि आप किसी नए प्रोजेक्ट में सफल होने की उम्मीद में दूसरों के संसाधनों पर लालची हो रहे हैं, तो 'अलोलुप्त्व' (लोभ का अभाव) आपको निष्पक्ष और कर्तव्यपूर्ण बनाता है। इस तरह के व्यवहार से न सिर्फ़ आपकी मानसिक चिंता कम होती है बल्कि आपके आसपास की वातावरण भी सकारात्मक बन जाता है, जो दीर्घकालिक कार्यक्षमता और रिश्तों को मजबूत करता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना कीजिए जैसे एक साफ़ और चमकता हुआ आइसक्रீम जो किसी को भी दुःख न दे, झूठ न बोलें और गुस्सा न करें; यही वह 'अच्छा स्वभाव' है। कृष्ण भैया कहते हैं कि अगर हम दूसरों की मदद करके खुश रहें, लालच छोड़ दें और शांति से बात करें, तो हमारे मन में एक प्यारा सा घर बनेगा जहाँ डर नहीं आता। जैसे आप अपने दोस्त के साथ खेलते समय उसका हक़ मानकर चलना सीखते हैं, वैसे ही जीवन में दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सबसे अच्छा काम है।

दैनिक चिंतन

आज आप अपने व्यवहार में दृष्टि रखें कि क्या आप किसी के प्रति क्रोधित हैं या निन्दा कर रहे हैं? जब भी मन को अप्रिय लगता है, तो उसे 'मार्दव' और 'लोलुपता' से मुक्त होने का अवसर दें। भगवान कृष्ण ने जो दैवीय गुण बताए हैं, वे आपके आत्मविश्वास और दूसरों के प्रति प्रेम को बढ़ाएंगे।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन पर एक बार विराम लें और देखें कि क्या आप अहिंसा, सत्य या क्रोध के बिना रह सकते हैं। इन पांच गुणों को ध्यान में लाकर अपनी सांसों को शांत करें और आंतरिक शान्ति की अनुभूति करने का प्रयास करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अहिंसा और सत्य का समन्वय
    सच्चाई बोलना आवश्यक है, लेकिन वह कठोरता से नहीं होनी चाहिए; अहिंसा के साथ सत्य की रक्षा करना ही दैवीय स्वभाव की पहली सीढ़ी है। जब क्रोध और निन्दा का त्याग किया जाता है, तो मन में एक शुद्ध आकाश तैयार होता है जहाँ प्रेम उठता है।
  2. दयालुता और मार्दव की शक्ति
    सभी जीवों के प्रति दया रखना और कोमल भाषा बोलने का अभ्यास (मार्दव) आपको दूसरों से जोड़ता है। यह गुण ईर्ष्या या लालच जैसे पापों को नष्ट करके आत्मिक शान्ति प्रदान करता है।
  3. लज्जा और अचंचलता का महत्व
    अपने कर्मों के प्रति 'लज्जा' (शरम या संयम) रखना और मन को स्थिर ('अचंचल') बनाना साधक की सबसे बड़ी संपत्ति है। यह गुण आपको विक्षेप से मुक्त करके परमात्मा में एकाग्रता प्रदान करता है।

विषय

दैवी स्वभाव (Divine Nature)कर्म और गुण (Karma and Virtues)मन की शांति (Mental Peace)सत्य और अहिंसा (Truth and Non-violence)क्रोध का निवारण (Control of Anger)आत्म-शुद्धि (Self-Purification)

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आगे पढ़ें

  1. 16.3 — इस श्लोक में बताए गए गुणों का विस्तृत वर्णन और दैवीय स्वभाव के अन्य पहलुओं को समझने के लिए अगला पदार्थ।
  2. 16.4 — दैवीय स्वभाव से भिन्न 'आसुरी' स्वभाव की विशेषताएं जानकर, आप अपने कर्मों में सुधार करने के लिए और स्पष्ट दृष्टि प्राप्त करेंगे।
  3. 12.15 — दयालु होने वाले (भूतमात्र का) भक्त को प्रिय मानने की बात करके, इस श्लोक के 'दया' भाग का दार्शनिक अर्थ गहरा होगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'अपैशुनम्' का क्या अर्थ है?
'अपैशुनम्' का शाब्दिक अर्थ है किसी की निन्दा या खराब बातें न करना। इसका तात्पर्य यह नहीं कि हमें चुप्पी साधनी चाहिए, बल्कि हमें दूसरों के बारे में झूठे या कड़वे शब्द बोलने से परहेज करके उन्हें सही राह दिखानी चाहिए। यह गुण मनुष्यों को नकारात्मकता और ईर्ष्या से मुक्त रखकर सामाजिक संबंधों को सुधारता है।
देवीय स्वभाव वाले व्यक्ति की पहचान कैसे करें?
देवीय स्वभाव वाला व्यक्ति न तो क्रोधित होता है, न ही लालची या आलसी; वह सत्य बोलता है और सभी जीवों के प्रति दयालु रहता है। ऐसे लोग अक्सर शांत चिंतन करते हैं, किसी की निन्दा नहीं करते और अपनी शर्तों पर निर्भर होते बिना दूसरों का सम्मान करते हैं। इनमें आत्म-सम्मान (ह्री) और स्थिर मनोदशा (अचापलम) भी होती है जो उन्हें जीवन के उतार-चढ़ाव में संयुक्त रखती है।
क्या यह श्लोक केवल युद्ध क्षेत्र या योद्धाओं के लिए है?
नहीं, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध की तैयारी में यह बताया था, लेकिन इन गूणों का उपयोग हर मनुष्य द्वारा जीवन भर करना चाहिए। ये गुण (जैसे सत्य, दया और शांति) किसी भी पेशे या स्थिति में मानसिक शांति और आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं। यह श्लोक युद्ध की रणनीति नहीं बल्कि जीवन जीने का एक नैतिक आधार है जो हर समय लागू होता है।
'अलोलुप्त्व' (न लालची होना) और 'त्याग' में क्या अंतर है?
'अलोलुप्त्व' का मतलब है किसी चीज के लिए अत्यधिक चाहत या लोभ न रखना, भले ही वह वस्तु आपके पास नहीं भी हो। जबकि 'त्याग' (Renunciation) का अर्थ है जो चीज़ आपने प्राप्त कर ली है उसे ईर्ष्या या मोह बिना त्याग देना या उसका उपयोग करने के लिए चिंतित न होना। दोनों गुण मिलकर एक व्यक्ति को वासनाओं से मुक्त और निष्पक्ष बनाते हैं।
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