भगवद्गीता 18.25
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् | मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ||१८-२५||
anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanapekṣya ca pauruṣam . mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate ||18-25||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि 'तामसिक' (अंधकार) प्रकृति का वह कर्म जो बिना परिणाम, हानि या हिंसा की चिंता किए और अपनी क्षमता के विचार केवल मोह या भ्रम में आकर किया जाता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि ऐसे कार्य न करने वाले व्यक्ति को ही त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वे अंधेरे से निर्णय लेते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक गीता के 'कर्म योग' और 'गुण-तत्त्वज्ञान' (Sankhya) का अंतर्निहित भाव को विकसित करता है, जो बताता है कि कैसे प्रत्येक कार्य तीन गुणों में से किसी एक की ओर झुकता है। यह विशेष रूप से तमोगुण के प्रभाव और मोह (अज्ञान) के कारण उत्पन्न होने वाले विनाशकारी कर्मों का विश्लेषण करता है, जो आत्मा को बांधने वाला होता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का आखिरी उपदेश देते समय बोला गया था, जहाँ उन्होंने त्रिविध (सात्विक, राजसिक, तामसिक) प्रकार के त्याग और कार्यों की विस्तृत व्याख्या की थी। इससे पहले अर्जुन ने कृष्ण से 'त्याग' का सही मतलब पूछा था, जिस पर कृष्ण ने तीनों गुणों में कार्य करने के तरीकों को समझाया है। युद्ध के तनाव और भ्रम की स्थिति में अर्जुन को यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि 'अज्ञानता' या 'भ्रम' से किया गया काम कितना विनाशकारी हो सकता है, जो उन्हें सही दिशा देने का हिस्सा है।
आज के जीवन में
आधुनिक जीवन में एक उदाहरण यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति बिना अपनी क्षमता और समय की जांच किए, केवल भावनाओं या दबाव में आकर एक बड़ा व्यापार शुरू कर देता है। यदि वह इस बात का विचार नहीं करता कि इससे उसकी वित्तीय स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है (क्षय), या यह कार्य उसे और उसके परिवार को कैसे हानि पहुँचा सकता है, तो वह 'अनास्था' में किया गया तामसिक कर्म कर रहा है। ऐसे निर्णय लेने से बचकर व्यक्ति पहले अपने लक्ष्य की जांच करता है ताकि भविष्य में पछतावा न हो।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जब कोई बच्चा बिना सोचे-समझे किसी जोखिम भरी गतिविधि शुरू करता है, जैसे कि ऊँची दीवार पर चढ़ जाना या नदी में कूद देना, तो उसे 'तामसिक' कार्य कहते हैं। यह तभी होता है जब हमें डर का अंदाजा नहीं लगता और हम सिर्फ एक मित्र की बात सुनकर या लालच में आकर बिना सोचे कुछ करते हैं। सही तरीका यही है कि कोई भी काम शुरू करने से पहले देखें कि क्या इससे आपको या किसी को चोट तो नहीं लगेगी, और आपमें यह करना है या नहीं।
दैनिक चिंतन
प्यारे मित्र, क्या आपने कभी ध्यान दिया कि हमारी अधिकांश व्यस्तताएं केवल भ्रम (moha) में की गई हैं? जब हम परिणामों, नुकसान या हिंसा का विचार किए बिना किसी काम को आरम्भ करते हैं, तो वह तामसिक हो जाता है। इस गीता-वचन से सीखें कि अपने हर कर्म के पृष्ठभूमि में ज्ञान और स्पष्ट दृष्टि बनाए रखें ताकि मोह की ओजस्वी शक्ति आपको बंध न सके।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए एक क्षण रुककर देखें कि क्या आप कोई कार्य परिणाम, हानि या हिंसा की चिन्ता किए बिना केवल भ्रम (moha) में कर रहे हैं। अपने मन को शांत करें और पूछें: 'क्या यह काम मेरे मोह से प्रेरित है या सत्य ज्ञान से?'
मुख्य शिक्षाएँ
- मोह (Moha) से मुक्त कर्म का महत्व
यदि कोई कार्य केवल भ्रम और अज्ञान की वजह से किया जाए, तो वह तामसिक माना जाता है। सच्चा साधक परिणामों या हानि को लेकर चिन्तित नहीं होता, बल्कि विवेक (discernment) का उपयोग करता है। - हिंसा और नुकसान की अनदेखी
यह श्लोक चेतावनी देता है कि यदि कोई कर्म अन्य जीवों को हानि या हिंसा पहुंचा सकता हो, लेकिन उसे अन्जाने में किया जाए, तो वह तामसिक है। सार्मथ्य (paurusham) का विचार किए बिना चलना भी एक प्रकार की आलसी अवस्था है। - तामस कर्म का परिणाम
जो कार्य मोहवश, निष्कल्प और हानि-हित में किया जाता है, वह मनुष्य को अज्ञान और पाप के गढ़े में धकेल देता है। भगवान श्री कृष्ण इससे मुक्त होने की ओर मार्ग दिखाते हैं जो सज्जन कर्मों से जुड़ा होता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस श्लोक के बाद इस अद्भुत वचन को पढ़ें जो आपसे कहता है कि 'कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं'।
- 3.27 — इस श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि प्राणी प्रकृति के गुणों (gunas) से बंधे होते हैं और कर्म करते हुए भी स्वयं को न करवाता।
- 18.29 — इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण तामसिक, राजसिक और सात्विक बुद्धि का विस्तृत वर्णन करते हैं ताकि आप स्वयं को पहचान सकें।
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