भगवद्गीता 18.38
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||१८-३८||
viṣayendriyasaṃyogādyattadagre.amṛtopamam . pariṇāme viṣamiva tatsukhaṃ rājasaṃ smṛtam ||18-38||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि राजसिक सुख वह है जो इन्द्रियों और वस्तुओं के मिलन से आता है। प्रारंभ में यह सुख मधुर लग सकता है, जैसे अमृत हो, लेकिन जब समय बीत जाता है तो इसका परिणाम विष जैसा दुःख बन जाता है। कृष्ण का मुख्य संदेश है कि जो सुख क्षणिक आनंद देता है और बाद में पीड़ा पहुँचाता है, वह राजसिक प्रकृति वाला नहीं है जो स्थायी शांति लाए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह उपदेश गीता के 'संख्या' (Sankhya) दर्शन और 'कर्म योग' की अवधारणाओं को समझने में मदद करता है जहाँ कर्मा फलाशक्ति का त्याग किया जाता है। यह राजोगुण की प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है जो संसारिक सुखों के पीछे भागना और उन्हें अन्त तक विषाक्त मानना सिखाता है, जिससे आत्म-ज्ञान (Self-knowledge) प्राप्त होता है कि वास्तविक शांति गुण-तीतर से बाहर होती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरूक्षेत्र के युद्धक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जब वे अपने धर्म और भाई-भाइयों की लड़ाई में उलझे हुए थे। इस समय तक कृष्ण ने गीता का अध्याय १८ समाप्त करने वाले उपदेश दिए हैं और 'मोक्ष संन्यास योग' के तहत विभिन्न प्रकार के सुख, दान और ज्ञान की वर्गीकरण कर रहे हैं। अर्जुन अब भ्रम से मुक्त होकर कृष्ण द्वारा बताई गई तीन गुणों (सात्त्विक, राजसिक, तामस) को समझने में सक्षम हुए हैं।
आज के जीवन में
आधुनिक जीवन में जब कोई व्यक्ति नौकरी या पद के लिए अत्यधिक तनाव लेकर काम करता है और उसे शुरुआत में महत्व की भावना मिलती है, लेकिन बाद में स्वास्थ्य खराब हो जाता है और मानसिक अवसाद आता है। यह राजसिक सुख का उदाहरण है जहाँ क्षणिक सफलता के चक्कर में दीर्घकालिक शांति बलिदान कर दी जाती है। हमें सीखनी चाहिए कि ऐसे कार्यों को चुनना जो तुरंत फायदे न दें लेकिन भविष्य में भी सुखद परिणाम लाएँ, जैसे संतुलित जीवन और स्वस्थ आहार।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बच्चों, जब हम बहुत मीठी मिठाई खाते हैं तो शुरू में उसे खाने का आनंद आता है और लगता है कि यह सबसे अच्छा काम है। लेकिन अगर हम इसे बहुत ज्यादा खा लेते हैं, तो अंत में पेट दर्द हो जाता है और हमें बुरा महसूस होता है। इसी तरह जो चीजें सिर्फ इन्द्रियों को खुश करने के लिए होती हैं, वे शुरुआत में अच्छी लगती हैं लेकिन बाद में मुसीबत देती हैं।
दैनिक चिंतन
क्या आपने महसूस किया है कि जो चीजें हमारे लिए सबसे अधिक सुखावह लगती हैं, अक्सर वही भविष्य में कष्ट देती हैं? यह राजसिक प्रकृति का एक गहरा सत्य है; विचार करें कि कैसे क्षणभंगुर आनंद आपको दीर्घकालीन शांति से दूर ले जा सकता है। जब आप किसी इच्छित वस्तु या अनुभव को प्राप्त करते हैं, तो उसकी परछाइयों और परिणामों की ओर भी देखें ताकि भ्रम न हो जाएँ।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को विषयों और इन्द्रियों के आनंद पर ध्यान दें, जो प्रारंभ में मधुर लगता है। गहराई से सोचें कि इसी क्षणिक सुख का अंत कठोर दुःख या शोक की ओर कैसे जाता है, जैसे विषय-सुख के बाद आने वाला पीड़ादायी परिणाम।
मुख्य शिक्षाएँ
- संयोग का विषाक्त प्रकृति
जब सुख केवल बाहरी विषयों और इन्द्रियों की संगत से उत्पन्न होता है, तो वह अंततः कष्टदायी हो जाता है। यह एक भ्रमपूर्ण आकर्षण है जो प्रारंभ में 'अमृत' जैसा लगता है लेकिन बाद में 'विष' बनकर रह जाता है। - राजसिक सुख की स्वभाव
श्री कृष्ण ने इस प्रकार के संयोगजनित आनंद को विशेष रूप से 'राजसम' कहा है, जो उत्तेजना और मोह पर आधारित होता है। यह सुख अस्थायी है और इसके बाद निस्सारता या त्रासदायक परिणामों की ओर ले जाता है। - परिणाम का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन
वास्तविक बुद्धिमानी केवल प्रारंभिक आनंद पर नहीं, बल्कि उस सुख के अंत में होने वाले परिणामों को देखने की क्षमता पर है। हमें ऐसे कर्म और संयोगों से दूर रहना चाहिए जो दीर्घकालीन हानि या दुःख का कारण बनते हैं।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — इस अध्याय में कर्मयोग का सार जानने के लिए यह श्लोक आवश्यक है जो फल की चिंता मुक्त होकर कार्य करने को सिखाता है।
- 3.30 — इसमें देवताओं और आत्म-ज्ञान के लिए कर्म समर्पण का विवरण है जो राजसिक मोह से मुक्ति दिलाता है।
- 12.15 — यह श्लोक भक्तों को आत्म-निष्ठा और शांति के मार्ग पर ले जाता है जो क्षणिक सुख से उच्चतर स्थिति प्रदान करता है।
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