भगवद्गीता 16.7

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.7 — "आसुरी स्वभाव के लोग न प्रवृत्ति को; जानते हैं और न निवृत्ति को उनमें न शुद्धि होती है, न सदाचार और न"
भगवद्गीता 16.7 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ||१६-७||

लिप्यंतरण

pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca janā na vidurāsurāḥ . na śaucaṃ nāpi cācāro na satyaṃ teṣu vidyate ||16-7||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि असुर स्वभाव वाले लोग न करने योग्य और न त्यागने योग्य कार्य की सही पहचान कर पाते हैं। ऐसे लोगों में न तो पवित्रता है, न ही अच्छा चरित्र या सत्य का भाव होता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि बिना मार्गदर्शन के ज्ञान और संस्कारों से वंचित व्यक्तियों का जीवन अराजक हो जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह शिक्षा 'कर्म योग' और 'ज्ञान योग' के सिद्धांतों पर आधारित है, जहाँ कर्तव्य (dharma) की सही पहचान बिना आत्म-विश्लेषण के असंभव मानी गई है। यह बताता है कि जब अहंकार और मोह जैसे 'आसुरी' तत्व मन को प्रभावित करते हैं, तो बुद्धि का नष्ट हो जाना (मोहापहार) होता है जो भगवत गेता के सनात्मक दृष्टिकोण में दुख की मूल जड़ है।

शब्दार्थ
प्रवृत्तिम् action, च and, निवृत्तिम् inaction, च and, जनाः men, न not, विदुः know, आसुराः the demoniac, न not, शौचम् purity, न not, अपि also, च and, आचारः (right) conduct, न not, सत्यम् truth, तेषु in them, विद्यते is
पारंपरिक भाष्य
The demoniacal do not understand the nature of action and inaction (right abstinence). The idea of a Self apart from the body, doing nothing (actionless) but imply watching the play of the Gunas is something incomprehensible to them. They have no consideration for the interest of others. They work for the sake of their bodies or sensual enjoyment. They are greedy, selfish and cruel. Therefore, they have neither good conduct nor good behaviour. They are untruthful, unjust and impure. They do not know what actions they should do in order to attain the goal of life or end of human existence, nor from what actions they should refrain to ward off,evil. Those who are endowed with demoniacal alities are sunk in the mire of ignorance. They are totally ignorant of what is prescribed or what is prohibited action. They have not the least idea of what purity or cleanliness is. Their actions are crooked. They know neither right Pravritti nor right Nivritti. They have no idea of virtue or vice or of scriptural injunctions or prohibitions. They will never speak loving words. They are hypocrites and liars.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध की भूमि कुरुक्षेत्र पर स्थित होशियार ब्रह्मास्त्र युक्ति (महाभ्यास) के दौरान हुआ, जहाँ पांडव सेना और कौरव सेना आमने-सामने खड़ी थीं। इस समय अर्जुन ने भीष्ण पितामह पर सैन्य विरत करने का निर्देश दिया था जिससे उन्हें गुरु की हत्या में भागदौड़ महसूस हुई, और वे निराश होकर युद्ध से मुक्त होने के लिए कृष्ण को प्रार्थना कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उत्पन्न हुए संदेहों का समाधान देते हुए 'दैवी' (divine) और 'आसुरी' (demonic) स्वभावों के विवरण की शुरुआत की, जो इस श्लोक में अपने चरम पर है।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि एक आधुनिक कार्यस्थल पर कोई कर्मचारी अपनी नीति को तोड़कर झूठ बोलने या छलांग मारने का रास्ता चुनता है, जो उसे तुरंत फायदा दे सकता है। ऐसे व्यक्ति न यह जान पाते हैं कि क्या करना चाहिए (प्रवृत्ति) और क्या छोड़ना चाहिए (निवृत्ति), क्योंकि उनके मन में सत्य या पवित्रता नहीं होती। परिणामस्वरूप, वे अस्थिर निर्णय लेते हैं जो टीम के कामयाबी को नष्ट कर देता है और खुद की आत्म-सम्मान को ध्वस्त करता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

बच्चों, कल्पना करें जैसे एक ऐसा खिलौना जो सही दिशा में नहीं चलता या टूट चुका है; उसे ठीक करना मुश्किल होता है। इस श्लोक के अनुसार, जब हमारे मन और व्यवहार में 'असुर' (बुरे) गुण आ जाते हैं, तो हमें पता ही नहीं चलता कि क्या सही काम करें या कौन सा छोड़ दें। जैसे अच्छी सीखने से बच्चे संतुलित होते हैं, वैसे ही शुद्ध और सत्य के बिना जीवन में उलझन ही रहती है।

दैनिक चिंतन

आज आपने शायद महसूस किया होगा कि कभी-कभी हमारे अहंकार या क्रोध की स्थिति में हम सत्य और शुद्धि से दूर हो जाते हैं, ठीक उस प्रकार जैसा आसुरिक स्वभाव वाले लोग करते हैं। यह भयानक है जब न तो प्रवृत्ति (उचित कर्म) का मार्ग दिखता है और न ही निवृत्ति (अन्याय से विलोपन) की समझ रहती है, जिससे हमारा अस्तित्व संघर्षपूर्ण हो जाता है। लेकिन याद रखें कि यह स्वभाव स्थिर नहीं है; आप हर क्षण अपने भीतर सत्य और आचार को पुकारकर इस 'आसुरिक' गति से मुक्त हो सकते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में देखें कि क्या आपके कर्म प्रवृत्ति (सही दिशा) की ओर हैं या निवृत्ति (अहंकार और अज्ञानता) से भरे हुए हैं। एक क्षण के लिए रुककर स्वयं से पूछें: 'क्या मेरी यह गति शुद्धि, सदाचार और सत्य पर आधारित है?' इस अनुशासन को अपने भीतर स्थापित करने का संकल्प लें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. प्रवृत्ति और निवृत्ति का अज्ञान
    यह श्लोक बताता है कि आसुरिक स्वभाव वाले व्यक्ति सही कर्म करने (प्रवृत्ति) या गलत कर्म से हटने (निवृत्ति) की वास्तविक समझ नहीं रखते। वे अज्ञान के घनघोर बादलों में फंसे होते हैं, जिसके कारण उन्हें यह भी स्पष्ट रूप से समझ नहीं आता कि क्या करना चाहिए और क्या त्यागना चाहिए।
  2. शुद्धि, सदाचार और सत्य का अभाव
    आसुरिक प्रकृति की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उनमें न तो मनोवैज्ञानिक या आध्यात्मिक शुद्धता होती है, न ही समाज के लिए उचित व्यवहार (अचार) और न ही सत्य। इनकी कृत्यें विनाशकारी हैं क्योंकि वे आधारभूत मूल्यों से वंचित होते हैं जो जीवन को संरक्षित करते हैं।
  3. मन की शुद्धि का महत्व
    कृष्ण यह समझाते हैं कि बाहरी कर्म तभी फलदायी हो सकते हैं जब आंतरिक रूप से मन और बुद्धि में सत्य, शौच (शुद्धता) और अच्छे चरित्र की नींव मजबूत हो। यदि इनका अस्तित्व नहीं है, तो कोई भी कर्म भगवान के प्रति समर्पण या मोक्ष की ओर ले जाने वाला नहीं बन सकता।

विषय

आत्म-विश्लेषण (Self-inquiry)नैतिकता और सत्य (Morality and Truth)कर्म का ज्ञान (Knowledge of Action)चरित्र निर्माण (Character Building)मोह की अवस्था (State of Delusion)दैवी बनाम आसुरी स्वभाव

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आगे पढ़ें

  1. 16.24 — इसके बाद यह श्लोक पढ़ें जो बताता है कि शास्त्रों का निर्देश हमारे कर्म और त्याग के लिए मार्गदर्शक क्यों होना चाहिए, क्योंकि आसुरिक स्वभाव वाले इसका अज्ञान रखते हैं।
  2. 18.42 — यह श्लोक पढ़ें जो सत्त्व गुण (दिव्य स्वभाव) के लक्षणों, जैसे दम और साधुओं का आचरण को विस्तार से बताता है, जिससे यह समझ आए कि शुद्धि कैसे प्राप्त की जाए।
  3. 13.8 — यह श्लोक ज्ञान और अज्ञान के भेद को स्पष्ट करता है; आसुरिक स्वभाव वाले अज्ञानी हैं, इसलिए यह पढ़कर समझें कि सत्य कैसे प्राप्त हो सकता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' से क्या तात्पर्य है?
'प्रवृत्ति' का अर्थ है कार्य करना या आगे बढ़ना, जबकि 'निवृत्ति' का अर्थ है त्याग करना या पीछे हटना। असुर स्वभाव वाले लोग न सही कर्म करने की समझ रखते हैं और न ही गलत कर्मों को छोड़ने की क्षमता।
क्या यह श्लोक केवल बुरे लोगों के लिए है या सभी मनुष्यों पर लागू होता है?
यह विशेष रूप से उन व्यक्तियों का वर्णन करता है जिनके मन में 'आसुरी' गुण (अहंकार, क्रोध, मोह) प्रबल हैं। हालाँकि, यह सभी मनुष्यों के लिए एक चेतावनी भी है कि यदि वे अपनी बुद्धि को संस्कारों से नहीं जोड़ते तो वे इस स्थिति में आ सकते हैं।
क्या शुद्धि (शौच) का अर्थ केवल शारीरिक सफाई से होता है?
नहीं, यहाँ 'शौच' या शुद्धि का अर्थ मन की पवित्रता और आत्म-स्वच्छता है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक व्यक्ति अपने चित्त को संसार के बुरे प्रभावों से नहीं साफ करता, वह सही मार्गदर्शन प्राप्त नहीं कर सकता।
भगवान कृष्ण अर्जुन को इस श्लोक में क्या सीखने का आदेश दे रहे हैं?
कृष्ण अर्जुन से यह समझने के लिए कह रहे हैं कि युद्ध या किसी भी निर्णय में सत्य और नैतिकता की अनुपस्थिति मानसिक उलझन पैदा करती है। उन्हें 'दैवी' स्वभाव को अपनाने का आदेश दिया गया है ताकि वे जीवन में स्पष्ट दृष्टि रख सकें।
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