भगवद्गीता 18.54
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति | समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||१८-५४||
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati . samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām ||18-54||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जब कोई साधक ब्रह्मत्व की स्थिति प्राप्त कर लेता है, तो उसका मन पूर्णतः प्रसन्न हो जाता है। ऐसे व्यक्ति न किसी बात पर शोक करता है और न ही भविष्य में कुछ पाने के लिए लालसा रखता है। वह समस्त जीवों को बराबर देखकर निष्पक्ष रहते हुए, ईश्वर की सर्वोच्च प्रेमपूर्ण भक्ति प्राप्त कर लेता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) की उच्चतम स्थिति 'ब्रह्माणि' को दर्शाता है जो कर्मयोग और भक्तियों का परिणामस्वरूप प्राप्त होती है। यह सिद्धांत बताता है कि जब आत्मा ब्रह्म के रूप में पहचान लेती है, तो द्वंद्व (दुख-सुख) समाप्त हो जाता है और समभाव (Samata) स्थापित होता है जो परम भक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया आखिरी और सशक्त संदेशों में से एक है, जो अध्याय 18 'मोक्षासन योग' का निष्कर्ष है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अर्जुन को समस्त धर्मों का त्याग करके केवल उनकी शरण लेने की आज्ञा दी थी और अब वे उन्हें उस स्थिति का वर्णन दे रहे हैं जहाँ व्यक्ति पूर्ण मुक्ति प्राप्त करता है। इस समय अर्जुन युद्ध करने से अनिश्चितता में था, लेकिन कृष्ण उसे बताते हैं कि आंतरिक शांति और समभाव ही सच्ची विजय की कुंजी है।
आज के जीवन में
मान लीजिए एक प्रमुख व्यावसायिक निर्णय लेने के बाद आपकी कंपनी में बड़े स्तर पर नुकसान हो गया, लेकिन 'ब्रह्मभूत' दृष्टि वाले व्यक्ति उस विफलता से शोक या निराशा अनुभव नहीं करेगा। इसके बजाय वह समस्त टीम और परिस्थितियों के प्रति समभाव बनाए रखते हुए तुरंत आगे की रणनीति पर ध्यान केंद्रित कर देगा। यह मानसिक स्थिति आपको चिंता मुक्त बनाकर ईश्वर में पूर्ण भक्ति और श्रद्धा स्थापित करने में सहायक होगी, जिससे आपका कार्य निष्ठा के साथ किया जाएगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे एक बहुत खुश और शांत व्यक्ति न तो किसी चीज़ के खोने से रोता है और न ही दूसरी कोई वस्तु पाने के लिए बेचैन होता है, वैसा ही ब्रह्मभूत मनुष्य भी होता है। वह अपने दोस्तों को याद करता है कि सभी जानवर एक जैसे हैं इसलिए उसे किसी पर गुस्सा नहीं आता और न ही उससे डर लगता है। जब हमारे मन में यह सुकून हो जाता है, तो हम ईश्वर से प्यार करने वाले सबसे अच्छे बने जाते हैं।
दैनिक चिंतन
प्यारे पाठक, क्या आप कभी सोचते हैं कि सुख और दुःख की इस दोलनशील लहर के बावजूद भी मन को कैसे स्थिर रखा जाए? यह पवित्र श्लोक आपको याद दिलाता है कि जब आप अपनी आत्मा में 'ब्रह्मभूत' हो जाते हैं, तो न कोई विपदा आपके हृदय को कांपाती है और न ही भविष्य की चिंता। असली शांति तभी मिलती है जब हम सभी प्राणियों के प्रति समभाव रखकर प्रेम की उस उच्चतम अवस्था में पहुँचते हैं, जो कृष्ण द्वारा दिए गए परम मार्ग का परिणाम है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को स्थिर रखने का अभ्यास करें, यह समझते हुए कि आपका सच्चा रूप ब्रह्म है। जब भी कोई दुख या इच्छा उठे, उसे स्वीकार करते हुए स्वयं को 'न शोक करता हूँ और न ही किसी चीज़ की आशा रखता हूँ' का संकल्प दोहरें। इस प्रसन्न अवस्था में सभी प्राणियों के प्रति समभाव (sama) बनाए रखने का ध्यान करें, जिससे आप ईश्वरीय भक्ति को अनुभव कर सकें।
मुख्य शिक्षाएँ
- ब्रह्मात्मकता और आनंद (Brahmabhūta)
जिस साधक को ब्रह्म की सत्ता में स्थापित हो जाना है, वह न तो विषयों के लिए शोक करता है और न ही लोभ से पीड़ित होता है। यह अवस्था मानसिक स्थिरता का परम चरम बिंदु है जहाँ दुख सुख की द्वैत भावना समाप्त हो जाती है। - सर्वभूतों में समभाव (Samaḥ sarveṣu bhūteṣu)
परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति के लिए सभी जीवित प्राणियों का दृष्टिकोण बराबर होता है; न कोई प्यारा और न ही किसी से घृणा। यह समभाव (sama) द्वेष, मोह या भेदभाव की भावनाओं से मुक्ति को दर्शाता है जो प्रेम के पूर्ण स्वरूप का आधार है। - परा भक्ति प्राप्त करना (Madbhaktiṃ labhate parām)
जब मन शोक और कामनाओं से मुक्त होकर समता में स्थित होता है, तभी मनुष्य ईश्वर की परा भक्ति को पा सकता है। यह केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा का उसकी उत्पत्ति स्रोत (कृष्ण) के साथ पूर्ण एकात्म होना है जो इस श्लोक में 'पराम्' या सर्वोच्च कहा गया है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग और फल की आस छोड़ने का मूल सिद्धांत देता है जो ब्रह्मभूत अवस्था के लिए आवश्यक आधार है।
- 3.30 — इसे पढ़कर समझें कि कृष्ण को समर्पित करके कर्म करने से मन कैसे स्थिर होता है और दुखों का अंत होता है।
- 12.15 — यह पढ़कर जानें कि भक्त (devotee) की कौन सी विशेषताएं होती हैं जो सभी को सुखी करने वाली और किसी से घृणा न रखने वाले होना चाहिए।
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