भगवद्गीता 16.19
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ||१६-१९||
tānahaṃ dviṣataḥ krurānsaṃsāreṣu narādhamān . kṣipāmyajasramaśubhānāsurīṣveva yoniṣu ||16-19||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जिन लोग द्वेष, क्रूरता और नराधम व्यवहार करते हैं, ईश्वर उन्हें बार-बार संसार में आसुरी योनियों (प्राकृतिक या मानव जीवन के ऐसे रूपों) में ही पैदा होते हुए देखते हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि बुरे कर्म करने वालों को दोष नहीं, वरन् उनकी प्रकृति स्वयं उन्हें उस मार्ग पर ले जाती है जहाँ से आगे निकलना मुश्किल हो जाता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि नकारात्मक भाव और क्रूरता मनुष्य के उद्धार में बाधक हैं, जबकि पवित्र कर्मों से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक कर्म योग (Karma Yoga) की मूल धारणा पर आधारित है, जहाँ यह सिद्ध किया जाता है कि प्रत्येक आत्मा अपने कर्मों के अनुसार ही नया रूप या योनि ग्रहण करती है। इसमें 'प्राप्ति' और 'संस्कार' (Samskara) का भाव स्पष्ट होता है, जहाँ दुर्गुण वाले व्यक्ति की प्रकृति स्वयं उसे आसुरी अवस्था में पुनः पैदा होने के लिए बाध्य करती है। यह सिद्धांत बताता है कि ईश्वर कोई दंड नहीं देते, बल्कि वे कर्मों के नियम को संचालित करते हैं जो व्यक्ति की प्रकृति (Prakriti) पर आधारित है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई उपदेशावस्था का हिस्सा है, जहाँ उन्होंने पांडवों और कौरवों की आध्यात्मिक प्रकृतियों (दैवीय और आसुरी) में विभेद किया था। इस श्लोक के तत्काल पूर्व अर्जुन ने दैवी गुणों का वर्णन सुना है, अब भगवान कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों की परिस्थितियों और उनके अंतिम गंतव्य की बात कर रहे हैं। युद्ध के मंच पर यह संवाद तब हुआ जब अर्जुन में संशय था कि क्या पाप करने वालों को भी ईश्वर दया करते हैं या नहीं, और कृष्ण इस श्लोक से उनका उत्तर देते हुए स्पष्ट कर रहे हैं।
आज के जीवन में
आज के कार्यस्थल पर यदि कोई सहकर्मी चरित्रहीन है, छद्मभेषी धोखा देता है या टीम को तोड़ने की नीति अपना रहा है, तो भगवद गीता का यह सिद्धांत बताता है कि ऐसे व्यवहार से वह व्यक्ति स्वयं अपने करियर और मानसिक शांति के लिए बुरे अवसरों (आसुरी योनियों) में फंस जाएगा। इसका अनुप्रयोग तब होता है जब हम किसी विषम स्थिति का सामना करते हैं: यदि आप क्रोध या ईर्ष्या पर नियंत्रण नहीं कर पाते, तो यह आपको नौकरी खोने, रिश्तों के टूटने जैसे कठिन परिस्थितियों की ओर धकेल सकता है। इसलिए, अपने व्यवहार में सकारात्मकता और दया को अपनाना ही एक व्यावहारिक रणनीति है जो आपको भविष्य के बुरे अनुभवों से बचाती है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे अगर कोई बच्चा बार-बार गुस्सा करके दूसरों को चोट पहुँचाने वाले खेल खेलेगा और नियम तोड़ेगा, तो उसे अगली बार वही दुखद अनुभव मिलता है जो उसने खुद बनाया था। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति बहुत क्रूर होता है या दूसरों से नफरत करता है, तो वह स्वयं एक ऐसे गहरे गड्ढे में चला जाता है जहाँ उसे वापस आने के लिए बार-बार प्रयाश करना पड़ता है। इसका मतलब यह नहीं कि ईश्वर क्रोध करते हैं, बल्कि यह स्वाभाविक नियम (कर्म का फल) है जो हमें बताता है कि अगर आप दूसरों को दुख देते हैं, तो आपको खुद भी कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ सकता है।
दैनिक चिंतन
जब भी आपके मन में किसी पर क्रोध या द्वेष उठता है, तो यह संसार की एक कड़वी वास्तविकता है कि वह आपको और गहराई से अज्ञान के वृत्तों (आसुरी योनियों) में खींच ले जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस पदार्थ का स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं कि क्रूर कर्म करने वाले द्वेषुओं को संसार में बार-बार हीन जन्म प्राप्त होते हैं। अपने भीतर की उस 'क्रुरता' (cruelty) या नाराजगी पर ध्यान दें जो आपको स्वतंत्र होने के बजाय और अधिक बांध देती है, और उसे प्रेम और समझदारी से बदलने का संकल्प लें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में आए किसी भी क्रोध या दुश्मनी के भाव पर विचार करें। देखें कि कैसे यह द्वेष आपको और आपके आसपास की सृष्टि को कठोरता से भर देता है, जैसे अंधेरी रात में घना कुहरा हो जाता है। इस संवेदना के साथ स्वयं को शान्त करने और प्रेम भावनाओं को पुनः स्थापित करने का आह्वान करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- क्रोध और द्वेष की विनाशकारी शक्ति
जब व्यक्ति किसी पर दुश्मनी या क्रोध रखता है, तो वह स्वयं को नैतिक रूप से गिरा देता है। इस भावना का परिणाम हमेशा आध्यात्मिक पतन और कठोर जन्मों की ओर ले जाता है। - आसुरी योनियों में पुनर्जन्म
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि क्रूरकर्मी नराधमों को संसार के चक्र में बार-बार हीन जन्म (असुरी योनि) प्राप्त होते हैं। यह कर्म का नियम है कि जो व्यक्ति धर्म से विमुख हो, उसे उसी प्रकार की यातनाएँ मिलती हैं। - द्वेष भाव और ईश्वरीय स्वरूप
दुश्मनी का भाव मनुष्य के भीतर से भगवान की प्रकृति (दैवी गुण) को मिटा देता है। जब द्वेष हावी होता है, तो व्यक्ति अपने वास्तविक स्वत्व और शान्ति से वंचित होकर अज्ञान में डूब जाता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस अध्याय की शुरुआत में कर्म योग के सिद्धांतों का पालन करके क्रोध से मुक्ति कैसे प्राप्त करें, यह समझने के लिए।
- 3.30 — कर्मो को ईश्वर की शरण में अर्पित करने के माध्यम से द्वेष और क्रोध जैसे पाखंडी भावों का नाश कैसे करें।
- 12.15 — द्वेषुओं (जो दूसरों को नफरत करते हैं) की तुलना में भक्तों के गुणों और दैवी प्रकृति का वर्णन सुनें।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.