भगवद्गीता 16.17
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ||१६-१७||
ātmasambhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ . yajante nāmayajñaiste dambhenāvidhipūrvakam ||16-17||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग केवल अपने आप को ही श्रेष्ठ मानते हैं, वे गर्व और धन-मान की मद से भ्रष्ट हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति शास्त्रों में वर्णित विधि का पालन किए बिना, केवल दिखावे या नाममात्र के यज्ञ करते हैं ताकि दूसरों पर प्रभाव डाल सकें। यह श्लोक बताता है कि अहंकार और दम्भ से किये गए धार्मिक कार्य भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकते बल्कि मनुष्य का पतन कारण बनते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक कर्म योग के सिद्धांतों पर आधारित है जो स्पष्ट करता है कि कार्य की शुद्धता उसके फल या उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसकी प्रेरणा (निष्काम भाव) और शास्त्रविधि का पालन करने में निहित होती है। यह आसुरी स्वभाव के कारणों को 'ज्ञान' के अभाव और 'अहंकार' की अवस्था के रूप में चिंतित करता है जो भगवान कृष्ण द्वारा निर्धारित नियमों से विचलित होता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र पर स्थित है, जहाँ धर्मराज पार्थ (अर्जुन) संकट और द्वंद्व में फंसे हुए थे। इस समय श्री कृष्ण अर्जुन को 'दैव-आसुरी संपदा विभाग योग' के माध्यम से समझा रहे हैं कि किस प्रकार का स्वभाव मनुष्य को उन्नत बनाता है और किसका पतन करता है। अर्जुन ने कृष्ण की भगवान होने पर शंका व्यक्त करने या अपने कर्मों में संदेह के कारण, कृष्ण अब उनके विपरीत स्वभाव (आसुरी) को स्पष्ट कर रहे हैं ताकि वे युद्ध के लिए तैयार हो सकें।
आज के जीवन में
क्या आपने देखा है कि किसी सहकर्मी या नेत्री व्यक्ति जो टीम की सफलता पर ध्यान देने के बजाय सिर्फ अपने नाम का प्रचार करने और दिखावे में व्यस्त रहते हैं, वे असली समस्याओं को हल नहीं कर पाते। आज के समय में यदि कोई बिना शास्त्रों या नैतिक नियमों का पालन किए सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्टिंग करके 'धार्मिक' बनने की कोशिश करता है, तो वह अंततः अपने आप और दूसरों के साथ धोखा देता है। हमें चाहिए कि चाहे कोई भी कार्य करें (चाहे दान हो या सेवा), उसका उद्देश्य दिखावा न बल्कि सच्ची श्रद्धा और नियमों का पालन करना हो।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो किसी स्कूल में ऐसे दोस्त हों जो सिर्फ इसलिए नाटक करते हैं क्योंकि उन्हें सबकी तारीफ मिले, भले ही वे असली मेहनत न करें या नियम तोड़ें। ठीक वैसे ही, कुछ लोग धर्म के नाम पर बड़े-बड़े त्योहार मनाते हैं ताकि दूसरे उनकी प्रशंसा करें, लेकिन उनका दिल नहीं लगता और वे कानूनों का भी पालन नहीं करते। असली अच्छाई तभी होती है जब हम बिना किसी दिखावे के सच्चे मन से कुछ कर देते हैं।
दैनिक चिंतन
प्रिय मित्र, क्या आप कभी महसूस करते हैं कि आपके धर्म या पूजा केवल दिखावे के लिए हो रही है? जब हम अपने को श्रेष्ठ मानकर दूसरों से ऊपर खड़े होते हैं, तो वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है। भगवान कृष्ण बताते हैं कि असली यज्ञ वह नहीं जो सिर्फ नाममात्र का हो या दम्भ के साथ किया जाए, बल्कि वह है जो शास्त्रों की विधि और निश्चल चित्त से होता है। आज इस बात को गहराई से सोचें: क्या आपकी साधना में 'मैं' कर्ता बन गया है, या ईश्वर का अहंकार ही सब कुछ बना हुआ है?
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में उठने वाले 'मैं' के अहंकार को पहचानें। जब भी धन या मान की बात आती है, तो देखें कि क्या वह आपको गर्व से भर देता है? श्रद्धा और विनय का भाव रखकर ईश्वर को समर्पित करें कि मैंकेवल एक साधक हूँ, न कि स्वयं परम।
मुख्य शिक्षाएँ
- अहंकार की जड़ से बांधे गए आत्मसम्मान
जब व्यक्ति अपने आप को श्रेष्ठ (ātmasambhāvitāḥ) मानने लगता है, तो वह वास्तविक गुरु या शास्त्रों के मार्गदर्शन में अटका रह जाता है। यह आत्म-अहंकार इंसान को स्तब्ध और कठोर बना देता है, जिससे उसे अपनी कमियों का बोध ही नहीं होता। - दम्भपूर्ण यज्ञ: नाममात्र की साधना
श्रद्धा या विधि के बिना किए गए यज्ञों को दंब (dambha) कहा जाता है, जो सिर्फ दिखावे और समाज में शोहरत पाने का माध्यम बन जाते हैं। भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि शास्त्रविधि से रहित ये पूजाएं वास्तविक आध्यात्मिक लाभ नहीं देतीं बल्कि केवल अहंकार को पोषित करती हैं। - धन और मान का मद: पतन की शुरुआत
संपत्ति (dhana) और प्रतिष्ठा (māna) के आने से मनुष्य में एक विचित्र 'मद' पैदा होता है जो उसे बुद्धिहीन बना देता है। यह मद व्यक्ति को इतना अंधा कर देता है कि वह ईश्वर की शक्ति और अपने आप को छोटा मानने वाली वास्तविक गति से वंचित रह जाता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 16.7 — इस श्लोक का पूर्ववर्ती बिंदु जहां दैवी संपदा के गुणों की चर्चा होती है और यह समझने में मदद करता है कि अहंकार कैसे मानसीक अवस्था को खराब कर देता है।
- 16.23 — यह श्लोक बताता है कि जो व्यक्ति शास्त्रों की विधि का उल्लंघन करता है और दम्भ में जीता है, उसका पतन निश्चित होता है, जिससे इस अध्याय का सारांश स्पष्ट हो जाता है।
- 3.16 — सही आचरण और कर्म योग की प्रकृति को समझने के लिए यह श्लोक आवश्यक है, जो दिखावटी यज्ञों के विपरीत निस्वार्थ भाव से किए गए कर्म का महत्व बताता है।
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