भगवद्गीता 18.23

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.23 — "जो कर्म (शास्त्रविधि से) नियत और संगरहित है, तथा फल को न चाहने वाले पुरुष के द्वारा बिना किसी राग द्"
भगवद्गीता 18.23 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् | अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ||१८-२३||

लिप्यंतरण

niyataṃ saṅgarahitamarāgadveṣataḥ kṛtam . aphalaprepsunā karma yattatsāttvikamucyate ||18-23||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सात्त्विक या पवित्र कर्म कैसे होता है। ऐसा कर्म वह है जो शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाए, बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या आसक्ति के। इसमें फल की इच्छा न हो और na राग (प्रेम) या द्वेष (नफरत) का भाव हो।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्मयोग के मूलभूत सिद्धांतों को विकसित करता है, विशेष रूप से निर्लिप्तता और सात्विक प्रवृत्ति की अवधारणा। यह बताता है कि सच्चा आध्यात्मिक विकास तब होता है जब action (कर्म) स्वयं में पूर्ण हो जाए, न कि उसके परिणामों के लिए किया गया हो। यह संख्या दर्शन और कर्मयोग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है जो मोक्ष की ओर ले जाता है।

शब्दार्थ
नियतम् ordained, सङ्गरहितम् free from attachment, अरागद्वेषतः without love or hatred, कृतम् done, अफलप्रेप्सुना by one not desirous of the fruit, कर्म action, यत् which, तत् that, सात्त्विकम् Sattvic (pure), ुच्यते is declared
पारंपरिक भाष्य
Niyatam Ordained Obligatory. One is not excited to perform an obligatory action through love or hatred. This is a pure act. The performer of such pure action experiences great joy. He does his duty or any other work wholeheartedly not caring for the reward but offering it willingly at the feet of the Lord. He works in accordancw with the dictates of the scriptures. Now I will explain to thee? O Arjuna, the nature of action which is Rajasic or passionate. Do thou listen to Me with rapt attention.

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत के युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र पर चल रहा था जहाँ अर्जुन ने हत्यारे अपने बंधुओं और गुरुओं को मारने से इनकार कर दिया था। कृष्ण ने पहले तीन अध्यायों में धर्म, कर्मयोग और आत्मज्ञान की बातें बताई हैं। इस 18वें अध्याय के अंत में, जब अर्जुन विरक्त होकर युद्ध करना बंद करने का निर्णय ले रहा है, तो कृष्ण उसे चार प्रकारों (सात्त्विक, राजसिक, तामसिक) के कर्म और त्याग की व्याख्या करके मार्गदर्शन दे रहे हैं।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक प्रोजेक्ट टीम में काम कर रहे हैं जहाँ आपके सहकर्मी का व्यवहार बहुत खराब है और वे आपको अक्सर कम करते हैं, लेकिन उस परियोजना को पूरा करना कंपनी के लिए जरूरी है। इस स्थिति में सात्त्विक कर्म तभी होगा जब आप बिना किसी व्यक्तिगत नफरत (द्वेष) या पक्षपात (राग) के अपने काम का पूरी ईमानदारी से निष्पक्ष रूप से करेंगे, और परिणाम (बोनस या प्रमोशन) की चिंता किए बिना। आपका ध्यान सिर्फ 'कर्म' पर होगा न कि 'फल' पर।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम्हें अपने स्कूल का प्रोजेक्ट करना है, लेकिन तुम्हारा दोस्त उसमें मदद नहीं कर रहा और यह देखकर उसे गुस्सा आ रहा है। अगर तुम बिना किसी नफरत के, बस अच्छा काम करने की खुशी में अपना हिस्सा पूरा करते हो और परिणाम (अंक) का डर या लालच छोड़ देते हो, तो वह 'बेहतरीन' कर्म होगा। जैसे पानी साफ होता है जब उसमें गंदगी नहीं होती, वैसे ही यह काम दिल से साफ-सुथरा होता है।

दैनिक चिंतन

क्या आपने आज भी किसी कार्य के परिणाम से डरते हुए या उसे पाने की ज़िद रखकर किया? यह वचन आपको याद दिलाता है कि जब कर्म बिना राग-द्वेष और फल की इच्छा किए, शास्त्रविधि का अनुसरण करके किया जाता है, तो वह निःसंशय सात्विक बन जाता है। अपने भीतर के उस पुरुष को पहचानें जो कार्य में लगा रहता है लेकिन परिणाम से मुक्त होता है; यही आपके मानसिक शांति का मूल स्रोत है। आज प्रयास करें कि आपका कर्म 'क्या करना चाहिए' पर आधारित हो, न कि 'मुझे क्या मिलेगा' पर।

आज के लिए एक अभ्यास

आँखें बंद करें और एक ऐसा कर्म याद करें जिसे आपने बिना किसी राग-द्वेष के, फल की चिंता किए किया था। उस क्षण को महसूस करें जब कार्य करने वाला 'मैं' मिट गया और केवल स्वयं भगवान का नियमित साधन बचा। इस शांत स्थिति में श्वास लें कि यही कर्म आपकी आत्मा को सात्विकता की ओर ले जा रहा है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. राग-द्वेष से मुक्तता (Freedom from Attachment and Aversion)
    सात्त्विक कर्म वह है जो प्रिय या अप्रिय परिणामों के प्रति राग (लगाव) और द्वेष (नफरत) बिना किया जाता है। यह भावनात्मक संतुलन को बनाए रखते हुए कार्य करने की क्षमता दर्शाता है, जहाँ कर्ता स्वयं के भीतर स्थिर रहता है।
  2. फलपरिहार (Non-attachment to Results)
    सच्चा सात्त्विक कर्म फल की प्रत्याशा या लालसा से मुक्त होता है; यह केवल धर्माचरण पर केंद्रित रहता है। जब कार्य करने वाला परिणामों को भगवान पर अर्पित कर देता है, तो वह स्वयं और उसके कार्यों दोनों में शुद्धि प्राप्त करता है।
  3. नियत कर्म का महत्व (The Importance of Prescribed Duty)
    सात्त्विक कर्म 'नित्य' या शास्त्र-विहित होना चाहिए, न कि मनमानी के अनुसार। यह आत्मनिर्भरता और अनुशासन को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है चाहे परिणाम कुछ भी हों।

विषय

सात्त्विक कर्म (Sattvic Action)निराशावाद और आसक्ति की अनुपस्थिति (Absence of Attachment)राग-द्वेष से मुक्ति (Freedom from Love and Hatred)कर्मयोग का सार (Essence of Karma Yoga)फल त्याग (Renunciation of Fruits)शास्त्र द्वारा निर्देशित कार्य (Scripturally Ordained Duty)

संबंधित श्लोक

2.473.304.189.2718.6

आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग और फल-त्याग की मूल अवधारणा को स्थापित करता है जो इस वचन का आधार है।
  2. 3.8 — इसमें निर्देश दिया गया है कि अपने नित्य कर्मों (धर्मात) पर ध्यान देना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, जो सात्त्विक कर्म का विस्तार करता है।
  3. 12.15 — यह श्लोक उन गुणों को वर्णित करता है जिनसे भक्त पसंदीदा बन जाता हैं, और सात्त्विक कर्म करने वाले व्यक्ति की विशेषताओं का विस्तार से विश्लेषण करती है।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सात्त्विक कर्म और राजसिक कर्म के बीच मुख्य अंतर क्या है?
मुख्य अंतर यह है कि सात्त्विक कर्म बिना किसी राग (प्रेम) या द्वेष (नफरत) के, फल की इच्छा किए हुए किया जाता है। इसके विपरित राजसिक कर्म में व्यक्ति को स्वार्थ, लालच और परिणाम प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है, जो मन को त्रास देती है।
क्या सात्त्विक कर्म का अर्थ यह है कि हमें बिना सोचे-समझे काम करना चाहिए?
बिल्कुल नहीं; 'नियतम्' शब्द इसका प्रमाण देता है कि ऐसा कर्म शास्त्रों या उच्च मूल्यों के अनुसार, सही समय और स्थिति में किया जाना चाहिए। यह अंधविश्वास नहीं बल्कि एक परिपक्व निर्णय है जो स्वार्थ से मुक्त होकर विवेकपूर्ण होता है।
जब हम फल की आशा छोड़ते हैं, तो क्या हमें प्रेरणा खोने का डर नहीं लगता?
गीता के अनुसार, जब आप कर्म को ही अपना उद्देश्य बना लेते हैं और परिणाम ईश्वरीय व्यवस्था पर छोड़ देते हैं, तो मन में शांति और गहरा आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। यह डर या चिंता के स्थान पर एक नई ऊर्जा प्रदान करता है जो कर्म को अधिक कुशल बनाती है।
क्या 'राग-द्वेष' का अर्थ बस उदासीन हो जाना नहीं है?
नहीं, राग (अत्यधिक लगाव) और द्वेष (नफरत) से मुक्त होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति निष्क्रिय या भावनाहीन हो जाए। इसका अर्थ है कि आप प्रेम करते हैं लेकिन उससे बंधे हुए नहीं हैं, और नफरत नहीं करता लेकिन दुश्मनी भी नहीं रखता; आप केवल कर्तव्य का पालन करते हैं।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 18.23 →