भगवद्गीता 5.7
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः | सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ||५-७||
yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ . sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyate ||5-7||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति योग के मार्ग पर स्थित है, उसका मन और आत्मा शुद्ध हो चुकी होती है। ऐसे पुरुष अपने इंद्रियों (इंद्रेंद्रिय) और स्वयं की प्रवृत्तियों (अन्तःकरण) को पूर्ण रूप से जीत लेता है और सभी प्राणियों में अपनी एक ही आत्म-शक्ति का दर्शन करता है। अंत में, कृष्ण कहते हैं कि भले ही वह व्यक्ति निरंतर कार्य कर रहा हो, उसे उस कर्म के फल या दुःखों से कोई लिप्त (बांधा हुआ) नहीं होता क्योंकि उसके पास पूर्ण आत्म-ज्ञान का अनुभव है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भगवद्गीता के 'कर्मा योग' (कर्म का मार्ग) की सबसे उच्च अवस्था को दर्शाता है, जो ज्ञानयोग और कर्मयोग का सुंदर संगम है। इसमें यह सिद्धांत विकसित होता है कि जब व्यक्ति अपने स्वयं के 'आत्मा' में स्थिर हो जाता है और सभी प्राणियों में एक ही ब्रह्मान को देखता है, तो वह कर्मों से अलग (विविक्त) रहते हुए भी उन्हें पूर्ण रूप से निभा सकता है। यह सिद्धांत बताता है कि वास्तविक मुक्ति 'काम' न करने में नहीं, बल्कि काम करते समय 'लिप्त' न होने की अवस्था में है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश है, जहाँ अर्जुन ने हथियार फेंक दिए थे और सन्नाटे में डूबे हुए थे। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने 'कर्मासंयास योग' (कर्म त्याग का मार्ग) की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए अर्जुन को यह समझाया था कि केवल शारीरिक काम छोड़ने से मुक्ति नहीं मिलती। इस संदर्भ में कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सच्चा त्यागी वह है जो बाहर की दुनिया से दूर न होकर भी, मन और इंद्रियों पर विजय पाकर कार्य करता रहता है, ताकि युद्ध का भार हल कर सकें।
आज के जीवन में
आधुनिक जीवन में एक प्रबंधक मान लीए जो अपने कर्मचारी के गंभीर दोष को सुधारने या उन्हें निकालने की मुश्किल स्थिति से गुजर रहा है, लेकिन वह बिना किसी क्रोध या ईर्ष्या के अपनी जिम्मेदारी निभाता है। यदि उसका मन 'सर्वभूतात्म' (सबमें एक) होने का अनुभव कर ले और उसे पता हो कि यह कार्य प्रकृति की शक्ति से हो रहा है, तो वह इस काम को करने के बाद तनाव या अपमान की भावना नहीं महसूस करता। यही 'योगयुक्त' अवस्था है जहाँ व्यक्ति कर्मों में लिप्त होने के बावजूद मन से स्वतंत्र और शांत रहता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम एक बहुत तेज चलने वाली गाड़ी चला रहे हो, लेकिन तुम्हारे हाथ और पैरों पर पूरी तरह से नियंत्रण है (यही 'जितेन्द्रिय' हैं)। अगर रास्ते में गंदगी या कीचड़ भी आए तो वह सिर्फ टायरों के नीचे फंस जाए, तुम कपड़े नहीं गंदा करोगे और न ही चिंतित होओगे। ठीक इसी तरह, एक समझदार व्यक्ति दुनिया में काम करता है लेकिन उसे किसी बात का डर या घृणा नहीं लगती क्योंकि वह जानता है कि उसका असली स्वभाव (आत्मा) साफ-सुथरा और सुरक्षित रहता है।
दैनिक चिंतन
आपके भीतर वह दृढ़ता है जो इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुकी है, और वही शक्ति आपको कर्मों के बंधन से मुक्त रखती है। जब आप अपने कार्य को ईश्वर समर्पण या योग की भावना से करते हैं, तो वे आपके हृदय को गंदा नहीं बनाते। यह सुखद सत्य स्वीकार करें कि आप न केवल शरीर चला रहे हैं, बल्कि एक शुद्ध आत्मा के रूप में कर्म कर रहे हैं जो स्वतंत्र है।
आज के लिए एक अभ्यास
आँखें बंद करें और महसूस कीजिए कि आपकी आत्मा शरीर या इन्द्रियों से अलग है, नित्य शुद्ध और शांत। जब भी कोई काम सिर पर आए तो सोचिये, 'मैं कार्यकर्ता हूँ, लेकिन मैं उस कर्म का बंधन नहीं बन रहा।' इस अनुभव को केवल एक क्षण के लिए धारण कीजिए कि आप सभी प्राणियों में अपनी ही आत्मा देख रहे हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- योगयुक्त और विशुद्ध अंतकरण की अवस्था
इस श्लोक का मूल आधार 'योग' की स्थापना पर है, जहाँ बुद्धि स्थिर हो जाती है। जब मन शुद्ध होता है तो व्यक्ति कर्मों के फल में आसक्त नहीं रहता और न ही उसमें विषाद आता है। - इन्द्रिय जीत और शरीर पर नियंत्रण
काम, क्रोध या लोभ जैसे इन्द्रियों के व्याकुल होने को जितेन्द्रिय (इन्द्रियों का विजेता) कहते हैं। जब आत्मा स्वयं की ओर केंद्रित होती है और बाहरी विकर्षणों पर काबू पाती है, तो वह स्थिर रहती है। - सर्वभूतआत्मभाव से एकत्व अनुभव
यह उच्चतम दर्जा तब प्राप्त होता है जब व्यक्ति सभी जीवों में अपनी आत्मा और परमात्मा को देखता है। इस दृष्टि के साथ कर्म करना 'कृत्य' नहीं, बल्कि पवित्र अनुष्ठान बन जाता है जो किसी भी प्रकार से लिप्त (बंधन) करता नहीं है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस श्लोक में 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' के सिद्धांत को समझना आवश्यक है जो इस अध्याय की नींव रखता है।
- 3.30 — इस श्लोक में आत्म-निर्देश (आत्मा को भगवान के सौंपने) का विस्तृत वर्णन मिलता है जो कर्मों से मुक्ति की कुंजी है।
- 12.15 — यह श्लोक उन गुणों को बताता है जिनसे एक भक्त सर्वभूत में आत्म-समानत्व का अनुभव कर पाता है और सभी से प्रिय बन जाता है।
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