भगवद्गीता 16.13
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ||१६-१३||
idamadya mayā labdhamimaṃ prāpsye manoratham . idamastīdamapi me bhaviṣyati punardhanam ||16-13||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
यह श्लोक पापस्वभाव (द्विष्ट) पुरुष का वर्णन करता है जो अहंकार में डूबा हुआ है। वह कहता है, 'मैंने आज यह धन-संपदा प्राप्त की और भविष्य में इसे भी अधिक बढ़ाऊंगा।' इसमें मानव के दोषों को दिखाया गया है जहाँ व्यक्ति अपनी सफलता का श्रेय स्वयं को देता है और लालच से भरकर आगे की उम्मीदें करता रहता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग और भक्ति योग के सिद्धांतों को खंडन करता हुआ आसुरी प्रकृति का चित्रण करता है, जो 'अहंकार' (ego) पर आधारित होती है। यह सत्ता की प्राप्ति के लिए कर्म करना नहीं बल्कि स्वयं को ईश्वर से अलग मानने वाले मनुष्य की सीमित और आसुरी दृष्टि को दर्शाता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
भगवान श्रीकृष्ण पांडव सेना को युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान अर्जुन को संदेश दे रहे हैं, जो अपने ही रक्तपात का दुख और विचारों में उलझे हुए थे। इस समय (अध्याय 16) श्रीकृष्ण 'दिव्य' और 'आसुरी' स्वभाव की तुलना कर रहे हैं ताकि अर्जुन को सही मार्ग पर लाया जा सके। यह श्लोक उस व्यक्ति का वर्णन करता है जो आत्म-विश्वास के बजाय घमंड में डूबा होता है और युद्ध से भागने की जबरदस्ती करने वाले पापियों की प्रकृति को दर्शाता है।
आज के जीवन में
आज के समय में यह श्लोक उन व्यवसायिक व्यक्तित्वों पर लागू होता है जो बिना किसी कर्तव्यबोध या ईमानदारी के, अपनी सफलता का पूरा श्रेय स्वयं को देते हैं और लालच से आगे की उम्मीदें करते रहते हैं। एक नौकरीपेशा व्यक्ति जिसे प्रमोशन मिला है लेकिन उसे लगता है कि वह सिर्फ अपने दिमाग के बल पर कामयाब हुआ, जबकि उसके सहयोगियों का योगदान उसने अनदेखा कर दिया, वही इस श्लोक में वर्णित मनोरथ (अहंकार) को व्यक्त करता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चिंता और अशांति का अनुभव करता है क्योंकि वह हमेशा 'आगे क्या मिलेगा' की चिंता में रहता है, न कि वर्तमान पर ध्यान केंद्रित कर पाता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करें कि आपके पास कुछ बहुत अच्छे खिलौने हैं, लेकिन आप सोचते हैं कि ये सिर्फ इसलिए मिले क्योंकि आप सबसे स्मार्ट और मेहनती हैं। अगर आपको यह श्लोक पढ़ा जाए तो वह बुरी तरह से लालची व्यक्ति की बात कर रहा है जो कहता है, 'मेरे पास इतने खिलौने हैं और मैं भविष्य में और भी ज्यादा लाऊंगा।' असली सीख यह है कि हमें सिर्फ अपने लिए कमाई करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि दूसरों की मदद करना और ईश्वर का धन्यवाद करना जरूरी है।
दैनिक चिंतन
आपके मन में आज कितनी बार 'यह मेरा है' या 'भविष्य में मुझे यह मिलेगा' जैसे विचार आते हैं? अक्सर हम धन, सफलता या वस्तुओं को अपने स्वत्व का प्रमाण समझकर उनसे बांध कर रह जाते हैं। गीता बताती है कि जब तक हम इन वासनाओं और अभिमान में फंसे रहेंगे, तब तक शांति की अनुभूति नहीं होगी। आज के लिए एक छोटा सा संकल्प लें: अपने कर्मों को ईश्वर को अर्पित करें और परिणामों पर पूर्ण विश्वास रखें।
आज के लिए एक अभ्यास
इस श्लोक में आत्म-मोह और लालसा के अभाव की भावना को ध्यान से समझें। जब आप 'यह मेरा है' या 'अभी यह मिलेगा' जैसे विचारों का अनुभव करते हैं, तो उन्हें एक बाहर से देखने वाले प्रेक्षक की तरह सरलतापूर्वक अवलोकन करें और मना को स्थिर होने दें।
मुख्य शिक्षाएँ
- अभिमान का पतन (Fall of Ego)
यह श्लोक दैत्य स्वभाव की सबसे बड़ी पहचान 'ममता' और 'अहंकार' को दर्शाती है, जहाँ व्यक्ति हर चीज को केवल अपने लिए मानता है। जब इच्छाओं का पूरा होना और धन का संचय ही जीवन का उद्देश्य बन जाता है, तो आत्मा की असली स्वतंत्रता खो जाती है। - भविष्य पर अंधा विश्वास (Delusion of Future)
मानव मन भविष्य में और अधिक धन या सुख प्राप्ति की कल्पना करके वर्तमान को नजरअंदाज करता है, जो कि एक प्रकार का मोह है। यह 'पुनर्धन' (भविष्य में धन) के आशावाद से व्यक्ति अतीत और भविष्य दोनों में फंस जाता है और शाश्वत सत्य से दूर हो जाता है। - वासनाओं का बंधन (Bondage of Desires)
इस श्लोक के पीछे की गहरी भावना वासनाओं और लालसाओं द्वारा नियंत्रित होने वाली अज्ञान अवस्था है। जब तक मन 'मैंने पाया' या 'पाऊंगा' जैसे विचारों में बंधा रहेगा, तब तक आत्म-निर्देशन (Self-realization) संभव नहीं होगा।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — कर्म करने पर ध्यान केंद्रित करें और फल की इच्छा छोड़ने का सिद्धांत, जो इस श्लोक के मोह को तोड़ेगा।
- 3.20 — ज्ञानवान लोगों द्वारा अर्थ (धन) और कर्म कैसे किए जाने चाहिए, इसके उदाहरण के लिए यह अनुसरण करें।
- 16.4 — दैत्य स्वभाव की विस्तृत चर्चा जो इस श्लोक में वर्णित अभिमान और लालसा का परिणाम बताती है।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.