भगवद्गीता 6.5

Dhyana Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 6.5 — "मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्"
भगवद्गीता 6.5 — Dhyana Yoga
संस्कृत

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||६-५||

लिप्यंतरण

uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet . ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ ||6-5||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मनुष्य का उद्धार या पतन केवल उसी पर निर्भर करता है जो वह स्वयं करता है। इस श्लोक में कहा गया है कि आत्मा (मन और बुद्धि) ही व्यक्ति की सबसे बड़ी मित्रता भी कर सकती है और उसे नष्ट करने वाली शक्ति भी बन जाती है। यदि आप अपने मन को नियंत्रित करते हैं, तो यह आपके最好的 दोस्त बन जाता है; लेकिन अगर इसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो यह सबसे भयानक दुश्मन बन जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ध्यान योग के सारभूत सिद्धांतों में से एक है जो 'संज्ञान' (Self-realization) पर केंद्रित है और यह ज्ञान योग का भी प्रमुख हिस्सा है। इसमें आत्म-नियंत्रण को 'बन्धुत्व' या 'मित्रता' के रूप में दर्शाया गया है, जो सांख्य दर्शन की उस अवधारणा पर आधारित है कि मन और बुद्धि ही व्यक्ति का वास्तविक स्वामी हैं। यह सिखाता है कि मोक्ष प्राप्ति बाहरी कारकों से नहीं बल्कि आंतरिक शक्ति के सही उपयोग (Self-mastery) से संभव होती है।

शब्दार्थ
उद्धरेत् should raise, आत्मना by the Self, आत्मानम् the self, न not, आत्मानम् the self, अवसादयेत् let (him) lower, आत्मा the Self, एव only, हि verily, आत्मनः of the self, बन्धुः friend, आत्मा the Self, एव only, रिपुः the enemy, आत्मनः of the self
पारंपरिक भाष्य
Practise Yog. Discipline the senses and the mind. Elevate yourself and become a Yogarudha. Attain to Yoga. Shine gloriously as a dynamic Yogi. Do not sink into the ocean of Samsara (transmigration). Do not become a wordlyminded man. Do not become a slave of lust, greed and anger. Rise above worldliness, become divine and attain Godhead. You alone are your friend you alone are your enemy. The socalled worldly friend is not your real friend, because he gets attached to you, wastes your time and puts obstacles on your path of Yoga. He is very selfish and keeps friendship with you only to extract something. If he is not able to get from you the object of his selfish interest, he forsakes you. Therefore he is your enemy in reality. If you are attached to your friend on account of delusion or affection, this will become a cause of your bondage to Samsara. Friends and enemies are not outside. They exist in the mind only. It is the mind that makes a friend an enemy and an enemy a friend. Therefore the Self alone is the friend of oneself, and the Self alone is the enemy of oneself. The lower mind or the Asuddha Manas (impure mind) is your real enemy because it binds you to the Samsara, and the higher mind or the Sattvic mind (Suddha Manas or the pure mind) is your real friend, because it helps you in the attainment of Moksha.

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत युद्ध में कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहा है, जहाँ पांडवों की सेना को हरे-बेड़े का सामना करना पड़ा था। इस समय प्रकरण 6 'ध्यान योग' पर चर्चा कर रहे हैं, जिसमें कृष्ण ने पहले ही भगवान ब्रह्मा और अन्य गुरुओं के साथ अर्जुन की आत्मसंयम की बातचीत पूरी करने का संकेत दिया है। अर्जुन युद्ध से थक चुका है और अपनी भावनाओं में विचलित है, इसलिए कृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि बाहरी दुश्मनों के डरने के बजाय अपने मन को जीतना ही सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि एक प्रोफेशनल नौकरी में बहुत अधिक तनाव और अनिश्चितता का सामना कर रहा है, जिससे वह सोचने-समझने की क्षमता खो देती है और गलत निर्णय ले रही है। इस स्थिति में व्यक्ति को यह समझना होगा कि उसका भयावह मन ही उसके सबसे बड़े शत्रु के रूप में काम कर रहा है, जो उसे डर और निराशा में धकेल रहा है। यदि वह अपनी बुद्धि का उपयोग करके अपने विचारों पर नियंत्रण पा लेता है, तो वही 'आत्मा' (मन) उसका सबसे बड़ा मित्र बन जाएगा और समस्याओं को सुलझाने की शक्ति देगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

मान लो तुम्हारे पास एक जादुई पेंसिल है जो तुम्हारी शक्ति को बदल सकती है। अगर तुम उसका इस्तेमाल करके अच्छे काम करते हो, जैसे मदद करना या खेलना, तो वह पेंसिल तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त बन जाएगी और सब कुछ आसान होगा। लेकिन अगर तुम उसे मारने या बुरी चीजों के लिए उपयोग करते हो, तो वही पेंसिल तुम्हारे सबसे बड़े दुश्मन की तरह काम करेगी और मुसीबत खड़ी कर देगी। इस श्लोक का मतलब यह है कि 'आप' ही अपने जीवन के दोस्त या दुश्मन बनने वाले हैं, इसलिए हमेशा सोच-समझकर अच्छे फैसले लें।

दैनिक चिंतन

आज जब भी कोई चुनौती आए या आप थकान महसूस करें, तो यह समझें कि आपका स्वयं का आत्म-ज्ञान ही आपके सबसे बड़े मित्र के रूप में काम कर सकता है। यदि आप अपने विचारों और कार्यों पर नियंत्रण रखते हैं, तो वही 'आत्मा' जो आज शत्रु बनने की बात करता है, कल आपको ऊंचाइयों तक ले जाएगा। याद रखें कि यह संपूर्ण संघर्ष भीतर चल रहा है; आपकी दृढ़ता ही वह बल है जो आपको अधःपात से रोक कर उद्धार देगा।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने भीतर की आवाज़ को सुनते हुए यह स्वीकार करें कि आपका भविष्य आपके अपने हाथों में है। इस क्षण से, अपनी मनोदशा और कर्मों के माध्यम से खुद को ऊपर उठाएं, न कि नीचे गिरने दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. स्वायं उत्थान का कर्तव्य (Self-Elevation)
    गुरु या बाहरी सहायता केवल मार्गदर्शन कर सकते हैं, परंतु वास्तविक उद्धार की जिम्मेदारी पूरी तरह से व्यक्ति स्वयं पर है। प्रत्येक आत्मा को अपने कर्म और विचारों द्वारा अपना पतन रोकना चाहिए।
  2. आत्म-संबंध का द्वैध स्वरूप (Dual Nature of the Self)
    वही 'मैं' जो हमें बाध्य करता है, वही वह शक्ति भी है जो मुक्त करती है; यह निर्भर करता है कि आप इसका उपयोग कैसे करते हैं। यदि मन पर विजय पाई जाए तो आत्मा मित्र बन जाता है, और हार मान ली जाए तो ही शत्रु का रूप धारण करता है।
  3. मन की जीत (Victory of the Mind)
    ध्यान योग में सबसे बड़ी बाधा स्वयं के मन को समझना और उसे शांत करना है, न कि पर्यावरण या दूसरों को। जब आत्मा अपने आप से मित्र बनकर कार्य करती है, तभी वह धर्म की पथ पर सफलता प्राप्त करता है।

विषय

आत्म-नियंत्रण (Self-Control)मन की प्रकृति (Nature of Mind)ध्यान योग (Meditation Yoga)संयम और वैराग्य (Detachment and Restraint)जीवन का उद्देश्य (Purpose of Life)शत्रुता और मित्रता (Friendship and Enmity)

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  1. 6.34 — इसमें अर्जुन मन की कठोरता को व्यक्त करता हैं, जो स्व-उद्धार में सबसे बड़ी चुनौती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्लोक में 'आत्मा' शब्द से कौन-सा आत्म या देह का अर्थ है?
इस संदर्भ में 'आत्मा' का तात्पर्य मनुष्य के मन, बुद्धि और इच्छाओं से है जो उसके व्यवहार को नियंत्रित करती हैं। कृष्ण यह समझा रहे हैं कि यदि व्यक्ति अपने मन पर विजय प्राप्त करता है तो वह उसका सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इसी प्रकार, अगर मन का अध: पतन होता है और उसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो वही आत्मा शक्तिशाली दुश्मन के रूप में प्रकट होती है।
यदि हम अपने आप को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं, तो क्या यह अर्जुन का अपराध होगा?
भगवान कृष्ण यहाँ कोई दोषारोपण नहीं करते बल्कि केवल तथ्य बता रहे हैं कि मानव स्वभाव में ही इस दोगुनी क्षमता होती है। यह एक चेतावनी और मार्गदर्शन है कि यदि हम अपने मन को नहीं संभालेंगे, तो वह निश्चित रूप से हानिकारक साबित होगा। इसलिए यहाँ दोष का सवाल नहीं बल्कि जिम्मेदारी का प्रश्न उठता है कि व्यक्ति खुद अपनी ऊर्जाओं का उपयोग कैसे करेगा।
इस श्लोक के अनुसार जीवन में 'उद्धार' (Moksha) पाना कब संभव होता है?
जिस समय व्यक्ति अपने मन और इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, उसी क्षण वह आत्म-संयम के माध्यम से उद्धार की ओर बढ़ जाता है। यह तभी संभव है जब मनुष्य बाहरी सुखों या डरों में फंसने के बजाय अपनी बुद्धि का उपयोग करके सही मार्ग चुनता है। इस प्रकार, 'उद्धार' एक आंतरिक प्रक्रिया है जो स्व-अध्यात्म और मानसिक शांति से प्राप्त होती है।
क्या यह श्लोक केवल संतों या योगियों के लिए है या आम लोगों के लिए भी?
नहीं, यह श्लोक सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से लागू होता है क्योंकि मन की प्रवृत्ति हर इंसान में पाई जाती है। चाहे व्यक्ति कोई साधारण कार्यकर्ता हो या गहरे ध्याने वाले योगी, उसे अपने विचारों और क्रोध पर नियंत्रण रखना होगा ताकि वह दुश्मन से मित्र बना सके। इसलिए यह जीवन का एक सामान्य सिद्धांत है जो हर किसी के लिए प्रासंगिक है।
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