भगवद्गीता 18.24

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.24 — "और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल की कामना वाले, अहंकारयुक्त पुरुष के द्वारा किया जाता है, "
भगवद्गीता 18.24 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः | क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ||१८-२४||

लिप्यंतरण

yattu kāmepsunā karma sāhaṃkāreṇa vā punaḥ . kriyate bahulāyāsaṃ tadrājasamudāhṛtam ||18-24||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि कर्म तब 'राजस' (उत्तेजित या आक्रामक) कहलाता है जब उसे करने वाले की मनोकामनाएं, ईषा और बहुत ज्यादा परिश्रम का कारण बनती हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि यदि आप किसी काम को केवल अपने अहंकार को बढ़ाने या फल पाने की आस में करते हैं, तो वह कर्म मानसिक तनाव और थकान उत्पन्न करता है। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि कार्य का उद्देश्य स्वयं होना चाहिए न कि परिणामों के लिए लालसा करना; अन्यथा कर्म करने वाले को निरंतर असंतोष और मेहनत से जूझना पड़ता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्म योग' के सिद्धांतों का विस्तार करता है जो कृष्णा द्वारा गीता में प्रमुख रूप से सिखाए गए हैं और यह 'सांख्य दर्शन' की तीन गुण (गुण) अवधारणाओं पर आधारित है। इसमें राजसिक गुण के स्वरूप को परिभाषित किया गया है, जो कर्म करने वाले व्यक्ति के भीतर अहंकार और लालसा के प्रभावों से उत्पन्न होता है। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि जब तक हमारे कार्यों की इच्छाएं (कामेप्सु) और अहंकार साफ नहीं होती, तब तक कर्म मुक्ति या शांति का मार्ग नहीं बन सकता।

शब्दार्थ
यत् which, तु but, कामेप्सुना by one longing for desires, कर्म action, साहङ्कारेण with egoism, वा or, पुनः again, क्रियते is performed, बहुलायासम् with much effort, तत् that, राजसम् Rajasic (passionate), उदाहृतम् is declared
पारंपरिक भाष्य
A passionate man performs various selfish actions. He boasts of his actions in public. Passion prompts him to do them. He can never work without expectation of a reward. Kamepsuna, phalepsuna The Rajasic or passionate man expects pleasures as fruits of action. A liberated sage alone is absolutely free from egoism. He will not dream even of a reward for the action, because all his desires are gratified when he realises Brahman. He is an Aptakama. (Aptakamasya ka spriha) How can there be longing or craving in a sage in whom all desires are gratified or burnt by the fire of SelfknowledgeEven the performer of a pure act, who has no knowledge of the Self is egoistic. If such be the case, the Rajasic and Tamasic workers are much more egoistic. In worldly parlance we speak of a learned Pundit This Pundit is a very modest, unassuming, and egoless Brahmana. Now listen? O Arjuna, to the characteristics of action that is of darkness.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई उपदेशावली का हिस्सा है, जो गीता के आखिरी अध्याय 18 (मोक्षासन योग) में स्थित है। इस समय तक कृष्ण ने पहले ही तीन प्रकारों की बुद्धि और ज्ञान की व्याख्या कर दी थी, और अब वे 'कर्म' के तीन रूपों (सात्विक, राजस, तामस) का वर्णन कर रहे हैं ताकि अर्जुन को सही कर्मयोग का मार्ग दिखाया जा सके। अर्जुन अपने संदेहों से मुक्त होकर युद्ध की ओर बढ़ने के लिए इस गहन दार्शनिक ज्ञान को प्राप्त कर रहा है, और यह श्लोक विशेष रूप उन कार्यों पर रोक लगाता है जो व्यक्तिगत लालसा या घमंड (अहंकार) से चलाए जाते हैं।

आज के जीवन में

आज के आधुनिक जीवन में, जब कोई कर्मचारी अपने प्रोत्साहन (promotion), बोनस या दूसरों की सराहना पाने के लिए बिना रुके बहुत अधिक देरी तक काम करता है और अगर उसे वह इनाम नहीं मिलता तो वह तनावग्रस्त हो जाता है। यह स्थिति 'राजस कर्म' का उदाहरण है, जहाँ कार्य स्वयं में आनंद की बजाय केवल परिणाम प्राप्त करने के लिए एक मशीनिश मेहनत बन गया है। इसका समाधान यह नहीं कि काम करना छोड़ दिया जाए, बल्कि यह बदलाव लाना है कि आप अपने कर्म को उसकी पूर्वापेक्षा (duty) और समर्पण की भावना से करें, न कि केवल फल की आस में।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें कि आप एक बड़ी रचना (जैसे कोई बड़ा घर या पेपर) बना रहे हैं, लेकिन आपको सिर्फ यह सोचकर काम करना है कि 'मुझे सबसे अच्छा इनाम मिलेगा' और दूसरों को दिखाना है कि मैं कितना हुनरी हूं। अगर आप ऐसा करेंगे तो शायद शुरू में सब कुछ ठीक लगे, लेकिन जल्दी ही आपको बहुत थकान महसूस होगी क्योंकि मन हमेशा इतने काम की चिंता में रहेगा। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जब हम सिर्फ अपने फल या अपनी खुशी के लिए बिना रुके मेहनत करते हैं, तो वह एक तरह का 'राजस' (बहुत ज्यादा उत्साही लेकिन तनावपूर्ण) काम बन जाता है, जिससे थकान होती है।

दैनिक चिंतन

आपने देखा होगा कि जब हम किसी काम को सिर्फ अपनी महत्ता साबित करने या फूल उड़ाने के लिए करते हैं, तो वह थका देने वाला हो जाता है और मन में अनंत चिंताएं पैदा करती है। भगवान कृष्ण इस श्लोक में बताते हैं कि अहंकार और इच्छाओं से युक्त काम 'राजस' होता है, जो हमें मानसिक शांति से दूर ले जाता है। आज आप अपने हर कार्य को एक प्रश्न के साथ करें: क्या मैं इसे करने का कारण सिर्फ खुद की महत्ता या फल की चाहना रख रहा हूँ? जब आप अहंकार और लालसा को त्यागकर कर्म करते हैं, तो वही परिश्रम आपको मोक्ष की ओर ले जाता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन की उस दौड़ को देखें जो आपको परिणाम के लिए काम करने पर मजबूर करती है। जब भी आप किसी कार्य में अहंकार या फल की इच्छा का संकेत पाएं, तो एक गहरा सांस लें और स्वयं से पूछें कि क्या यह कार्य ईश्वर को समर्पित किया जा रहा है? इस क्षण के लिए अपने कर्मों को परिश्रम में बदलकर उन्हें 'राजस' गुण से मुक्त करने का संकल्प लें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. राजसिक कर्म का स्वरूप
    जब कोई कार्य फल के लालच या अहंकार से प्रेरित होकर किया जाए, तो वह राजस गुण में वर्गीकृत होता है। ऐसे कर्म भले ही बहुत परिश्रमपूर्ण हों, लेकिन वे आत्मा को निरंतर तनाव और दुख का कारण बनते हैं क्योंकि ये मन की वृति को बाहर की ओर खींचते हैं।
  2. अहंकार के प्रभाव
    श्लोक में 'सहांकारेण' शब्द इस बात का संकेत देता है कि जब कर्ता स्वयं को ही सब कुछ मान लेता है, तो वह कार्य पवित्र नहीं रह जाता। अहंकार व्यक्ति को अपने परिश्रम पर नाटक करने और दूसरों से अनुग्रह मांगने के लिए प्रेरित करता है, जो आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बनती है।
  3. फल की इच्छा का बोझ
    कामनाओं (कांक्षुष) से युक्त कर्म हमेशा भविष्य के परिणामों को लेकर चिंतित रहने पर मजबूर करता है। जब तक व्यक्ति कार्य के फल की प्रतीक्षा में लगा रहता है, वह वर्तमान क्षण और ईश्वर की वास्तविक उपस्थिति से वंचित रह जाता है।

विषय

राजसिक कर्म (Rajasic Action)अहंकार और परिणाम की लालसा (Ego and Desire for Results)कर्म योग का मार्ग (Path of Karma Yoga)मनोवैज्ञानिक तनाव (Mental Stress in Work)त्रि-गुणात्मकता (The Three Gunas)मुक्ति और त्याग (Liberation and Renunciation)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक इस विचार को आगे बढ़ाता है और बताता है कि कर्म करने का अधिकार सिर्फ हमें होता है, न कि फल की इच्छा में।
  2. 3.25 — इसमें कृष्ण समझाते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति भी अज्ञानियों को हतोत्साहित किए बिना, अपने उदाहरण से सही ढंग से कार्य कैसे करता है।
  3. 12.15 — अंत में यह श्लोक बताता है कि कृष्णाभक्त (ईश्वर के भक्त) की प्रकृति कैसी होती है जो अहंकार और आसक्ति से मुक्त होकर चलती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'बहुलायासम्' (Bahulāyāsam) का क्या अर्थ है?
'बहुलायासम्' का शाब्दिक अर्थ है 'अत्यधिक परिश्रमयुक्त' या 'भारी मेहनत से युक्त'। कृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि जब कोई व्यक्ति केवल फल पाने की आस में बिना रुके बहुत अधिक शारीरिक और मानसिक ऊर्जा लगाता है, तो वह कार्य तनावपूर्ण हो जाता है। यह परिश्रम स्वयं में अच्छा नहीं है, लेकिन यदि उसका उद्देश्य लालसा या अहंकार से जुड़ा हो, तो वह थकान का कारण बनता है।
'राजस कर्म' और 'सात्विक कर्म' में क्या मुख्य अंतर है?
मुख्य अंतर यह है कि सात्विक कर्म बिना किसी लालसा या फल की आशा के, अपने दायित्व (dharma) को निभाने के लिए किया जाता है और इसमें सुखद शांति होती है। वहीं राजस कर्म 'कामेप्सु' (फल की इच्छा) और अहंकार से प्रेरित होता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को मानसिक तनाव और थकान का अनुभव होता है, भले ही वह बहुत मेहनत कर रहा हो।
यदि मैं अपने काम में फल की आशा रखता हूं तो क्या यह राजस कर्म होगा?
हाँ, यदि आपका मुख्य उद्देश्य केवल परिणाम प्राप्त करना है और आपके मन में अहंकार या लालसा प्रबल है, तो वह कार्य गीता के अनुसार 'राजस' माना जाएगा। इसमें कोई बुराइय नहीं है कि आपको फल की आशा हो सकती है, लेकिन कर्म योग का मार्ग यह सिखाता है कि हमें परिणामों से मुक्त रहकर और स्वयं काम को समर्पित करके कार्य करना चाहिए ताकि तनाव कम हो।
क्या अर्जुन ने इस श्लोक पर ध्यान दिया?
हाँ, यह गीता का अंतिम अध्याय है जहां कृष्ण ने सभी प्रकारों की व्याख्या करके अर्जुन को निश्चित किया था। अर्जुन ने इन सिद्धांतों को समझकर अपने मन के संदेहों को दूर किया और युद्ध का मार्ग चुना, जो कि उनके लिए एक उच्चतम कर्म योग की शुरुआत थी।
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