भगवद्गीता 18.39

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.39 — "जो सुख प्रारम्भ में और परिणाम (अनुबन्ध) में भी आत्मा (मनुष्य) को मोहित करने वाला होता है, वह निद्रा,"
भगवद्गीता 18.39 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||१८-३९||

लिप्यंतरण

yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ . nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam ||18-39||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि कुछ सुख प्रारंभ में और परिणाम में भी मनुष्य के मन को धोखा देते हैं। ऐसा सुख नींद, आलस्य और बेपरवाही (प्रमाद) से उत्पन्न होता है जिसे 'तामस' या अज्ञान का सुख कहा गया है। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि जो कार्य मनुष्य को मोह में डाले रखे और उसकी उन्नति के रास्ते में बाधा बनाए, वह वास्तविक सुख नहीं बल्कि एक कठिन अवस्था की ओर ले जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक गीता के ज्ञान योग (Jnana Yoga) और सांख्य दर्शन की अवधारणाओं को प्रभावित करता है जिसमें गुणों (गुणात्मकता) का विश्लेषण किया गया है। यह त्रि-सूत्रीय सिद्धांत पर आधारित है कि सभी सुख या दुःख तीन गुणों - सत्त्व, रजस और तमस से उत्पन्न होते हैं, जहाँ 'तम' अज्ञान और आलस्य का प्रतीक है। यह भगवान कृष्ण द्वारा बताई गई 'बुद्धि योग' की आवश्यकता को रेखांकित करता है कि व्यक्ति को अपने कार्यों के परिणामों पर ध्यान देना चाहिए, न कि क्षणिक मोह में।

शब्दार्थ
यत् which, अग्रे at first, च and, अनुबन्धे in the seel, च and, सुखम् pleasure, मोहनम् delusive, आत्मनः of the self, निद्रालस्यप्रमादोत्थम् arising from sleep, indolence and heedlessness, तत् that, तामसम् Tamasic, उदाहृतम् is declared
पारंपरिक भाष्य
Anubandhe In the conseence after the termination. The pleasure that is begotten by evil habits like drinking liors and eating worthless things is delusive of the self. The man becomes oblivious of the path he ought to tread. Such pleasure is verily of the nature of darkness.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई गीता की समाप्ति ओर (अध्याय 18) में आता है। इस समय तक भगवान ने पांचों प्रकार के तामसिक, राजसिक और सात्विक सुख-दुःख का विस्तार से वर्णन कर दिया है ताकि अर्जुन अपनी संदेह को दूर कर सके। अर्जुन अभी भी युद्ध न करने की स्थिति में थे, इसलिए कृष्ण उन्हें प्रत्येक प्रकार के मोह और आलस्य का परिचय देकर उसे सात्विक बुद्धि (ज्ञान) की ओर ले जा रहे हैं।

आज के जीवन में

आज के समय में यह तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति महत्वपूर्ण परीक्षा या प्रोजेक्ट से पहले सोने या मॉव्इज़िंग का निर्णय लेता है, जिससे उसे क्षणिक आराम मिलता है। लेकिन परिणामस्वरूप वह कल की गंभीर स्थिति के लिए तैयार नहीं रह पाते और अपनी जिम्मेदारियों से भागने लगते हैं। इस अवस्था को 'प्रमाद' कहते हैं, जो व्यक्ति को लंबे समय में सफलता से दूर ले जाता है, इसलिए हमें अपने आलस्य पर काबू पाना चाहिए।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम होम वर्क करने के लिए बहुत थके हुए हो और सोने का मन कर रहा है। अगर तुम बिस्तर पर जाकर घंटों सोते रहो, तो शुरुआत में तुम्हें बहुत मज़ेदार लगेगा (सुख), लेकिन सुबह उठोगे तो क्लासीकल होगा और पढ़ाई का काम बच गया होगा। यह वही तामसिक सुख है जो आलस्य से मिलता है, क्योंकि इससे तुम्हें भविष्य में नुकसान होता है, ठीक जैसे मीठे पेपरी को खाने पर मुंह फूल जाता है।

दैनिक चिंतन

दूसरे, क्या आपका आज का दिन शारीरिक आलस्य या मानसिक प्रमाद (अनुचित सावधानी की कमी) से शुरू हुआ? अक्सर हम 'तमोगुण' के उस सुख को गलती से सच्चा शांति समझ लेते हैं जो न तो मूल में है और न ही परिणाम में। जब आप इस बात को पहचान लेंगे कि यह सुस्ती आत्मा की उन्नति का मार्ग नहीं, बल्कि उसका आवरण है, तब आप उसे पार करके वास्तविक प्रेमपूर्ण कर्म के लिए तैयार हो जाएंगे।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने मन में एक क्षण रुकें और देखें कि क्या आपका सुख केवल तब आ रहा है जब आप शारीरिक थकान, नींद या अव्यवस्था की दशा में हों। इस जागरूकता से पूछें कि यह 'मोह' आपको सच्ची शांति दे रहा है या केवल एक भ्रामक सुस्ती में डुबो रहा है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. भ्रामक सुख की पहचान
    तामसिक सुख वह है जो शुरू में और अंत दोनों ही समय आत्मा को मोहित करता है, लेकिन यह वास्तविक शांति नहीं बल्कि एक भ्रांति होती है। इसे शरीर के भारीपन या मन की धुंधलाहट से पहचाना जा सकता है जो हमें कर्म करने से रोकता है।
  2. निद्रालस्य का प्रभाव
    यह सुख सीधे निद्रा, आलस्य और प्रमाद (सावधानी की कमी) के स्त्रोत से उत्पन्न होता है। जब व्यक्ति इन तीन अवस्थाओं में फंस जाता है, तो वह अपने धर्म को पूरा करने में असमर्थ होकर पीछे हटता रहता है।
  3. परिणाम की अनदेखी
    तमसिक सुख का मुख्य लक्षण यह है कि इसके परिणाम (अनुबन्ध) में भी वह आत्मा को बंधन बनाए रखता है। यह एक ऐसा चक्र है जो व्यक्ति को कर्मों के फल से दूर रखता है और उसे मोह की गहराई में डुबो देता है।

विषय

तामसिक गुण (Tamasic Qualities)आलस्य और निद्रा (Laziness and Sleep)अज्ञान का सुख (Delusive Pleasure)कर्म की परिणाम (Consequences of Action)बुद्धि योग (Yoga of Wisdom)मोह से मुक्ति (Freedom from Delusion)

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  1. 18.23 — यह श्लोक त्रिविध दृष्टिकोण (सत्त्व, रज, तम) पर चर्चा करता है और यह समझने में मदद करेगा कि कर्म का स्वभाव क्या होना चाहिए।
  2. 14.8 — यह श्लोक 'रजोगुण' की प्रकृति को स्पष्ट करता है जो तमस और सत्त्व के बीच संतुलन बनाता है, जिससे आपका दृष्टिकोण अधिक गहरा होगा।
  3. 18.24 — यह श्लोक एक उत्कृष्ट कर्म का वर्णन करता है जो तमस की अवस्था के विपरीत, शुद्ध और परिणाम-आधारित होता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तामसिक सुख वास्तव में क्यों नहीं माना जाता?
यह सुख केवल क्षणिक आराम या मोह की अवस्था देता है, लेकिन प्रारंभ और अंत दोनों में व्यक्ति को धोखा देने वाला होता है। चूँकि यह निद्रा, आलस्य और बेपरवाही से उत्पन्न होता है, इसलिए इसका परिणाम हमेशा दुःख या विफलता की ओर जाता है, न कि सच्ची खुशी में।
क्या सोना भी एक तामसिक गतिविधि है?
नहीं, आवश्यकतानुसार नींद लेना स्वाभाविक और स्वास्थ्यवर्धक है। लेकिन जब आलस्य या निद्रा के कारण जिम्मेदारियों को नजरअंदाज किया जाता है, तो वह 'तामस' अवस्था बन जाती है जो मनुष्य की उन्नति में बाधा डालती है।
इस श्लोक का आधुनिक जीवन में क्या महत्व है?
आज के डिजिटल युग में लोग अक्सर सोशल मीडिया या गेमिंग में समय बर्बाद करते हैं जो तामसिक सुख की तरह काम करता है। यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि क्षणिक आनंद के पीछे भागे बिना अपने लक्ष्यों और भविष्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
'प्रमाद' का अर्थ क्या है और यह कैसे हानिकारक होता है?
प्रमार्द का अर्थ है बेपरवाही या सतर्कता की कमी, जिसमें व्यक्ति अपनी गलतियों को नहीं पहचान पाता। जब कोई कार्य करने के लिए तैयारी न करे और परिणामों की जिम्मेदारी लेने से डरे, तो वह प्रमार्द में होता है जो उसे विफलता तक धकेल सकता है।
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