भगवद्गीता 16.12
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः | ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ||१६-१२||
āśāpāśaśatairbaddhāḥ kāmakrodhaparāyaṇāḥ . īhante kāmabhogārthamanyāyenārthasañcayān ||16-12||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जिन लोगों के पास दैवीय गुण नहीं होते, वे सैंकों आशाओं और बाधाओं में फंस जाते हैं। ऐसे व्यक्ति केवल काम (इच्छा) और क्रोध की वश में होकर धर्म का उल्लंघन करते हुए भीड़-भाड़ से अमीर बनने या भोगों को पूरा करने की चेष्टा करते हैं। इस श्लोक का मुख्य शिक्षण यह है कि अन्यायपूर्ण तरीकों से प्राप्त धन और सुख मनुष्य को आत्मा के लिए बंधनों में जकड़ देता है, न कि मुक्ति दिलाते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म योग' और 'संख्य दर्शन' की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है कि कैसे निष्पक्ष कर्म (अन्यायी) मनुष्य के आत्मा को बांधते हैं। यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा वर्णित 'आत्म-ज्ञान' और 'विवेक' की अनुपस्थिति का परिणाम है, जहाँ व्यक्ति अहंकार में फंसकर ब्रह्म (परब्रह्म) से दूर हो जाता है। यह शिक्षा भक्ति योग के पथ पर चलने वाले को चेतावनी देती है कि काम और क्रोध जैसे पापों का त्याग न करने पर मुक्ति संभव नहीं होती।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर हुआ है, जहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे। इससे पहले कृष्ण ने पांडवों और दुर्योधनों में गुणात्मक अंतर स्पष्ट किया था और अब वे उन 'आसुरिक' (दैवीय) स्वभाव वाले लोगों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं जिनके पास न्याय की समझ नहीं है। कृष्ण इस संदर्भ में अर्जुन को यह दिखाते हैं कि युद्ध का कारण और भी गहरा था, क्योंकि आसुरिक गुणों वाला व्यक्ति धर्म के पथ से भटककर केवल लालच और क्रोध में जीता रहता है।
आज के जीवन में
आजकल कई लोग अपने करियर या बिज़नेस में तेजी से अमीर बनने की दौड़ में अनैतिक तरीके अपनाते हैं, जैसे कि नकली सामान बेचना या धोखा देना। अगर कोई व्यक्ति केवल 'अन्यायपूर्वक धन' जमा करने पर केंद्रित है और काम-क्रोध (लालच और गुस्सा) में डूबा हुआ है, तो वह तनाव और चिंता से घिरा रहता है भले ही उसके पास पैसे हों। इसका समाधान यह है कि हमें अपनी उम्मीदों (आशाओं) को संयत करना चाहिए और धन कमाने के लिए न्यायपूर्ण मार्ग का चुना जाना चाहिए, ताकि मन शांत रहे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जाना-पहचाने दोस्तों की तरह सोचो जो सिर्फ अपने खिलौने या चॉक्लेट पाने के लिए दूसरों का सामान छीन लेते हैं, वे हमेशा परेशान रहते हैं। जैसे मकड़ी जाल में फंसकर हिल नहीं पाती है, वैसे ही काम और गुस्से की आदत वाले लोग भी अपनी सैकों इच्छाओं के बंधनों से कबूल करके खुश होना भूल जाते हैं। जब हम गलत तरीके से कुछ पाने की कोशिश करते हैं, तो हमें लगता है कि बहुत मज़ा आएगा, लेकिन असल में हम एक जाल में फंसकर उदास हो जाते हैं।
दैनिक चिंतन
देखो, हम अक्सर लाखों छोटी-बड़ी आशाओं की माला पहन कर खुद को बांध लेते हैं और फिर उनका भोग पाने के लिए अन्याय का रास्ता अपना लेते हैं। यह काम और क्रोध जो आपको घेरता है, क्या वास्तव में आपकी सुखी जिंदगी बना रहा है या बस एक चक्र बनकर आपकी ऊर्जा को निगल रहा है? आज इस आंतरिक संघर्ष के बीच शांति से बैठें और समझें कि सच्चा संग्रह धन का नहीं, बल्कि अंतर्मन की शुद्धि में ही होता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपनी आशाओं के उस जाल को देखें जो आपको कर्म और कामना में बांधे रखता है। स्वयं से पूछें कि क्या आपका धन संग्रह विषयभोग की पूर्ति या किसी उच्चतर सत्य के लिए है? एक क्षण रुककर, इस बात का आभार मानें कि आप कर्मों के बन्धनों से मुक्त हो सकते हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- काम-क्रोध का जाल
मानव मन अनंत आशाओं और इच्छाओं से जुड़ा हुआ एक जटिल नेटवर्क बन जाता है जो उसे बंधु बनाता है। यह काम और क्रोध के वश में आने वाले व्यक्ति को तार्किक निर्णय लेने की क्षमता ही नहीं दे पाते, वे अन्याय का मार्ग अपना लेते हैं। - अन्यायी धन संग्रह
विषयभोगों को पूरा करने के लिए कर्मयोगी की जगह दुष्ट व्यक्ति गलत तरीकों से अर्थ का संचय करते हैं। यह आचरण न केवल उनके अपने जीवन में पाप लाता है, बल्कि समाज और पर्यावरण दोनों के लिए विनाशकारी सिद्ध होता है। - आशापाशों से मुक्ति
सैकड़ों आशाओं की चेन को तोड़ने का एकमात्र मार्ग धर्म और योग में स्थित होना है, न कि इन्द्रिय सुखो के पीछे भागना। जब तक हम काम और क्रोध पर विजय नहीं पा लेते, तब तक हमें बंधु बनाए रखने वाले इन आशाओं से मुक्ति मिलनी संभव नहीं होगी।
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