भगवद्गीता 5.8
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् | पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ||५-८||
naiva kiñcitkaromīti yukto manyeta tattvavit . paśyañśruṇvanspṛśañjighrannaśnangacchansvapañśvasan ||5-8||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जो सत्य का ज्ञान प्राप्त कर चुका है (तत्त्ववित्), वह शरीर द्वारा देखना, सुनना या चलने जैसे कार्यों के बावजूद भी यह नहीं सोचता कि 'मैं कुछ कर रहा हूँ।' वास्तव में, ये सभी कार्य केवल इंद्रियों और प्राणों की प्रकृति से होते हैं। सच्चा ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि वह (आत्मा) इन कार्यों का कर्ता नहीं है, बल्कि निरीक्षक मात्र है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग की अवधारणाओं पर आधारित है, विशेष रूप से 'कर्तृत्व का अभाव' या 'अकर्मण्यता' का सिद्धांत जो सांख्य दर्शन और कर्मा योग को मिलाने वाला बिंदु है। यह बताता है कि आत्मा (Self) निष्क्रिय होती है और केवल इंद्रियों, मन और बुद्धि की प्रकृति ही कार्य करती हैं; तत्वज्ञानी व्यक्ति इस अंतर को जानकर कर्मों में लिप्त नहीं होता।
शब्दार्थ
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर स्थित पांचवें अध्याय में आया है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'कर्मा संन्यास योग' का उपदेश दे रहे हैं। इससे ठीक पहले कृष्ण ने बताया था कि सच्चा तपस्वी या संन्यासी वह नहीं जो केवल शरीर छोड़ता है, बल्कि वह व्यक्ति है जो मन से कामों को त्यागकर भी कार्य करता रहता है। अर्जुन अपने उदास मूड और कथित कर्मों की जिम्मेदारी से भागने में पड़ा हुआ था, जिस पर कृष्ण उसे बता रहे हैं कि सच्चा ज्ञान होने के बावजूद भी इंद्रियों का कार्य जारी रहता है।
आज के जीवन में
मान लीजिए एक प्रोजेक्ट मनीजर को बहुत बड़ी टीम की जिम्मेदारियाँ और तनाव मिल गया हो, लेकिन वह यह न भूलें कि अंततः परिणाम उनकी निजी इच्छा से नहीं, बल्कि कई कारकों के संयोग से आते हैं। जब वे काम करते हैं (प्रेजेंटेशन देना या टीम को निर्देश देना), तो उन्हें यह एहसास होता है कि 'मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ' वाला अहंकार नहीं, बल्कि वह सिर्फ एक यंत्र की तरह कार्य कर रहे हैं। इस दृष्टिकोण से वे तनाव और असफलता के डर को महसूस किए बिना पूरे ध्यान (focus) के साथ काम करने में सक्षम हो जाते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे आप एक एनीमेशन फिल्म देख रहे हों और स्क्रीन पर कोई भीद चला रहा हो, लेकिन असल में वह भीड़ आपके पास नहीं है या उसने कुछ नहीं किया, ठीक वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति को लगता है। जब हम चलते हैं, खाते हैं या सोते हैं, तो यह केवल हमारा शरीर कर रहा होता है, न कि हमारी आत्मा। इसलिए वह अहंकार छोड़कर शांत रहता है और समझता है कि 'मैं कर्ता नहीं हूँ'।
दैनिक चिंतन
आज जब आप काम करते हैं, तो खुद से पूछें: क्या यह 'मेरा' कार्य है या प्रकृति की गुणों का खेल? एक तत्ववित् (सत्य को जानने वाला) व्यक्ति के रूप में महसूस करें कि भले ही शरीर चलता-फिरता है, लेकिन आपका आंतरिक स्वयं कभी भी किसी काम से बांधा नहीं जाता।
आज के लिए एक अभ्यास
आँखें बंद करके बैठ जाएं और ध्यान दें कि आपका शरीर कैसे देख रहा है, सुन रहा है और सांस ले रहा है। अपने मन को यह याद दिलाएं कि इन सभी क्रियाओं के बावजूद आपका असली 'मैं' (आत्मा) किसी भी कर्म में लिप्त नहीं होता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- कर्त्तृत्व का अहंकार त्यागना
जब कोई व्यक्ति तत्व (सत्य) को जान लेता है, तो उसे समझ आ जाता है कि वह कर्म नहीं करता बल्कि केवल प्रकृति की क्रियाओं में भागीदार होता है। इस ज्ञान से 'मैं कर रहा हूँ' वाला अहंकार अपने आप मिट जाता है और व्यक्ति निष्क्रियता का अनुभव करने लगता है। - सुषुप्ति में भी सचेतन रहना
यह श्लोक बताता है कि तत्ववित पुरुष भले ही सो रहा हो या सांस ले रहा हो, वह यह नहीं भूलता कि उसकी वास्तविक प्रकृति कर्मरहित है। दैनिक जीवन की सभी क्रियाओं—दुर्गंध सुंघना या स्पर्श करना—inके बीच भी आत्म-ज्ञान स्थिर रहता है। - युक्त (संतुलित) अवस्था का प्रतीक
'युक्त' शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि ज्ञानी व्यक्ति कर्मों से भटकता नहीं है, बल्कि उन्हें देखने वाले के रूप में संतुलन बनाए रखता है। वह सभी इंद्रियों के कार्यों को गवाह के रूप में स्वीकार करता है बिना किसी आसक्ति या निष्ठा के।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — कर्मयोग के मूल सिद्धांत को समझने के लिए कि फल की चिंता किए बिना कर्म करना चाहिए, जो इस श्लोक का आधार है।
- 3.27 — यह स्पष्ट करता है कि कैसे गुण ही गोलियाँ चलाने वाले हैं और आत्मा केवल गवाह बनकर रहती है, जो 5.8 की व्याख्या को पूरा करती है।
- 13.29 — प्रकृति (प्राकृतिक गुणों) और पुरुष (आत्मा) के भेद को समझने के लिए, जो यह बताना आवश्यक है कि कर्म किसकी क्रिया हैं।
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