भगवद्गीता 3.7

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.7 — "परन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का "
भगवद्गीता 3.7 — Karma Yoga
संस्कृत

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन | कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ||३-७||

लिप्यंतरण

yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate.arjuna . karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ||3-7||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति मन की सहायता से अपने इन्द्रियों को नियंत्रित कर ले, फिर भी कर्मों में आसक्ति (लगान) के बिना शरीर द्वारा कार्य करता है, वही सबसे उत्तम और श्रेष्ठ माना जाता है। यह वर्ग अर्जुन को बता रहा है कि बहिष्करण या इन्द्रियों का त्याग करना ही पर्याप्त नहीं है; सच्चा योगी वह है जो कर्मों में लगे रहते हुए भी मन से मुक्त हो। इसमें 'कर्मयोग' की श्रेष्ठता पर जोर दिया गया है जहाँ कार्य तो किया जाता है लेकिन फल के लिए कोई चिंता या आसक्ति नहीं होती।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक मुख्य रूप से 'कर्म योग' (The Path of Action) के सिद्धांत को स्थापित करता है, जो सांख्य दर्शन और ज्ञान योग की समझ पर आधारित होता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बाहरी इन्द्रियों का त्याग करना ही कर्मयोग नहीं है; वास्तविकता में मन से आसक्ति (मोक्ष) को हटाकर, इन्द्रियों के माध्यम से कार्य करने की स्थिति ही 'विशिष्ठ' या उत्कृष्ट योगी कहलाती है। यह दर्शन अर्जुन और हमें सिखाता है कि कर्म त्याग नहीं, बल्कि कर्मों में लगन का रूप बदलना चाहिए।

शब्दार्थ
यः whose, तु but, इन्द्रियाणि the senses, मनसा by the mind, नियम्य controlling, आरभते commences, अर्जुन O Arjuna, कर्मेन्द्रियैः by the organs of action, कर्मयोगम् Karma Yoga, असक्तः unattached, सः he, विशिष्यते excels
पारंपरिक भाष्य
If anyone performs actions with his organs of action (viz., hands, feet, organ of speech, etc.) controlling the organs of knowledge by the mind, and without expectation of the fruits of the actions and without egoism, he is certainly more worthy than the other who is a hypocrite or a man of false conduct. (Cf. II.64?68IV.21).The five organs of knowledge are the eyes, the ears, the nose, the skin and the sense of taste (tongue).

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहा है, जहाँ पांडवों की सेना खड़ी है और अर्जुन अपने ही रिश्तेदारों को देखकर द्रवित हैं। अर्जुन ने युद्ध करने का विचार त्याग दिया था और कृष्ण ने उन्हें सांख्य योग (ज्ञान) के माध्यम से समझाया कि आत्मा न मरती है, लेकिन फिर भी वे निराश थे। इस श्लोक में कृष्ण अपनी बात को प्रत्यक्ष करके बताते हैं कि ज्ञानी होने पर भी संसार और अपने कर्तव्य को छोड़कर चले जाना उचित नहीं; बल्कि मन की वशीकरण के साथ युद्ध (कर्म) करना ही सच्चा मार्ग है।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं और आपको बहुत तनाव हो रहा है क्योंकि परिणाम आपके भविष्य को निर्धारित कर सकता है। इस स्थिति में, 'कर्मयोग' का अर्थ यह नहीं कि आप काम करना बंद करें या मन से हट जाएं; बल्कि आप अपने दिमाग (मन) की मदद से घबराहट और डर को नियंत्रित करते हैं। फिर भी अपनी पूरी ऊर्जा देते हुए कर्मों में लगे रहें, लेकिन यह सोचकर नहीं कि 'परिणाम क्या होगा', बल्कि सिर्फ इस बात पर ध्यान दें कि आपने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है या नहीं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

अर्जुन, कल्पना करो कि तुम्हारे पास एक जादूई ब्रॉच (इन्द्रियाँ) हैं जो हर तरफ देखने और छूने के लिए तैयार रहते हैं। यदि तुम अपने दिमाग से उन्हें शांत कर लेते हो और फिर खेल या काम करते हुए भी सिर्फ आनंद में लगे होते, बिना यह सोचे कि 'जीत कब मिलेगी', तो वह सबसे बड़ा खिलाड़ी बन जाएगा। जैसे कोई खिलौने की दुकान पर जाता है लेकिन केवल अपने दोस्तों को मुस्कुराते देखकर खुश होता है और कुछ लेता नहीं है, वैसे ही जो व्यक्ति बिना लालच किए कर्म करता है, वही सबसे श्रेष्ठ योद्धा या विद्यार्थी बन सकता है।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, क्या कभी महसूस किया है कि मन इन्द्रियों के पीछे भागता रहने से हम शांत नहीं हो पाते? अर्जुन को संदेश दिया गया कि जब आप मन का वश में करके भी अपनी गतिविधियाँ बिना स्वार्थ के करते हैं, तो वास्तविक श्रेष्ठता प्राप्त होती है। आज की दौड़दौड़ी में इस बात को याद रखें कि बाहरी कर्मों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह आंतरिक अनुशासन है जो आपको निष्काम बनाए रखेगा।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए अपने मन को इन्द्रियों पर शासन करने का संकल्प लें। इस श्रद्धा से कि आप जो भी कार्य कर रहे हैं, वह ईश्वर की पूजा है, बिना किसी फल की आकांक्षा किए उसमें पूर्णतः जुट जाएँ।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. मन पर इन्द्रियों का शासन
    यह श्लोक बताता है कि कर्मयोग की शुरुआत मन को विषय-वस्तुओं से वश में करके ही संभव होती है। जब तक मन अशांत और इन्द्रिय-प्रधान होता है, तब तक वास्तविक आत्मनियंत्रण नहीं हो सकता।
  2. कर्मयोग की श्रेष्ठता
    जो व्यक्ति बिना किसी फल की लालसा के (आसक्ति रहित) अपने कर्तव्य को निभाता है, वह अन्य लोगों से अधिक उन्नत और विशिष्ट माना जाता है। यह बाहरी तपस्वी या ज्ञानी होने से भी अधिक महत्वपूर्ण मार्ग दर्शाता है।
  3. नासक्ति के साथ कर्म
    कर्म करने का अर्थ इसमें न तो त्याग करना है और न ही निष्क्रिय हो जाना, बल्कि इन्द्रियों को दबाकर सक्रिय रूप से कार्य करना। 'आसक्त' (बिना लगन या स्वार्थ के) होने की स्थिति में कर्म करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक योगी है।

विषय

कर्मयोग (Karma Yoga)इन्द्रिय निग्रह (Control of Senses)मन की शांति (Peace of Mind)आसक्ति का त्याग (Renunciation of Attachment)कर्तव्य पालन (Duty Execution)योगी की श्रेष्ठता (Excellence in Yoga)

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  1. 2.47 — यह अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक इसी विचार का आधार है कि आप अपने कर्तव्यों में समर्थ हैं, लेकिन फलों के प्रति आसक्त नहीं होने चाहिए।
  2. 3.30 — इसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को सभी कर्मों का समर्पण करने की विधि बताते हैं, जो इस श्लोक में वर्णित निष्काम भावना को गहरा करते हैं।
  3. 12.15 — यह पाठ उन गुणों का वर्णन करता है जिनसे एक योगी सभी के लिए सुखद होता है, जो कि मन और इन्द्रियों पर विजय पाने की परिणति है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या इस श्लोक का मतलब यह है कि हमें इन्द्रियों (आंख, कान आदि) को बंद करके रहना चाहिए?
नहीं, इसका अर्थ इन्द्रियों को बांध लेने या उन्हें नकार देना नहीं है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि मन की सहायता से इनसे नियंत्रण (निग्रह) किया जाए, ताकि वे हमें विचलित न कर सकें। फिर भी, एक योगी को अपने शारीरिक कार्य और इन्द्रियों का उपयोग करना चाहिए, लेकिन बिना किसी आसक्ति के।
'अनसक्त' होने से क्या तात्पर्य है? क्या इसका मतलब निष्क्रिय हो जाना है?
'असाक्त' का अर्थ यह नहीं कि कोई कार्य न करें या समाज में रहें। बल्कि इसका मतलब यह है कि आप किसी कर्म को करते समय उसके परिणाम (फल) के लिए चिंतित न हों और उसमें लालच न रखें। एक व्यक्ति पूरी तरह से काम कर सकता है लेकिन मन से उसे त्यागकर, जैसे फसल काटने वाले किसान जो सिर्फ मेहनत करता है और भविष्य की उम्मीद में नहीं रहता।
क्या केवल ज्ञानी पुरुष ही कर्मयोग कर सकते हैं या साधारण लोग भी?
यह श्लोक बताता है कि यदि कोई व्यक्ति मन की सहायता से इन्द्रियों को वश में करता है, तो वह श्रेष्ठ माना जाता है। यह केवल ज्ञानी लोगों के लिए नहीं बल्कि किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए है जो आत्म-नियंत्रण और कर्मयोग का अभ्यास करने की चेष्टा कर रहा हो। गीता कहती है कि इस मार्ग पर चलने से ही मनुष्य वास्तव में 'विशिष्ठ' (श्रेष्ठ) बन पाता है, चाहे वह अभी ज्ञानी न हो।
मन और इन्द्रियों के बीच का संबंध क्या है और इसे कैसे नियंत्रित किया जाता है?
इंद्रियां बाहरी दुनिया को प्राप्त करने की प्रवृत्ति रखती हैं, जबकि मन (अंतरात्मा) इन सभी कर्ताओं पर शासन करता है। श्लोक में 'मनसा नियम्य' का उल्लेख यह सिखाता है कि यदि आप अपने विचारों और मन को स्थिर कर लेते हैं, तो इन्द्रियों के वश होना बंद हो जाता है। इस प्रकार, मन की शांति ही बाहरी दुनिया में होने वाले अशांत कार्यों का सबसे प्रभावी नियंत्रण है।
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