भगवद्गीता 16.11

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.11 — "मरणपर्यन्त रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं से ग्रस्त और विषयोपभोग को ही परम लक्ष्य मानने वाले ये आसुरी लो"
भगवद्गीता 16.11 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ||१६-११||

लिप्यंतरण

cintāmaparimeyāṃ ca pralayāntāmupāśritāḥ . kāmopabhogaparamā etāvaditi niścitāḥ ||16-11||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि आसुरी (दैवीय गुणों से रहित) लोग मृत्यु तक अनंत चिंताओं में जीते हैं और अपनी केवल कामनाओं व भोग-विलास को ही जीवन का परम लक्ष्य मान लेते हैं। यह श्लोक बताता है कि जो व्यक्ति धर्म, आत्मज्ञान या किसी उच्चतम सत्य की तलाश नहीं करता, वह केवल 'इतना ही काफी है' (भौतिक सुख) में सीमित होकर रह जाता है। कृष्ण का संदेश यह है कि अंत तक बनी रहने वाली चिंताओं और निरंतर लालसा से मुक्त होने के लिए हमें भोगों की ओर नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की ओर ध्यान देना चाहिए।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक संख्य दर्शन (Sankhya) के सिद्धांतों की व्याख्या करता है, जो 'आत्म' और 'अनात्मा' (शरीर/इंद्रियां) में स्पष्ट भेद करने पर बल देता है। यह कर्म योग (Karma Yoga) का एक महत्वपूर्ण पहलू भी है, जहाँ अर्जुन को सिखाया जाता है कि केवल फलों की लालसा और चिंता से मुक्त होकर ही व्यक्ति आसुरी प्रकृति से दैवीय प्रकृति में परिवर्तित हो सकता है। यह कर्मों पर आधारित नहीं, बल्कि मानव मनोदशा (Buddhi) के स्वरूप और उसके उद्देश्य को परिभाषित करता है।

शब्दार्थ
चिन्ताम् cares, अपरिमेयाम् immeasurable, च and, प्रलयान्तम् ending only with death, उपाश्रिताः refuged in, कामोपभोगपरमाः regarding gratification of lust as their highest aim, एतावत् that is all, इति thus, निश्चिताः feeling sure
पारंपरिक भाष्य
They are beset with immense cares, worries and anxieties and their minds are engrossed in aciring and preserving the countless sensual objects. They have got the strong conviction that the sensual enjoyment is the highest end of a man. They are steeped in enjoying the objects of the senses. They firmly believe that that is everything. They believe that sensual enjoyment is the supreme source of happiness and there is no such thing as eternal bliss of the soul or transcendental bliss of the Self. They have no belief in the happiness in another world (or plane) or in the perennial bliss which is independent of sensual objects, which is beyond the reach of the senses. They have a dull and gross intellect, and so they cannot grasp the subtle higher truth. Sensual enjoyment is the greatest object of attainment for them.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक संदेश है, जो 'दिव्यासुर संपदा विभाग योग' (अध्याय 16) का हिस्सा है। इस समय तक कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि दैवीय और आसुरी गुणों में क्या फरक है, और अब वे विशिष्ट रूप से उन लोगों की मनोदशा का वर्णन कर रहे हैं जो केवल लालसाओं में डूबे हुए हैं। अर्जुन युद्ध के बोझ तले दबा हुआ था और कृष्ण उसे यह समझा रहे थे कि दुनिया के कुछ लोग कैसे मृत्यु तक चिंताओं का शिकार रहते हैं, जो उन्हें शांत होने नहीं देती।

आज के जीवन में

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में बहुत से पेशेवर या व्यवसायिक व्यक्ति इसी '16.11' वाली स्थिति का सामना करते हैं: वे लगातार अधिक पैसा कमाने और नए खरीदे गए वस्तुओं के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन मृत्यु तक चलने वाले अनंत डर (चिंता) से परेशान होते हैं। जब एक व्यक्ति अपनी सफलता को केवल बैंक बैलेंस या पदनाम तक सीमित कर लेता है और सोचता है कि 'इतनी ही मेरी ज़िंदगी का उद्देश्य है', तो वह गहरे तनाव में जीने लगता है। जीवन की सच्ची शांति के लिए, हमें अपने लक्ष्यों को भौतिक उपभोग से हटाकर आत्म-संतुष्टि और सेवा भाव जैसे अधिक स्थायी मूल्यों पर केंद्रित करना होगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें कि एक ऐसा दोस्त है जो सिर्फ अपने खिलौनों और मिठाइयों को ही अपनी पूरी दुनिया मानता है। वह हर पल सोचता रहता है, 'अगले दिन क्या मिलेगा?' या 'मुझे यह क्यों नहीं मिला?', इसलिए वह कभी खुश नहीं होता और हमेशा घबराया रहता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि असली खुशी सिर्फ खिलौनों में नहीं है, बल्कि अपने दिल को शांत करने और दूसरों की मदद करने में है। जब हम केवल 'मैं क्या पाऊंगा' सोचने की जगह यह देखेंगे कि हम दुनिया का कितना अच्छा हिस्सा बना सकते हैं, तो हमारी चिंताएं खत्म हो जाएंगी।

दैनिक चिंतन

क्या आप भी कभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि भोजन, धन और सुखों के बिना जीवन अधूरा है? यह आसुरी प्रवृत्ति हमें सीमित करती है और अज्ञान में बांध लेती है। अपने दिनों की शुरुआत इस निश्चय से करेंगे कि 'इतना ही सत्य है' — यानी केवल ईश्वर-साक्षात्कार ही परम लक्ष्य है, न कि भोगों का सीमित आनंद।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में उठने वाली अनंत चिंताओं और भोग-विलास की लालसा को पहचानें। इन 'असार' विचारों का त्याग करके, केवल ईश्वर पर श्रद्धा रखकर आत्मिक शांति का अनुभव करें कि वास्तविक सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अपरिमित चिंताओं की जड़
    यह श्लोक बताता है कि दैवी प्रकृति में रहने वालों के विपरीत, आसुरी लोग मृत्यु तक चलने वाली निरंतर और असीमित चिंतन (cinta) से ग्रस्त होते हैं। यह चिंता भविष्य की उम्मीद या डर नहीं है, बल्कि सुखों को पाने के लिए एक अनसन्तुष्ट इच्छाशक्ति का रूप है जो कभी शांत नहीं होती।
  2. भोग-विलास परम लक्ष्य
    आसुरी व्यक्ति 'कामोपभोग' को जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान लेते हैं और इसमें ही अपना आनंद खोजने की गलतफहमी में रहते हैं। वे समझते नहीं कि सुखों का भोग क्षणिक है, जबकि सत्य केवल आत्म-साक्षात्कार या ईश्वर प्राप्ति में निहित है।
  3. सीमित दृष्टि और अज्ञान
    'एतावदिति' (इतना ही सत्य है) कहकर ये लोग अपनी सीमित समझ को पूर्ण तथ्य मान लेते हैं, जो उन्हें आध्यात्मिक उन्नति से रोकती है। यह दृष्टि अज्ञान की गहराई में बांध देती है और मनुष्य को उस 'अनंत' सत्य से वंचित रखता है जिसके लिए वह जन्मा था।

विषय

दिव्य और आसुरी स्वभावलालसा का प्रबंधनमन की चिंताएंकर्म योग का महत्वआत्म-ज्ञान और भोगजीवन का उद्देश्य

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — कर्म करने के लिए और फल की चिंता न करने का सिद्धांत सीधे इस श्लोक में वर्णित 'चिंता' को दूर करता है।
  2. 3.27 — इंद्रियों और मन के द्वारा कर्मों को करवाने वाले प्रकृति-गुणों की चर्चा, जो आसुरी प्रवृत्तियों का मूल कारण हैं।
  3. 16.2 — इस श्लोक के तुरंत बाद आने वाला यह अंश 'अमित्रता' और 'काम' जैसे अन्य दैत्य गुणों की विस्तृत व्याख्या करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आसुरी लोग वास्तव में कौन होते हैं?
आसुरी लोग वे नहीं जो भयानक दिखते हैं, बल्कि वे हैं जिनका जीवन केवल इंद्रियों की सन्तुष्टि और भोगों तक सीमित है। ये व्यक्ति धर्म या उच्च तत्व को नकारकर 'इतना ही काफी है' (भौतिक सुख) में विश्वास करते हैं, जो उन्हें मृत्यु तक चिंताओं के शिकार बनाए रखते हैं।
क्या भगवद गीता कहती है कि हमें खाना-पेयन या सुखों से दूर रहना चाहिए?
नहीं, गीता कथित रूप में वियोग (त्याग) की बात नहीं कर रही है। यह सिर्फ 'अति' और 'लालसा' पर रोक लगाती है जब तक कि वह व्यक्ति के आत्म-ज्ञान या धर्म का मार्ग अवरुद्ध न हो जाए। उद्देश्य भोगों को त्यागत करना नहीं, बल्कि उन्हें एक साधन बनकर चलना है जो हमें मृत्यु की चिंता से मुक्त करे।
'अपरिमित चिंता' का अर्थ क्या है और यह जीवन को कैसे प्रभावित करता है?
इसका अर्थ है कि आसुरी व्यक्ति कभी भी संतुष्ट नहीं होता; उसे हमेशा भविष्य के लिए, या जो मिल चुका है उससे अधिक पाने की चिंता रहती है। यह स्थिति मृत्यु (प्रलय) तक चलने वाली एक अंतहीन मानसिक तनाव की अवस्था बना देती है, जिसमें व्यक्ति कभी शांति नहीं पा सकता और हमेशा डरा हुआ रहता है।
क्या यह श्लोक केवल पुराने समय के लिए था या आज भी लागू होता है?
यह श्लोक आज भी पूरी तरह से प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक समाज में लोग लगातार नए-नए खरीदने और अधिक सफलता पाने की चिंताओं (Stress) में जी रहे हैं। जब कोई व्यक्ति केवल भौतिक उपभोग को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान लेता है, तो वह इस श्लोक द्वारा वर्णित 'आसुरी' स्थिति में आ जाता है।
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