भगवद्गीता 16.5
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता | मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ||१६-५||
daivī sampadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā . mā śucaḥ sampadaṃ daivīmabhijāto.asi pāṇḍava ||16-5||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मानवीय स्वभाव दो प्रकार के होते हैं: दैवी (देवताओं जैसा) और आसुरी (राक्षसी). वे स्पष्ट करते हैं कि दैवी गुणों का परिणाम मोक्ष या मुक्ति है, जबकि आसुरी गुण बंधन में फंसाते हैं. कृष्ण अर्जुन को तुरंत कहते हैं कि उन्हें शोक करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे स्वभाव से ही दैवी संपदा प्राप्त कर चुके हैं.
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक वेदांत के द्वैत-संकल्पना और गुणों (सात्त्विक, राजसी, तामसी) के सिद्धांत पर आधारित है. यह कर्म योग का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रस्तुत करता है कि सही कार्यान्वयन स्वभाव की शुद्धता से जुड़ा होता है और अंतिम लक्ष्य बंधन-मुक्ति (जोड़ या मुक्त होना) निर्धारित करता है.
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को समझाया गया था. इससे ठीक पहले कृष्ण ने पांडवों और उनके सैनिकों का सामना करने वाले दुर्योधन की सेना का विस्तृत वर्णन किया था, जिसमें आसुरी गुण दिखे थे. अर्जुन युद्ध के भय और भ्रम में डूबे हुए थे, लेकिन कृष्ण ने उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि वे स्वभाव से ही उत्तम (दैवी) हैं.
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप कार्यस्थल पर किसी गंभीर निर्णय को लेकर अनिश्चितता और तनाव में हैं. इस श्लोक का सीधा उपयोग यह है कि जब भी आपको लगता है कि वातावरण या लोग नकारात्मक (आसुरी) हो रहे हैं, तो अपनी आंतरिक संपदा पर ध्यान दें. यदि आप ईमानदार, दयालु और जिम्मेदार कार्य कर रहे हैं, तो यह 'दैवी' स्वभाव का संकेत है जो आपको अंत में मुक्ति या सफलता की ओर ले जाएगा.
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे दो तरह के बीज होते हैं: एक सुंदर फूल देने वाला और दूसरा कांटों वाला. भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो लोग अच्छे काम, दयालुता और सच बोलने वाले होते हैं (दैवी), वे हमेशा खुश रहेंगे और मुक्त होंगे. तुम अर्जुन जैसे हो, यानी तुम्हारे भीतर वही 'अच्छे बीज' हैं जो फूल खिलाने का काम करेंगे, इसलिए घबराओ मत.
दैनिक चिंतन
आज आप शोक या निराशा में क्यों पड़ते हैं? क्या क्योंकि आपको लगता है कि आपके पास अच्छे स्वभाव की कमी है? भगवान ने स्पष्ट किया है कि दैवीय गुण मोक्ष के लिए और आसुरी बंधन का कारण बनते हैं। चिंता करना छोड़ दें, क्योंकि आपने पहले ही एक उत्तम पृष्ठभूमि (दैवी सम्पदा) प्राप्त कर ली है जो आपको उच्च गति पर ले जाने वाली है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपनी आंतरिक प्रकृति को पहचानें और सोचें कि क्या आपका विचार मोक्ष की ओर ले जा रहा है या बंधन में डुबो रहा है। भगवान कृष्ण के वचनों पर ध्यान करते हुए, यह स्वीकार करें कि आपके भीतर दैवीय गुणों का उदय हुआ है और इससे मुक्ति प्राप्त होगी।
मुख्य शिक्षाएँ
- सम्पदा का सार: मोक्ष बनाम बंधन
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि 'सम्पदा' (प्रकृति या गुण) दो प्रकार की होती हैं; एक मुक्ति के लिए और दूसरी जन्म-मरण के चक्र में फंसाने वाली। दैवी सम्पदा स्वतंत्रता की ओर ले जाती है जबकि आसुरी प्रकृति बंधन का कारण बनती है। - आत्मविश्वास और निराशा का अंत
भगवान ने पांडव (अर्जुन) से 'म शूचः' यानी चिंता न करें, कहा है क्योंकि वे दैवी गुणों को प्राप्त कर चुके हैं। यह सिखाता है कि जब हमारे भीतर अच्छे स्वभाव का उदय हो जाता है, तो डर और दुख की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। - दैवीय गुणों की प्राप्ति
श्री कृष्ण बताते हैं कि दैवी सम्पदा एक विलक्षण उपहार है जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए आधारभूत है। यह मानने का समय नहीं है कि हम में सुधार संभव नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि हमारे भीतर मोक्ष की क्षमता विद्यमान है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 16.24 — इस श्लोक में आचार-विचार और शास्त्रों के महत्व पर चर्चा की गई है जो दैवीय गुणों को निखारने का मार्ग दिखाता है।
- 18.42 — यह श्लोक दैवी सम्पदा के विशिष्ट स्वभावों जैसे संतोष, क्षमा और सात्विक कर्म को परिभाषित करता है।
- 7.15 — इसमें आसुरी प्रकृति वाले लोगों के व्यवहार का वर्णन किया गया है जो दैवीय मार्ग से भटक जाते हैं और बंधन में फंस जाते हैं।
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