भगवद्गीता 16.16

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.16 — "अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह जाल में फँसे तथा विषयभोगों में आसक्त ये लोग घोर, अपवित्र नरक म"
भगवद्गीता 16.16 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः | प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ||१६-१६||

लिप्यंतरण

anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ . prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake.aśucau ||16-16||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग विभिन्न प्रकार के भ्रम और मोह में फंस जाते हैं, वे वास्तविक सत्य से दूर होकर केवल शारीरिक सुखों की लालच में जीने लगते हैं। ये व्यक्ति अपनी बुद्धि खो देते हैं और काम (इच्छाओं) के आसक्त बन कर गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे 'अशुचि' या घोर नरक की स्थिति में पहुँच जाते हैं, जो मूल रूप से अज्ञान और पाप का प्रतीक है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह उपदेश वेदांत के सत्य-ज्ञान (Jnana Yoga) की धारा में निहित है और कर्मयोग के सिद्धांतों पर आधारित है कि कर्म का फल भोगने वाला व्यक्ति स्वयं अपने कर्मों से बंधता है। यह 'अविद्या' या अज्ञान को दूर करने के लिए मोह (illusion) की प्रकृति और कामनाओं (kama bhogaeshu) पर नियंत्रण पाने की आवश्यकता पर जोर देता है, जिससे आत्मा का उद्धार संभव हो सके।

शब्दार्थ
अनेकचित्तविभ्रान्ताः bewildred by many a fancy, मोहजालसमावृताः entangled in the snare of delusion, प्रसक्ताः addicted, कामभोगेषु to the gratification of lust, पतन्ति (they) fall, नरके into hell, अशुचौ foul
पारंपरिक भाष्य
Just as a man utters many incoherent words when he gets delirium or high fever, so also these diabolical men prattle about their desires, sensual enjoyment, etc. They commit,countless sins and so they fall into a foul hell such as the Vaitarani. Delusion is a snare because those who are deluded are entrapped. They are caught like fish in the meshes of the net of delusion. They are enveloped by the net on four sides. They are bewildered as to what to do first and what next. As they are enveloped or covered by delusion, they are bewildered in various ways by entertaining various evil thoughts. They have no discrimination between the proper or beneficial and improper or harmful Sadhanas. The lack of the knowledge of the distinction between these two is Moha. As Mohas is a veil and a cause of bondage it is compared to a net. All the alities mentioned above lead to downfall.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का हिस्सा है, जहाँ वे पांडवों की ओर से और दुर्योधन के विरोध में खड़े हैं। इससे पहले, कृष्ण ने 'दायसुरि' (दैवीय और आसुरी) स्वभावों का विस्तृत वर्णन किया था ताकि अर्जुन को समझाया जा सके कि पाप करने वाले लोग किस तरह के मानसिक अवस्था में होते हैं। कृष्ण इस श्लोक में उन लोगों की बुरी आदतों और उनके परिणाम का जिक्र कर रहे हैं जो दैवीय गुणों को त्यागकर अंधकारमयी लालच में जीते हैं, ताकि युद्ध के लिए तत्पर होने वाले अर्जुन को सही दिशा मिले।

आज के जीवन में

आज की दुनिया में एक उदाहरण हो सकता है जहाँ कोई व्यक्ति नौकरी या बिज़नेस में तेजी से धन कमाने के चक्कर में अपनी ईमानदारी और परिवार को पूरी तरह भूल जाता है। वह लगातार नए प्लान, ब्याजों और बेचारे विकल्पों (anekacittavibhranta) में फंसता रहता है और अंततः लालच के जाल (mohajala) में कैद होकर कर्ज़ या अवैध तरीकों का सहारा लेने पर मजबूर होता है। यह स्थिति मानसिक शांति को नष्ट कर देती है, जिससे व्यक्ति गहरा तनाव और पश्चाताप महसूस करता है, जो आत्मक रूप से एक 'नरक' जैसा अनुभव बन जाता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जब हम बहुत सारे खिलौने देखकर भ्रमित हो जाते हैं कि कौन सा सबसे अच्छा है, तो हमें पता नहीं चलता कि क्या करना चाहिए। ऐसे ही लोग जो सिर्फ अपने मन के झूठे विचारों और लालच में फंस जाते हैं, वे गलत रास्ते पर चले जाते हैं जैसे एक अंधेरे जंगल में भटकने वाले बच्चे की तरह। जब कोई बहुत ज्यादा दौड़कर थक जाता है या खोखली चीजों को पाने के लिए सच से हटता है, तो उसे असुविधाजनक और डरावना स्थिति (नरक) में ले जाया जाता है।

दैनिक चिंतन

प्यारे मित्र, जब हम अहंकार और वासनाओं में लिप्त होते हैं, तो हमारा दिमाग इतना उलझनग्रस्त हो जाता है कि सत्य का मार्ग दिखाई नहीं देता। यह मोह की जालबंदी हमें स्वयं के लिए ही घोर दुखदायी नरक की ओर धकेल सकती है, जहाँ शांति और पवित्रता का अभाव होता है। आज अपने कर्मों को देखिए कि क्या वे विषयभोगों में आसक्त हैं या उच्चतम सत्य के प्रति समर्पित? जब आप मोह की इस चिड़िया से मुक्ति पाते हैं, तो आपको वास्तविक स्वतंत्रता और दिव्य प्रकृति का अनुभव होता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन को देखें कि क्या यह मोह के जाल में उलझा हुआ है या विषयभोगों की ओर धकेला जा रहा है। एक गहरा सांस लें और स्वयं से पूछें: 'क्या मेरा चित्त अब भी भ्रमित है, या मैं शांतता को पहचान पा रहा हूँ?'

मुख्य शिक्षाएँ

  1. चित्त की भ्रमस्थिति (Mental Confusion)
    जब चित्त अनेक प्रकार के संस्कारों और विचारों से घिरा रहता है, तो वह सत्य को पहचानने में असमर्थ हो जाता है। यह अवस्था व्यक्ति को गतिहीन बना देती है क्योंकि उसका ध्यान केंद्रित नहीं होता।
  2. मोह का जाल (The Trap of Delusion)
    अज्ञान और मोह एक घना जाल बुनते हैं जो व्यक्ति को वास्तविकता से अलग कर देता है। यह जाल इतना शक्तिशाली होता है कि व्यक्ति अपनी ही विपत्ति का कारण बन जाता है, फिर भी उसे समझ नहीं आती।
  3. विषयभोगों में लीन होना (Attachment to Sensual Pleasures)
    जब मन केवल सुख और भोगों की प्राप्ति पर केंद्रित होता है, तो वह पाप का मार्ग अपना लेता है। इस प्रकार की आसक्ति व्यक्ति को अशुद्ध नरक में गिरने से नहीं रोक सकती क्योंकि यह दिव्य गुणों का नाश करती है।

विषय

मोह और भ्रम (Delusion and Confusion)कामनाओं पर नियंत्रण (Control over Lust/Desire)दैवीय बनाम आसुरी स्वभाव (Divine vs Demonic Nature)नरक की अवस्था (State of Hell/Ashuchi)बुद्धि का संदेह (Doubt in Intellect)आत्म-ज्ञान और मुक्ति (Self-Knowledge and Liberation)

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आगे पढ़ें

  1. 2.63 — इस श्लोक के बाद यह देखने के लिए कि क्रोध और मोह कैसे मानव को पाप की ओर ले जाते हैं, इसका तार्किक निष्कर्ष पढ़ें।
  2. 16.23 — दिव्य और आसुरी स्वभाव के अंतर का विस्तृत वर्णन जानने के लिए यह श्लोक आवश्यक है जो नरक की ओर ले जाने वाले रास्तों को स्पष्ट करता है।
  3. 18.60 — अंत में, इस अध्याय का निष्कर्ष और कृष्ण द्वारा अर्जुन के लिए आसुरी प्रकृति से मुक्ति पाने की सलाह सुनें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता में 'अशुचि नरक' का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
'अशुचि' का अर्थ है अपवित्र या कलंकित, जबकि 'नरक' यहाँ भौतिक स्थान के बजाय एक मानसिक अवस्था को दर्शाता है। यह उन लोगों की भावनात्मक और आध्यात्मिक स्थिति है जो सत्य से दूर होकर अज्ञान में जीते हैं, जहाँ शांति का पूर्ण अनुभव नहीं होता।
'मोहजाल' शब्द किसके लिए प्रयोग किया गया है और यह जीवन पर क्या असर डालता है?
यह उन लोगों के लिए प्रयोग हुआ है जो भ्रामक विचारों (fancies) में फंस जाते हैं और वास्तविक सत्य को पहचानने से वंचित रह जाते हैं। यह मोह जाल व्यक्ति की बुद्धि को धुंधला कर देता है, जिससे वह गलत निर्णय लेता है और अपने कल्याण के रास्ते से भटक जाता है।
क्या शारीरिक सुखों (kamabhogaeshu) का आनंद लेना पाप है?
भगवद गीता में स्वभाविक और सीमित सुख भोगने को मना नहीं किया गया, बल्कि 'आसक्त' या अति-लालची होकर उनमें डूब जाना दोष माना गया है। जब व्यक्ति केवल शारीरिक इन्द्रिय संतोष (gratification of lust) में अपना जीवन व्यतीत करता है और आध्यात्मिक विकास को नजरअंदाज कर देता है, तो यह उसकी मुक्ति का मार्ग रोका जाता है।
इस श्लोक से हमें क्या सीख मिल सकती है जो आज के युवाओं के लिए महत्वपूर्ण हो?
आज के युवाओं को यह समझना चाहिए कि अंतहीन लालच और भ्रमित विचारों में जीने से मानसिक शांति नहीं मिलती, बल्कि गहरा तनाव होता है। हमें अपने चित्त (mind) को स्थिर रखकर सच्चे उद्देश्यों के लिए कर्म करना चाहिए, न कि क्षणभंगुर सुखों की प्यास में अंधेरे रास्तों पर चलना चाहिए।
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