भगवद्गीता 16.3
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ||१६-३||
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā . bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārata ||16-3||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि दैवी संपदा (देवीय गुण) वाले पुरुष के लक्षण तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, निर्द्वंद्वता और अभिमानी न होना है। यह श्लोक बताता है कि इन छह गुणों का अंगीकार करना ही मनुष्य को दानवीय स्वभाव से जोड़ता है। जब कोई व्यक्ति अपने भीतर इस प्रकार की पवित्रता लाता है, तो वह जीवन में उच्च आदर्शों के योग्य बन जाता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह शिक्षा 'कर्म योग' के तहत आती है जहाँ कर्त्ता का स्वभाव और मनोदशा (सात्विक गुण) कर्मों के परिणाम को निर्धारित करती हैं। यह संख्या सिद्धांत (Sankhya) की भावनाओं पर आधारित है कि 'दैवी संपदा' या देवीय प्रकृति वाला पुरुष ही मोक्ष और पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। यह विचार हमें बताता है कि केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि आंतरिक गुण (गुणात्मक स्वभाव) भी योग का मुख्य हिस्सा हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को बोला गया था, जब अर्जुनें ने विरोधियों की हत्या करने से इनकार कर दिया था। इससे पहले Krishna ने पांडवों और कौरवों के बीच धर्म और अधर्म का विस्तृत विश्लेषण किया है, जिसमें दैवीय और आसुरी स्वभाव के अंतर को स्पष्ट किया गया है। युद्ध की तंग स्थिति में जब संदेह था, तो यह श्लोक अर्जुन को उनके उच्चतम कर्म-धर्म (दैवी संपदा) की याद दिलाता है ताकि वे अपनी बाध्यताओं से मुक्त हो सकें।
आज के जीवन में
आज के तनावपूर्ण कार्यस्थल पर, जब कोई सहकर्मचारी आपकी गलती का कारण बनकर आपको चिढ़ाए भी, तो 'क्षमा' और 'धैर्य' (धृति) को अपनाएं बजाय गुस्से या प्रतिशोध की। यदि आपको किसी महत्वपूर्ण निर्णय के लिए आत्मविश्वास नहीं है, तो अपने मन में 'अद्रोह' (ईर्ष्या का अभाव) और 'नातिमानता' (गर्व का न होना) लाकर शांत चिंतन करें। यह दृष्टिकोन आपको मानसिक शान्ति देगा और एक विनम्र, लेकिन तेजस्वी नेतृत्व की ओर ले जाएगा जो वास्तव में सफलता की कुंजी है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारे अंदर एक चमकदार रोशनी (तेज) और बहुत बड़ा दिल (क्षमा) है जो हर किसी को माफ कर देता है। अगर कोई तुझसे झगड़े की बात करता है, तो तू शांत रहने वाले होना पसंद करते हैं, न कि गुस्सा करने वाले; यह दैवीय स्वभाव है। जैसे एक साफ कमरा (शौच) हमेशा खुशनुमा होता है, वैसे ही एक साफ-सुथरे और विनम्र मन वाला बच्चा सबसे ज्यादा प्यारा और सफल बनता है।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपने कभी महसूस किया है कि जब आपके भीतर सत्य और शांति होती हैं तो बाहरी दुनिया कैसे बदल जाती है? इस श्लोक के अनुसार, तेज, क्षमा और धैर्य जैसे गुण केवल अच्छे व्यवहार नहीं हैं, बल्कि वे आपकी आत्मा की दिव्यता का प्रमाण हैं। आज जब भी कोई चुनौती आए, तो कृपया गर्व या क्रोध को त्यागकर इन पवित्र संपदाओं में स्थिर होने का प्रयास करें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने भीतर उन पाँच गुणों की खोज करें—तेज, क्षमा, धैर्य, शौच और अद्रोह। जब आप इनमें से किसी एक का अनुभव करते हैं, तो उसे केवल एक क्रिया न समझकर अपनी आत्मा की शुद्ध प्रकृति का स्वरूप मानें।
मुख्य शिक्षाएँ
- दैवी संपदा की पहचान: तेज और क्षमा
भारत! कृष्ण भगवान बताते हैं कि दैवीय प्रकृति का सबसे बड़ा लक्षण 'अत्यंत उच्च स्तर की ऊर्जा (तेज)' और 'सभी को माफ करने की शक्ति (क्षमा)' है। ये दोनों एक साथ संतुलन बनाती हैं, जहाँ आत्म-विश्वास दुराग्रह नहीं बनता बल्कि सही कर्म के लिए प्रेरित करता है। - अधर्मी स्वभाव का अंत: धैर्य और शौच
कठिन परिस्थितियों में भी न टूटना (धैर्य) और मन व वाणी की शुद्धता बनाए रखना (शौच), दानवीय संपदा के अनिवार्य स्तंभ हैं। ये गुण व्यक्ति को बाहरी दुनिया से अलग नहीं, बल्कि उसे आंतरिक शांति और पवित्रता में जोड़ते हैं। - अद्रोह और निस्वार्थ भाव: गर्व का त्याग
दूसरों की संपत्ति या गुणों पर ईर्ष्या न करना (अद्रोह) और अत्यधिक घमंड से रहित होना, दैवीय स्वभाव के सर्वश्रेष्ठ परिचायक हैं। जब व्यक्ति गर्व का त्याग कर देता है, तो वह दूसरों की उन्नति में खुद को कभी बाधा नहीं मानता।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 16.2 — इस श्लोक में वर्णित दैवीय गुणों की सूची को समझने के लिए इससे पहले का यह श्लोक पढ़ें, जो इनके स्रोत और संख्या बताता है।
- 16.5 — दैवीय स्वभाव वाले व्यक्ति की भाग्यशाली स्थिति के बारे में जानने के लिए यह श्लोक पढ़ें, जो दैवी संपदा का परिणाम बताता है।
- 18.62 — अंत में इन सभी गुणों को प्राप्त करने और ईश्वर के चरणों में शरण लेने के लिए यह महत्वपूर्ण उपदेश पढ़ें।
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