भगवद्गीता 13.28
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् | विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ||१३-२८||
samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram . vinaśyatsvavinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati ||13-28||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समस्त जीवों में एक ही अनश्वर परमेश्वर (ब्रह्मान) की उपस्थिति देखने का रहस्य बता रहे हैं। यह श्लोक सिखाता है कि जब हम नष्ट होने वाले शरीर के पीछे अविनाशी आत्मा और ईश्वर को समभाव से पहचान लेते हैं, तभी वास्तविक दृष्टि (ज्ञान) की प्राप्ति होती है। यदि कोई भूतों में विनश्यमान रूप देखता है लेकिन उनके भीतर स्थित अनशन्य सत्य को नहीं देख पाता, तो वह अंधा माना जाता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग और सांख्य दर्शन के सिद्धांतों पर आधारित है, जो 'क्षेत्र' (शरीर/मन) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/ईश्वर) के भेद को स्पष्ट करता है। यह अद्वैत वेदांत की अवधारणा विकसित करता है जहाँ ईश्वर सभी सृजनों में समान रूप से विराजमान हैं, और नश्वरता (विनाश) केवल शरीर का गुण है, आत्मा का नहीं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेتر पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को बोधनाम की दी गई उच्चतर दार्शनिक शिक्षाओं का हिस्सा है। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने 'शरीर' (क्षेत्र) और उसका ज्ञाता ('क्षेत्रज्ञ') के बीच के अंतर का विस्तृत वर्णन किया था ताकि अर्जुन को आत्म-सत्य की पहचान हो सके। युद्ध की तैयारी में गहरे दुख और भ्रम में फंसे अर्जुन, अब इस ज्ञान के माध्यम से अपने कर्मों का दृष्टिकोण बदल रहे हैं।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप कार्यस्थल पर किसी सहकर्मी की गलती या विफलता को देखकर तुरंत नकारात्मक भाव (द्वेष) में आ जाते हैं; यह श्लोक आपको सिखाएगा कि उस व्यक्ति के अंदर भी एक अनश्वर दिव्य चेतना है जो कभी नहीं मरती। जब आप किसी प्रियजन की बीमारी या बूढ़ा होने पर उनकी नश्वरता देखकर उदास होते हैं, तो यह दृष्टि आपको उनमें निहित अमूल्य और स्थिर आत्मा को पहचानने में मदद करेगी। इससे आपका चित्त शांत होगा और आप किसी भी परिस्थिति में समभाव (विषय-वस्तु से प्रेम या द्वेष) बनाए रख सकेंगे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि एक मूर्तिकार ने कई मिट्टी के घड़े बनाए हैं; सबके अंदर मिट्टी ही होती है, भले ही वे आकार में अलग-अलग हों और कहीं गिरकर टूट भी जाएं। जब तुम देखते हो कि हर टूटे हुए घड़े के भीतर वही 'मिट्टी' (ईश्वर) मौजूद है जो नष्ट नहीं होती, तभी तुम्हारी समझ सच्ची बनती है। जैसे मिट्टी कभी खत्म नहीं होती, वैसे ही ईश्वर हर जीव में हमेशा रहते हैं और वे कभी मरते भी नहीं हैं।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपको कभी लगा है कि आप अकेले हैं या दुखी? इस सत्य को ध्यान में रखें कि वह एकमात्र परमेश्वर जो हर जीव के हृदय में समान रूप से बैठा है, वही आपके भीतर विद्यमान है। जब आप किसी अन्य की पीड़ा देखते हैं, तो वास्तव में उसी अनश्वर चेतना को दुख महसूस करते हैं, क्योंकि सब एक ही सत्य का अंतिम भाग हैं। इस दृष्टि से आपको न केवल दूसरों के प्रति करुणा आएगी, बल्कि यह गहरा आश्वासन मिलेगा कि आपका अस्तित्व कभी विनाश नहीं हो सकता।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के समय में, अपनी आँखों से बाहर देखते हुए उसी चेतना को पहचानने का प्रयास करें जो सभी जीवों और वस्तुओं में समभाव से विराजमान है। अपने भीतर की शांतिपूर्ण दृष्टि से यह अनुभव करें कि आपका अहम नहीं, बल्कि वह अनश्वर परमात्मा है जो न तो कभी मरता है और न ही किसी नश्वर भूत में फँसकर क्षय होता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- समभाव से देखने की योग्यता (Samabhava)
यह शिक्षा告诉我们 कि सच्ची दृष्टि केवल वह है जो भेदभाव को मिटाकर सबमें एक ही ईश्वर को देखती है। जब हम किसी में भी शत्रु या मित्र, सम अथवा विषम नहीं देखते, तभी हमें वास्तविक ज्ञान का लाभ होता है। - नश्वर और अनश्वर का भेद
यह कठोर सत्य कि शरीर और मन जैसे नश्वर तत्व क्षण-क्षण में बदलते रहते हैं, लेकिन उनमें विराजमान परमात्मा (अनश्वर) अटूट है। जो व्यक्ति इन दोनों के बीच का यह भेद नहीं समझता, वह वास्तव में 'देख' रहा है ऐसा कहना गलत होगा क्योंकि उसे सत्य की पहचान ही नहीं हुई है। - सर्वभूतों में ईश्वर का निवास
परमेश्वार केवल मंदिरों या पावन स्थलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे हर जीवित प्राणी और नष्ट होते हुए प्रत्येक वस्तु में समान रूप से उपस्थित हैं। इस भावना को अपनाना ही 'पश्यति' (वास्तविक देखने) की गणना है, जो मोक्ष का मार्ग खोलता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग और फल की आसक्ति को त्यागने का आधार प्रदान करता है, जो समभाव भाव से सीधा जुड़ा हुआ है।
- 3.30 — इसे पढ़कर आप सिद्धांतों में ईश्वर के प्रति समर्पण और कर्म करने की विधि को और गहराई से समझ पाएंगे।
- 12.15 — यह श्लोक उन गुणों का वर्णन करता है जो एक भक्त में होने चाहिए, जैसे कि सभी प्राणियों के प्रति करुणा और समभाव भाव।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.