भगवद्गीता 16.10
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ||१६-१०||
kāmamāśritya duṣpūraṃ dambhamānamadānvitāḥ . mohādgṛhītvāsadgrāhānpravartante.aśucivratāḥ ||16-10||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग कामनाओं की अपूर्णीय इच्छा में जीते हैं, वे दम्भी, अभिमानी और मदग्रस्त हो जाते हैं। ये व्यक्ति मोह के कारण गलत धारणाएं ग्रहण करते हैं और अपने अशुद्ध संकल्पों से दुष्ट कार्य करने लगते हैं। इस श्लोक का मुख्य शिक्षा यह है कि आत्म-ज्ञान की अनुपस्थिति में अनंत इच्छाएँ मनुष्य को अधर्म की ओर ले जाती हैं, न कि मोक्ष या सद्गुण की ओर।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक कर्म योग और ज्ञान योग के सिद्धांतों का एक महत्वपूर्ण पहलू है जो 'असुरिक' प्रकृति की परिभाषा करता है। यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति मोह (मिथ्या धारणा) और कामनाओं में फंसा होता है, तो उसे ब्रह्मांड के सत्य का ज्ञान नहीं रहता और वह अशुद्ध कर्मों की ओर प्रवृत्त हो जाता है। यह संख्या दर्शन (संख्य योग) के अनुसार भिन्नताओं को समझने में मदद करता है कि कैसे आत्म-ज्ञान की अनुपस्थिति व्यक्ति को नष्ट करती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की कुरुक्षेत्र युद्ध भूमि में स्थित है, जहाँ अर्जुन ने हथियार फेंककर संदेह व्यक्त किया था और द्रोणाचार्य के प्रति अपने प्रेम व विरोध का उलझन दिखाया। इस समय पर कृष्ण ने अर्जुन को देवताओं (दाइवी) और असुरों (आसुरी) स्वभाव की व्याख्या करना शुरू किया है, जो उनके मनोदशा के संतुलन के लिए आवश्यक था। यह श्लोक उस अध्याय का हिस्सा है जहाँ कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि असुरिक प्रकृति वाले लोग कैसे अपनी इच्छाओं में खोकर नष्ट हो जाते हैं, जबकि एक युद्ध योद्धा के रूप में अर्जुन को यह समझना था।
आज के जीवन में
आज की दुनिया में, मान लीजिए आप किसी ऑफिस प्रमोशन या बोनस के लिए बहुत ज्यादा चिंतित हैं और आपको लगता है कि यदि वह नहीं मिला तो आपकी सफलता समाप्त हो जाएगी। इस स्थिति में यदि आप दूसरों को घुसाते हैं, झूठ बोलकर काम लेने की योजना बनाते हैं या अपने सहकर्मियों के प्रति घमंडी व्यवहार करते हैं, तो आप उस 'दम्भ और मोह' का शिकार हो रहे हैं जो इस श्लोक में वर्णित है। असली सफलता तब मिलती है जब हम परिश्रम (कर्म) पर ध्यान देते हैं, न कि केवल फल की लालसा या दूसरों को नीचा दिखाने वाले व्यवहार पर।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे कोई बच्चा जन्मदिन पर बहुत ज्यादा तोफे और चॉकलेट चाहता है, लेकिन उसे वह सब नहीं मिल पाती तो वह गुस्से में आ जाता है या झूठ बोल देता है। यही लोग होते हैं जो हमेशा 'और', 'और' चीजें मांगते रहते हैं और जब उन्हें नहीं मिलतीं तो वे घमंडी हो जाते हैं। कृष्ण जी कह रहे हैं कि ऐसे लोगों की सोच गलत होती है, जैसे कोई अंधेरे में रास्ता भूल जाए, इसलिए हमें खुश होने के लिए सच्चाई पर ध्यान देना चाहिए न कि सिर्फ चीजों को पाने के लालची बनने।
दैनिक चिंतन
क्या आपने कभी महसूस किया है कि जब हम अपनी इच्छाएं पूरी करवाने के लिए दम्भ और घमंड में डूब जाते हैं, तो सुख की जगह अशांति मिलती है? यह श्लोक आपको याद दिलाता है कि मोहवश गृहीत मिथ्या धारणाओं ने हमें सच्चाई से कितना दूर कर दिया है। अपने भीतर के उस 'अशुद्ध संकल्प' को पहचानकर, उसे त्यागने का प्रयास करें और देखिए कि कैसे आप अधिक शांत और स्पष्ट हो जाते हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में जाग रही 'अपूर्ण कामनाओं' को पहचानें और देखें कि वे आपको कितनी बार निराश करती हैं। इन आकांक्षाओं के पीछे छिपे 'दम्भ, मान और मद' की जड़ों को शांत भाव से देखकर, मिथ्या धारणाओं (मोह) का त्याग करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- दम्भ, मान और मद की जड़ें
यह श्लोक बताता है कि दुष्युत्त आचरण के मूल में कभी न पूर्ण होने वाली कामनाएं (असंतोष) होती हैं। जब व्यक्ति दम्भ, घमंड और अहंकार से युक्त हो जाता है, तो वह अपने व्यवहार को विपरीत दिशा में धकेलता है। - मोहवश मिथ्या धारणाएं
कामनाओं के आसक्ती से व्यक्ति मोह (अज्ञान) का शिकार होकर सत्य को नहीं देख पाता और असत्य को ही सच मान लेता है। यह गलत धारणाएँ उसे कर्मों की शुद्धि में बाधा डालती हैं और अशुद्ध संकल्प पैदा करती हैं। - अशुद्ध व्रत और कार्य
जब इन पापपूर्ण गुणों का प्रभाव होता है, तो व्यक्ति के आचरण (व्रत) अशुद्ध हो जाते हैं और वे भौतिक जगत् में ऐसे कर्म करते हैं जो अनंत दुख देते हैं। यह राक्षसी स्वभावे की पहली सीमाओं को उजागर करता है कि कैसे ये गुण मनुष्य को विनाश की ओर ले जाते हैं।
विषय
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आगे पढ़ें
- 16.24 — इसके बाद इस अध्याय में बताए गए 'शास्त्र विधि' का महत्व समझें जो दैवी और आसुरी स्वभाव के बीच सही मार्गदर्शन करता है।
- 16.2 — दैवी गुणों की सूची को पढ़कर देखें कि दम्भ, मोह और अशुद्ध व्रत का विपरीत क्या है जो आपको आगे बढ़ाएगा।
- 16.5 — यह श्लोक बताता है कि कौन सी स्वभाव वाली व्यक्ति 'दैवी' और कौन 'आसुरी' हैं, जो आपके वर्तमान चिंतनों की पुष्टि करेगा।
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