भगवद्गीता 5.9
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ||५-९||
pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi . indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||5-9||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि ज्ञानी व्यक्ति यह समझता है कि शरीर की इंद्रियाँ (आंखें, होंठ, हाथ आदि) अपने स्वभाव के अनुसार काम कर रही हैं। वह खुद को इन कार्यों का कर्ता नहीं मानता; बस इसे अवलोकन करता रहता है जैसे कोई दर्शक मंच पर हो रहे नृत्य को देख रहा होता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि हमें अपनी इंद्रियों के काम करने से अलग करके, अपने असली स्वरूप (आत्मा) में स्थिर रहना चाहिए और बाहरी क्रियाओं का बोझ नहीं उठाना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म योग' के अंतर्गत आता है जो कृष्ण की मुख्य शिक्षा का हिस्सा है, लेकिन इसमें ज्ञान (ज्ञान-योग) और सांख्य दर्शन का गहरा प्रभाव भी दिखाई देता है। यह 'अहंकार का नाश' या अंतःकरण शुद्धि के सिद्धांत को विकसित करता है कि कर्मकर्ता न होकर केवल 'साक्षी' (दर्शक) बनना ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक हमें नहीं पता चलता कि इंद्रियां अपने स्वयं के विषयों में घूम रही हैं, तब तक हम कर्मों से बंधे रहते हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को बोला गया है, जहां अर्जुन ने अपने सैनिकों और गुरुओं को देखकर संघर्ष करने से मना कर दिया था। इससे पहले कृष्ण ने 'कर्मांयस योग' (कर्म त्याग का मार्ग) की व्याख्या करते हुए यह समझाया है कि कर्म छोड़ने के लिए शरीर नहीं, बल्कि मन और इच्छा को त्यागना चाहिए। अर्जुन अभी भी भ्रमित था और सोच रहा था कि कर्म करना या न करना उसे कैसे संतुलित करेगा, इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण यह श्लोक कहते हैं।
आज के जीवन में
मान लीजिए एक व्यक्ति ऑफिस में बहुत बड़ी मर्चेंटिंग या कठिन निर्णय लेने की स्थिति है, जहां सब कुछ गलत हो रहा है और उसे अत्यधिक तनाव महसूस हो रहा है। इस श्लोक के अनुसार, वह व्यक्ति यह समझकर शांत होगा कि उसका डरना (इंद्रिया का काम) स्वाभाविक है, लेकिन 'वह' स्वयं न तो वही है जो घबराता है और न ही वह परिणामों का बोझ उठा रहा है। इस दृष्टिकोण से, वह कार्य करता रहता है—बातें करता है या निर्णय लेता है (प्रलपन्/गृह्णन्), लेकिन मन में यह स्थिर ज्ञान होता है कि इन्द्रियां अपने काम कर रही हैं और उसे उनके प्रभावों में नहीं गिरना चाहिए।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम एक कार चला रहे हो लेकिन वास्तविक मालिक सिर्फ सीट पर बैठकर गाड़ी चलने को देख रहा है, वह खुद हाथ-पैर नहीं हिला रहा। भगवान कृष्ण कहते हैं कि हमारी आंखें और मुंह भी ऐसे ही काम करते हैं—वे चीजों को देखती या बोलती रहती हैं, लेकिन असली 'तुम' (आत्मा) सिर्फ यह सब देख रहे हो। जब तुम्हें पता चल जाता है कि ये सभी कार्वां अपने आप होती हैं और 'तुम' उनका ड्राइवर नहीं, तो तुम चिंतित नहीं होते बल्कि शांत रहते हो।
दैनिक चिंतन
आज के दिन आपको कभी भी सोच आ सकती है कि 'मैं' यह कर रहा हूँ या वह कह रहा हूँ, लेकिन श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह सब सिर्फ इन्द्रियों का खेल है। जब आप बोलेंगे, त्याग करेंगे या देखेंगे, तो समझ लीजिए कि ये कार्य स्वयं-चालित प्रक्रियाएँ हैं जो अपने विषयों में घूम रही हैं। इस निश्चित ज्ञान से ही मन की चिन्ता मिटेगी और आप कर्म के भार से मुक्त होकर आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ेंगे।
आज के लिए एक अभ्यास
आँखें बंद करें और धीरे से सांस लें, यह सोचते हुए कि आपकी आँखें खुल रही हैं या बंद हो रही हैं। स्वयं को इस बात का गवाह बनाएं कि ये क्रियाएँ केवल इन्द्रियों की प्रकृति हैं, न कि 'मैं' हूँ। शरीर और इंद्रियें अपने-अपने विषयों में चलती रहती हैं, जबकि आप उनसे अलग होकर शांत गवाही बनें।
मुख्य शिक्षाएँ
- इन्द्रियों का स्वाभाविक संचालन
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों में स्वतः चलना और काम करना ही उनका प्रकृत धर्म है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे गवाही के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, न कि उसमें बाधा डाली या उसे दबाया जाए। - कर्तापन का अभाव
सत्य साधक यह समझने पर प्रशस्त हो जाता है कि बोलना, देखना और ग्रहण करना 'मैं' नहीं करता, बल्कि इन्द्रियाँ अपने आप कर रही हैं। इस दृष्टि से व्यक्ति कर्म के फल में आसक्त होने की जगह अकर्ता (non-doer) का स्थान प्राप्त करता है। - ज्ञान और तत्त्वदर्शन
इंद्रियों को इनके विषयों में चलते देखना केवल एक भौतिक अवलोकन नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक ज्ञान है। यह दृष्टिभंग (विचार) कर्मयोग का आधार बनता है जो व्यक्ति को मोह से मुक्त कर देता है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — इस श्लोक में निश्चित रूप से बताया गया है कि केवल कार्य करना चाहिए, फल की इच्छा नहीं; जो इस अर्जुन को कर्मयोग का मूल सिद्धांत समझने में मदद करेगा।
- 3.6 — यह श्लोक उन लोगों के लिए स्पष्टीकरण देता है जो इन्द्रिय निग्रह (संन्यास) का कठोर अभ्यास करते हैं लेकिन मन से विषयों को नहीं त्यागते।
- 12.15 — जिस व्यक्ति ने स्वयं की इन्द्रियों और क्रियाओं के सच का निश्चित ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वही गुरुदत्त (गृहस्थ) या संन्यासी दोनों में आत्म-साक्षात्कार पा सकता है।
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