भगवद्गीता 13.29

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 13.29 — "निश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वय"
भगवद्गीता 13.29 — Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
संस्कृत

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ||१३-२९||

लिप्यंतरण

samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram . na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim ||13-29||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर को सभी जीवों के हृदय में समान रूप से स्थित देखता है, वह अपने स्वभाव द्वारा दूसरे आत्माओं का नाश नहीं करता। यह दृष्टि बदलने वाला अनुभव है जहाँ हमें प्रेम और करुणा की भावना होती है। जब कोई इस सच्चाई को पहचान लेता है कि सभी में वही ईश्वर विराजमान हैं, तो वह पापों से मुक्त होकर परम शान्ति और मोक्ष (परमा गति) प्राप्त करता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह उपदेश 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) की धारा में आता है, जो सत्य के ज्ञान और अद्वैत वेदांत (Non-dualism) पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि ईश्वर सभी जीवों में समान रूप से विद्यमान है ('समवस्थितं ईश्वरम्') और आत्माओं के बीच कोई वास्तविक भेदभाव नहीं होता। जब कर्म या ज्ञान की दृष्टि बदलती है, तो व्यक्ति पाप का नाश करके परम लक्ष्य (पराम् गति) प्राप्त करता है।

शब्दार्थ
समम् eally, पश्यन् seeing, हि indeed, सर्वत्र everywhere, समवस्थितम् eally dwelling, ईश्वरम् the Lord, न not, हिनस्ति destroys, आत्मना by the self, आत्मानम् the Self, ततः then, याति goes, पराम् the highest, गतिम् the goal
पारंपरिक भाष्य
This is the vision of a liberated sage. The Supreme Self abides in all forms. There is nothing apart from It. An ignorant man destroyes the Self by identifying himself with the body and the modifications of the mind and by not seeing the one Self in all beings. He has a blurred vision. His mind is very gross. He cannot think of the subtle Self. He is swayed by the force of ignorance. He mistakes the impure body for the pure Self. He has false knowledge. But the sage has knowledge of the Self or true knowledge and so he beholds the one Self in all beings. An ignorant man is the slayer of his Self. He destroys this body and takes another body and so on. But he who beholds the one Self in all beings does not destroy the Self by the self. Therefore he attains the Supreme Goal, i.e., he attains release from the round of birth and death. Knowledge of the Self leads to liberation or salvation. Knowledge of the Absolute annihilates the ignorance in toto. If the ignorance is destroyed and false knowledge is also destroyed, all evils are simultaneously destroyed. Those who have realised that unity of the Self in all these diverse forms are never caught in the meshes of birth and death. They attain the state of Turiya (the fourth state beyond waking, dreaming and deep sleep) where form and sound do not exist. The self is everybodys friend and also his enemy as well. The idea first expressed in chapter VI, verses 5 and 6 is repeated here. (Cf. XVIII.20)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का हिस्सा है, जो अध्याय 13 में स्थित है। इस समय तक कृष्ण ने 'क्षेत्र' (शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/ईश्वर) के बीच के भेद की विस्तृत व्याख्या कर दी है ताकि अर्जुन अपने सत्य को समझ सके। अर्जुन अभी भी संदेह, दुख और युद्ध में किसी का वध करने से डरा हुआ था। कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से उसे यह बताना चाहते हैं कि जब वह सभी जीवों में ईश्वर को एक समान देखेगा, तो उसके भीतर की हिंसात्मक प्रवृत्ति खत्म हो जाएगी और उसे मोक्ष का मार्ग मिल जाएगा।

आज के जीवन में

आज के समय में, कभी-कभी हम अपने कामकाजी माहौल या परिवार में किसी व्यक्ति से बहुत नाराज होते हैं जो बार-बार गलतियाँ करता है, जिससे हमें गुस्सा आता है और हम उसके साथ दुर्व्यवहार करने की सोचते हैं। इस श्लोक का अनुप्रयोग यह होगा कि आप उस समय रुककर अपने भीतर एक क्षण के लिए ईश्वर को देखने की कल्पना करें—कि वह व्यक्ति जिससे गुस्सा आ रहा है, उसके अंदर भी वही पवित्र चेतना (ईश्वर) विराजमान है जो आपके और सभी में है। जब आप 'समभाव' से उसकी ओर देखेंगे कि दोनों के मूल एक ही हैं, तो आपका गुस्सा शांत हो जाएगा और आप उसे नफरत की बजाय करुणा या शान्तिपूर्ण समाधान का मार्ग दिखा पाएंगे।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर हमारा प्यार वाला दोस्त हर जगह होता? भगवान कृष्ण कहते हैं जैसे आपको अपने घर में एक ही बड़ा चमकीला दीपक (दीया) दिखाई देता है, वैसे ही ईश्वर सभी के दिलों और सब कुछ में अलग-अलग रूप से लेकिन समान भाव से मौजूद होता है। अगर हमें यह पता चल जाए कि हर किसी के अंदर वह एक ही प्रकाश (ईश्वर) बैठा है, तो हम कभी भी किसी को दुख नहीं देंगे या उसे मारने की सोचेंगे। जब हम ऐसा समझते हैं और सबको अपना भाग्य मान लेते हैं, तब हम सच्ची खुशी और अच्छी जगह (परम गति) में पहुँच जाते हैं।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि दुख और सुख के बीच की दूरी हमारी देखभाल का नतीजा नहीं, बल्कि यह भ्रम है कि हम ईश्वर से अलग हैं? जब तक आपको लगता रहेगा कि 'आप' कुछ कर रहे हैं या 'तुम' कुछ खो रहे हैं, तब तक आप आत्म-नाश (अहंकार का प्रभाव) में ही रहेंगे। आज की इस क्षण में ईश्वर को अपने भीतर नहीं बल्कि हर जगह समान भाव से स्थित देखकर अपनी सीमाओं के भ्रम को तोड़ें, क्योंकि वही एक सच्चा स्वतंत्रता का मार्ग है।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने अंतर को शांत करके देखें कि आपका वास्तविक स्वभाव (आत्मा) और परमेश्वर एक ही सत्य के दो पहलू हैं। कल्पना करें कि जैसे जलाशय का पानी समुद्र में मिलकर अपना रूप नहीं खोता, वैसे ही आपको भी सर्वत्र व्याप्त ईश्वर से अलग न मानें, बल्कि उनकी अनुपम उपस्थिति को अपने हर भाव में सत्यानन्त करके महसूस करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सर्वत्र ईश्वर की अद्वितीय उपस्थिति (Samavasthita Ishwara)
    यह श्लोक हमें सिखाता है कि परमेश्वर सभी जीवों और सृष्टि में समान भाव से स्थित हैं, न केवल मंदिरों या विशिष्ट स्थलों में। जब हम यह दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो अहंकार का नाश होता है क्योंकि 'अलग' होने की धारणा समाप्त हो जाती है।
  2. आत्म-नाश से मुक्ति (Na Hinastyatmanah)
    यहाँ आत्म-नाश का अर्थ शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि भ्रम के कारण होने वाली आध्यात्मिक पतन है। जब हम ईश्वर को स्वयं में और अन्य में समान देखते हैं, तो हम अपनी वास्तविक प्रकृति (आत्मा) का कभी भी विनाश नहीं करते।
  3. परम गति की प्राप्ति (Parāṃ Gatim)
    यह समान भाव से देखने और ईश्वर को सर्वत्र महसूस करने का परिणाम 'परां गति' या परम लक्ष्य है, जो मोक्ष या पूर्ण एकता की अवस्था है। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अंततः संसार के कर्मों में उलझे बिना ही स्वयं को मुक्त पा लेता है।

विषय

ईश्वर की सर्वव्यापकता (Omnipresence)समभाव और समदर्शनहिंसा का अन्त्य (Non-violence)आत्मा और परमात्मा का एकत्वमोक्ष या परम गतिज्ञान योग

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक आपको 'कर्म' में समर्पण और फल की चिंता न करने का सिद्धांत देगा, जो ईश्वर को सर्वत्र देखने के लिए आवश्यक मानसिक स्थिरता बनाए रखेगा।
  2. 3.30 — यह श्लोक आपको कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने की विधि सिखाता है, जो 13वें अध्याय में वर्णित 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' के ज्ञान का व्यावहारिक अनुप्रयोग है।
  3. 12.15 — इस श्लोक से आप यह समझ पाएंगे कि ईश्वर की सर्वत्र उपस्थिति को स्वीकार करने वाले भक्त (जैसे कृष्ण) कैसे दुख और सुख दोनों में स्थिर रहते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'आत्मना आत्मानं हिनस्ति' क्या अर्थ है?
यह वाक्यांश इसका विरोधाभासी रूप बताता है। जब कोई व्यक्ति ईश्वर को सभी में समान नहीं देख पाता और अन्य जीवों के प्रति द्वेष या अन्याय का व्यवहार करता है, तो वह मूलतः उसी आत्मा (ईश्वर) की हानि कर रहा होता है जो अपने भीतर विराजमान है। अर्थात, जब हम दूसरे को दुख देते हैं, तो वास्तव में हम अपनी ही पवित्रता और शक्ति का नाश करते हैं क्योंकि सब एक ही सत्य के अंग हैं।
'परम गति' से क्या तात्पर्य है?
'परम गति' या 'Parāṃ gatim' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊँचा स्थान' या 'अंतिम लक्ष्य', जो कि मोक्ष (मुक्ति) को दर्शाता है। यह वह अवस्था है जहाँ आत्मा कर्मों के चक्र से मुक्त होकर ईश्वर में विलीन होती है और अंतहीन शान्ति प्राप्त करती है। गीता में इसे परम धाम या ब्रह्मानुभूति कहा गया है जो दुख-संसार का अन्त करता है।
क्या केवल यज्ञों से इस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है?
नहीं, यह श्लोक स्पष्ट रूप से बताता है कि यह परिणाम 'समभाव' और ईश्वर का सही दृष्टिकोण (ज्ञान) रखने से मिलता है। यद्यपि यज्ञ कर्म योग में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं बल्कि भीतर की समझदारी और सर्वत्र एक ईश्वर को देखने वाले दृष्टिकोण से ही यह 'परम गति' प्राप्त होती है।
यदि हम सभी में ईश्वर को नहीं देख पाते हैं तो क्या होता है?
जैसा कि श्लोक के विपरीत भाग से पता चलता है, यदि कोई व्यक्ति समभाव का अभाव रखकर अन्य जीवों के प्रति असमान व्यवहार करता है या उन्हें नष्ट करने की सोचता है (आत्मना आत्मानं हिनस्ति), तो वह पापी कर्मों में फंस जाता है। ऐसा व्यक्ति कर्म-संसार से मुक्त नहीं हो सकता और भविष्य में फिर जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है, न कि परम गति को प्राप्त करता है।
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