भगवद्गीता 16.8

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.8 — "वे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से "
भगवद्गीता 16.8 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ||१६-८||

लिप्यंतरण

asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram . aparasparasambhūtaṃ kimanyatkāmahaitukam ||16-8||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में दानवी स्वभाव वाले लोग कहते हैं कि यह जगत ईश्वर रहित है और इसका कोई सत्य आधार या नैतिक मानदंड नहीं है। वे मानते हैं कि पुरुष और स्त्री के बीच के कामुक संबंधों (काम) से ही ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है, इसके अलावा किसी अन्य उद्देश्य की आवश्यकता नहीं है। भगवान कृष्ण स्वयं को जानने वाले लोगों द्वारा इन विचारकों के इस नष्ट करने वाले दार्शनिक सिद्धांत को प्रस्तुत कर रहे हैं जो ईश्वर और धर्म का खंडन करते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक वेदान्त के 'अस्तित्वादिक' (Existentialist) विचारधारा का खंडन करता है जो ईश्वर को नकारता है, और इसे कर्म योग ज्ञान के संदर्भ में समझा जा सकता है। यह दार्शनिक सिद्धांत विकारों (अविद्या) से उत्पन्न होने वाले 'निष्ठाहीन' (atheistic/nihilistic) विचार को उजागर करता है जो आत्मा और परम सत्य की उपेक्षा करता है। कृष्ण इस माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि ज्ञान के बिना, केवल काम या लालच एक व्यक्ति को नष्ट करने वाला मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

शब्दार्थ
असत्यम् without truth, अप्रतिष्ठम् without (moral) basis, ते they, जगत् the world, आहुः say, अनीश्वरम् without a God, अपरस्परसम्भूतम् brought about by mutual union, किम् what, अन्यत else, कामहैतुकम् with lust for its cause
पारंपरिक भाष्य
They hold that the universe is without any substratum or support or an undying basic reality. This is a description of the opinion of atheists like the Charvakas and other materialists. They do not believe in the existence of Brahman Who is the support of this world. They do not even accept the existence of an Isvara in this world. They say We are unreal. Therefore this world also is unreal, the scriptures which declare the truth are also unreal. What else but lust can be the cause of this universe Sexual passion is the sole cause of all living creatures. There is no such thing as the theory of Karma. The whole world is caused by the mutual union of man and woman under the impulse of lust. There is neither virtue nor vice. There is no Lord Who dispenses the fruits of actions of the individuals according to virtue and vice. Dharma and Adharma are not the basis of this world. Sexual desire is the sole basis for this universe. This world is a world of chance. They are not endowed with the faculty of introspection. They are ignorant of the field (Nature) and knower of the field (God).Mutual union Sexual union it may mean the union of atoms. The world arose from the combination of atoms according to the Vaiseshikas.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई उपदेशों का हिस्सा है, जहाँ वे पांडवों और कौरवों के बीच संघर्ष की तैयारी कर रहे हैं। इससे पहले (श्लोक 16.7-9) में कृष्ण ने दानवी स्वभाव वाले लोगों को पहचानने का वर्णन किया है, जो ईश्वर और आध्यात्मिक सत्य के अस्तित्व से इनकार करते हैं। यह संवाद तब हो रहा है जब अर्जुन युद्ध में अपने ही कौटुंबिक बंधनों को मारने की चिंता में थे, और कृष्ण उन्हें दानवी मानसिकता का विरोध करके सही धर्म के रास्ते पर लाना चाह रहे हैं।

आज के जीवन में

आज के आधुनिक जीवन में कई लोग कामयाबी या सुख को प्राप्त करने के लिए नैतिक सीमाओं की अवहेलना करते हुए कहते हैं कि 'सब कुछ सिर्फ पैसा कमाने और भोग-विलास का खेल है, ईश्वर या सत्य का कोई महत्व नहीं।' इस श्लोक का उपयोग करके आप अपनी दैनिक नीतियों पर विचार कर सकते हैं: क्या आपके कार्यालय में फैले हुए अनैतिक निर्णयों को 'काम' (लालच) के कारण सिद्धांत मान लिया गया है? जब भी कोई कठिन फैसला लेना हो, यह याद रखें कि ईश्वर-विहीन और नैतिक आधार रहित जीवन अस्थायी और दुखदायी होता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि अगर कोई कहे कि 'इस घर में कोई माता-पिता नहीं है, यह बिल्डिंग अपने आप पत्थरों से बन गई है,' तो क्या तुम उससे सहमत होओगे? दानवी लोग वही सोचते हैं; वे कहते हैं कि ईश्वर (जैसे एक अच्छे परिवार का माता-पिता) नहीं है और सब कुछ सिर्फ शारीरिक इच्छाओं से हुआ है। भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि असलियत में ब्रह्मांड का कोई सच आधार और ईश्वर जरूर है, जो हमें अच्छे रास्ते पर चलने के लिए संकेत देता है।

दैनिक चिंतन

आज के भागदौड़ भरे जीवन में हमारा मानना बन सकता है कि सब कुछ संयोग से हुआ और कोई नियंता नहीं है, लेकिन गीता कहती हैं कि यह दृष्टि असत्य और अंधकारपूर्ण है। जब आप अपने कर्मों को ईश्वर की इच्छा के साथ जोड़ते हैं, तो वह 'कामना-हेतुक' (केवल काम) वाले जगत् से मुक्त होकर दिव्यता का अनुभव करते हैं। याद रखें कि असली सुरक्षा और शांति तभी मिलती है जब हम इस विश्वास को अपना लेते हैं कि सब कुछ एक अलौकिक शक्ति के संरक्षण में चल रहा है।

आज के लिए एक अभ्यास

जब भी मन को यह विचार आए कि भगवान नहीं हैं और केवल कामनाएं ही सब कुछ हैं, तो गहरी सांस लें। स्वयं से पूछें: 'क्या मेरा विश्वास अज्ञान पर आधारित है या दिव्य ज्ञान पर?' इस क्षण में ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करते हुए अपने मन को शांत करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. असत्य का आधार: ईश्वर रहित दृष्टि
    दुर्गुण युक्त व्यक्ति यह मानकर भटकते हैं कि ब्रह्मांड में कोई निश्चित सत्य या दिव्य नियंता नहीं है। यह नकारात्मक विचारधारा मनुष्य को ईश्वर के प्रति श्रद्धा से वंचित कर देती है और उसे केवल भौतिक वास्तविकता तक सीमित रखती है।
  2. सृष्टि का कारण: केवल कामना
    जब ईश्वर को हटा दिया जाता है, तो सृष्टि की उत्पत्ति का एकमात्र कारण 'काम' (इच्छा) और भौतिक संबंध मान लिया जाता है। यह दृष्टिकोण जीवन के गहरे उद्देश्य को नकारता है और उसे केवल संयोगों व इन्द्रिय-सुख तक सीमित कर देता है।
  3. अविश्वास का परिणाम: अनादर
    जो लोग 'न ईश्वर' और 'न सत्य' मानते हैं, वे न तो धर्म के नियमों को समझ पाते हैं और न ही अपने कर्मों की गंभीरता का बोध रखते हैं। यह अज्ञान अवस्था मनुष्य को संसार में एक असुर (दुष्ट) प्रकृति का मार्ग दिखाती है, जहाँ कोई आश्रय नहीं होता।

विषय

दानवी स्वभाव (Demonic Nature)ईश्वर का अस्तित्व (Existence of God)नैतिक आधार और धर्म (Moral Basis and Dharma)काम लालच की भूमिका (Role of Lust/Kama)आध्यात्मिक अज्ञान (Spiritual Ignorance)जीवन का उद्देश्य (Purpose of Life)

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आगे पढ़ें

  1. 16.24 — इस श्लोक के बाद, भगवान आदेश देते हैं कि शास्त्रों की ओर से निर्देशित होना ही कल्याण का कारण है।
  2. 7.19 — यह श्लोक बताता है कि कैसे एक महान आत्मा अंततः सभी को परमेश्वर के रूप में देखना सीखती है, जो विपरीत दृष्टि का समाधान है।
  3. 18.56 — यह श्लोक बताता है कि भगवान की कृपा से ही मनुष्य सभी दोषों और अज्ञान से मुक्त होकर दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर सकता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या दानवी लोग ईश्वर को स्वीकार नहीं करते?
हाँ, इस श्लोक के अनुसार दानवी स्वभाव वाले व्यक्ति 'अनीश्वर' (ईश्वर रहित) मानते हैं और सृष्टि की उत्पत्ति में किसी दिव्य नियंत्रण या ईश्वरीय योजना को स्वीकार नहीं करते। वे जगत को सिर्फ सामग्री के संयोग से हुआ समझते हैं, जिसमें कोई आध्यात्मिक अर्थ या उद्देश्य नहीं होता।
'कामहेतुक' का क्या अर्थ है और यह जीवन पर कैसे असर डालता है?
'कामहेतुक' का अर्थ है कि 'काम (लालच या भोग)' ही जगत के चलने की एकमात्र वजह है। जब लोग इस विचार को अपना लेते हैं, तो वे नैतिक बाधाओं से मुक्त होकर केवल अपनी इच्छाएं पूरी करने में लग जाते हैं, जिससे उनके जीवन और समाज दोनों का पतन होता है।
क्या यह श्लोक सिर्फ धर्म की बात करता है या दार्शनिक भी?
यह श्लोक गहरा दार्शनिक विरोध करता है क्योंकि इसमें जगत के अस्तित्व का कारण (कारण-प्रभाव) और ईश्वर के सत्ता को खारिज किया गया है। यह नैतिक आधार की अनुपस्थिति पर चर्चा करके दर्शाता है कि कैसे एक विचारधारा आदमी को धर्म से दूर ले जा सकती है, जो ज्ञान योग का हिस्सा है।
इस श्लोक में 'अप्रतिष्ठ' (apraṭiṣṭha) शब्द क्या संकेत करता है?
'अप्रतिष्ठ' का अर्थ है बिना किसी मजबूत आधार के या ढीला। कृष्ण बता रहे हैं कि ईश्वर और धर्म को नकारने वाले विचार 'अस्थिर' (unstable) होते हैं क्योंकि उनका कोई सार्वभौमिक सत्य आधार नहीं है जो उन्हें टिकाऊ बनाए रखे।
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