भगवद्गीता 16.4

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.4 — "हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।"
भगवद्गीता 16.4 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च | अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ||१६-४||

लिप्यंतरण

dambho darpo.abhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca . ajñānaṃ cābhijātasya pārtha sampadamāsurīm ||16-4||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि दम्भ (दोष), दर्प, अभिमान, क्रोध और कठोरता जैसे गुण आसुरी या राक्षसी प्रकृति का संकेत देते हैं। यह श्लोक उन पाँच मुख्य बुराइयों की पहचान करा रहा है जो एक व्यक्ति को नैतिक रूप से गिरने में मदद करती हैं और अज्ञान (अविद्या) के साथ मिलकर उसे विनाश की ओर ले जाती हैं। इसका मूल सिद्धांत यह है कि यदि कोई इन गुणों का अनुसरण करता है, तो वह 'आसुरी सम्पदा' या राक्षसी धन में जी रहा होता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'द्विविधा प्रकृति' (Divine and Demonic Natures) के सिद्धांत पर आधारित है जो भगवद् गीता की सान्ख्या और कर्म योग दर्शन का हिस्सा है। यह बताता है कि मानवीय चरित्र दो ध्रुवीय शक्तियों में विभाजित होता है: एक जो आत्मा (Atman) को पहचानती है और दूसरी जो अज्ञान (Avidya) के कारण पदार्थिक दुनिया में बंधी रहती है। यह ज्ञान योग का आधार बनाता है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने स्वभाव की जांच कर सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

शब्दार्थ
दम्भः hypocrisy, दर्पः arrogance, अभिमानः selfconceit, च and, क्रोधः wrath, पारुष्यम् harshness, एव even, च and, अज्ञानम् ignorance, च and, अभिजातस्य to the one born for, पार्थ O Partha, सम्पदम् state?,आसुरीम् demoniacal
पारंपरिक भाष्य
Dambha Hypocrisy. To pretend to be what one is not, to pretend to be religious and pious. It consists of bragging of ones own greatness. Religious hypocrisy is the worst form of hypocrisy. Hypocrisy is a mixture of deceit and falsehood. Those who boast about their own merits will get demerit only. Darpa Arrogance. Pride of learning, wealth, high connection, etc. An arrogant man cannot endure to see his fellowmen happy. He is more and more enraged at the fortune of his fellowmen in the matter of learning, happiness and prosperity. Parushyam (in speech) To speak of the blind as having lotuslike eyes, of the ugly as beautiful, of a man of low birth as one of high birth and so on, usually with an ulterior, selfish or evil motive. Ajnanam Ignorance, misconception of ones duties. An ignorant man is blind as to what should be done and what should not be done. There is absence of discrimination. Just as a child will put anything it gets in its hands into its mouth, whether it is clean or dirty, so also is the condition of the ignorant man who is not able to discriminate between the Real and the unreal, the good and the evil, virtue and vice. He is on the path of destruction. He does not know the road that leads to Moskha or liberation. He is drowned in the ocean of this worldly existence. These are the six demonical alities. These evil alities constitute the satanic or demonical wealth. They are obstacles on the path of liberation. By addressing Arjuna as Partha? Lord Krishna implies that Arjuna has no demonical alities in him as he is born in a noble family and is the son of Pritha. People of Asuric nature have no faith. They dispute every doctrine. They deny the existence of God. They deny the cycle of the worldprocess, the Vedas and the laws of ethics. Sensual indulgence is their goal. They rob people and take away their neighbours wives. They kill people ruthlessly. They do not believe in reincarnation and in the other world. They have no idea of right conduct, purity and selfrestraint. Asuras are those persons who have waged war and who still wage war with the gods in heaven. Those who are endowed with Asuric tendencies or evil alities are Asuras or demons. They exist in abundance in this iron age. Kamsa was an Asura. Hiranyakasipu was an Asura. Even a man of university alitifactions and titles is a veritable Asura if he is endowed with evil tendencies or Asubha Vasanas. Esoterically, the war between the Asuras and the gods is the internal fight that is ever going on between the pure and the impure tendencies in man, between Sattva and RajasTamas.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत की कुरुक्षेत्र युद्ध भूमि पर स्थित है जहाँ अर्जुन ने भीष्म पिताmahim और अन्य गुरुओं के खिलाफ हथियार उठाने से इनकार कर दिया था। इस संदेह और दुख का समाधान करते हुए श्री कृष्ण, जो अब धर्मसंघ (धर्मराज) के सलाहकार हैं, अर्जुन को दो प्रकार की प्रकृतियाँ—दैवीय और आसुरी—बता रहे हैं। यह संवाद तब हो रहा है जब अर्जुन अपनी भूमिका से अनिश्चित थे और कृष्ण उन्हें स्पष्ट रूप देकर उनके मन में उठे विचारों की जांच करा रहे थे।

आज के जीवन में

क्या आपने महसूस किया है कि काम पर कोई प्रमोशन मिलने के बाद आपके ऊपर अहंकार आ गया और आपको लगता है कि दूसरे कर्मचारी बेकार हैं? यह श्लोक बताता है कि 'दम्भ' (झूठा दिखावा) या क्रोध में गुस्सा होना, भले ही आप सफल हों, एक आसुरी प्रकृति की ओर संकेत करता है। आज के समय में अगर हम किसी को गलती करने पर तुरंत डांटने के बजाय सहानुभूति दिखाते हैं और अपनी सफलता का घमंड नहीं करते, तो हम दैवीय गुणों वाले बन सकते हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे एक बच्चा बहुत ज्यादा घमंड करे और दूसरों को झुकने पर मजबूर कर दे; यह अच्छा नहीं लगता, न? कृष्ण भगवान बताते हैं कि अहंकार करना (अभिमान), जल्दी गुस्सा आना (क्रोध) या किसी से खराब व्यवहार करना (पारुष्य) बुरे तरीके के हैं। जैसे अगर कोई फल बहुत सड़ा हो तो वह खाया नहीं जा सकता, वैसे ही ये बुरे गुण एक अच्छी इंसानियत को नष्ट कर देते हैं।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, क्या आपने हाल ही में किसी बात पर घमंड किया है या दूसरे को दुखी करने के लिए कठोर शब्द बोले हैं? भगवान श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि ये स्वभाविक आसुरी गुण नहीं बल्कि विनाश की ओर ले जाने वाले रास्ते हैं। आज का दिन इस संकल्प से शुरू करें कि आप अपनी वाणी और मानसिकता को इन कठोर भावों के स्थान पर दयालु और स्पष्ट बनाएंगे।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में उठने वाले अहंकार, घमंड और क्रोध के क्षणों को विनम्रता से पहचानें। इन पाँच शत्रुओं—दम्भ, दर्प, अभिमान, कठोर वाणी और अज्ञान—को देखकर अपने हृदय में शांति की ओर ध्यान लगाएं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. आसुरी गुणों की पहचान
    यह श्लोक पाँच मुख्य आसुरी प्रवृत्तियों—दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध और पारुष्य का वर्णन करता है जो मनुष्य को उसके वास्तविक धर्म से दूर ले जाते हैं। इन गुणों की पहचान करना ही आत्म-परिवर्तन की पहली और आवश्यक सीढ़ी है।
  2. कठोरता का प्रभाव
    यहाँ 'पारुष्य' या कठोर वाणी को विशेष रूप से उजागर किया गया है, जो दर्शाती है कि अज्ञान के कारण हम दूसरों पर अन्याय करते हैं। जब मन में क्रोध और घमंड होता है, तो नैतिकता का विनाश हो जाता है।
  3. अज्ञान की जड़
    इन सभी बुरे गुणों के मूल में 'अज्ञान' या अविद्या होती है, जो हमें यह नहीं समझने देती कि हम वास्तव में क्या हैं। जब तक अज्ञान दूर नहीं होता, तब तक आसुरी प्रकृति का पालन जारी रहता है।

विषय

आसुरी प्रकृति (Demonic Nature)नैतिकता और चरित्र निर्माणक्रोध का नियंत्रणअहंकार के परिणामगुणों की पहचानज्ञान और अज्ञान

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आगे पढ़ें

  1. 16.5 — इसके बाद यह पढ़ें जो बताता है कि आसुरी स्वभाव वाले लोग संसार के सृष्टि की वास्तविक प्रकृति को नहीं जानते।
  2. 16.23 — यह श्लोक यह समझाता है कि जो व्यक्ति शास्त्रों का विधि-विधान न मानकर अपनी इच्छाओं के पीछे भागते हैं, उनके लिए मोक्ष नहीं होता।
  3. 18.42 — अंत में इस अध्याय को पढ़ें जो बताता है कि दैवीक गुणों का अर्जित करना और कर्म योग के द्वारा स्वभाव की शुद्धि कैसे करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्लोक 16.4 में 'पारुष्य' शब्द का क्या मतलब है?
'पारुष्य' का शाब्दिक अर्थ कठोरता या क्रूरता से बोलना और व्यवहार करना है। इसमें किसी के प्रति निष्ठुर वाणी, दूसरों को तंग करने की प्रवृत्ति और दयाहीन स्वभाव शामिल हैं जो आसुरी लक्षण माने जाते हैं।
क्या क्रोध हमेशा बुरा होता है? गीता में इसका क्या विचार है?
गीता के अनुसार, यदि क्रोध अज्ञान और अभिमान से उत्पन्न होकर दूसरों को नुकसान पहुँचाए या तर्कहीन हो जाए, तो यह पूर्णतः आसुरी माना जाता है। कृष्ण बताते हैं कि नियंत्रित नहीं होने वाला क्रोध ज्ञान को मिटा देता है और विनाश की ओर ले जाता है।
क्या दम्भ (दोष) हमेशा बुरे इरादे से जुड़ा होता है?
जी हाँ, 'दम्भ' का अर्थ है दिखावा करना या झूठा प्रदर्शन करना जो आंतरिक शुद्धता की अनुपस्थिति को दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति अपनी कमियों छिपाकर बाहर से भली भांति दिखने की चेष्टा करता है, तो वह गीता के अनुसार दैवीय सत्य के विरुद्ध होता है और आसुरी प्रकृति का लक्षण बन जाता है।
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