भगवद्गीता 16.14

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.14 — ""यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा", "मैं ईश्वर हूँ और भोगी हूँ", "
भगवद्गीता 16.14 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ||१६-१४||

लिप्यंतरण

asau mayā hataḥ śatrurhaniṣye cāparānapi . īśvaro.ahamahaṃ bhogī siddho.ahaṃ balavānsukhī ||16-14||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में दैवीय और आसुरी स्वभावों के वर्णन वाले अध्याय में, पांडव सेना के सामने खड़ा एक अरिष्टास्मिक व्यक्ति अपने अभिमानी स्वरूप को प्रकट करता है। वह गर्वपूर्वक यह घोषणा करता है कि उसने अपना शत्रु मारा है और बाकी बचे दुश्मनों को भी मार देगा, तथा खुद को ईश्वर, भोगी, सिद्ध पुरुष, बलवान और सुखी बताता है। कृष्ण द्वारा वर्णित यह आसुरी स्वभाव अहंकार का चरम रूप है जहाँ व्यक्ति अपनी शक्ति को सही दिशा में नहीं समझ पाता। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि जब मन ईश्वरीय नियमों से हटकर केवल अपने भोग और बल पर निर्भर होता है, तो वह विनाश की ओर अग्रसर हो जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगवद गीता के 'कर्म योग' और 'ज्ञान योग' के संदर्भ में आसुरी स्वभाव (आत्म-अभिमान) की चर्चा करता है, जो 'सांख्य' दर्शन द्वारा वर्णित अविद्या या ज्ञानहीन अवस्था का परिणाम है। यह उन व्यक्तियों को दिखाता है जिन्होंने ब्रह्म (परमात्मा) के साथ अपने संबंधों की उपेक्षा करके केवल 'अहंकार' और 'भोग' में लिप्त होकर जीवन जिया है। इसका उद्देश्य यह समझाना है कि जब व्यक्ति ईश्वर को भूलकर स्वयं को सर्वशक्तिमान मान लेता है, तो वह आत्मविनाश की ओर अग्रसर होता है और 'सिद्ध पुरुष' (पूर्ण) होने का दावा करना वास्तव में अधूरापन दर्शाता है।

शब्दार्थ
असौ that, मया by me, हतः slain, शत्रुः enemy, हनिष्ये (I) shall slay, च and, अपरान् others, अपि also, ईश्वरः Lord, अहम् I, अहम् I, भोगी the enjoyer, सिद्धः perfect, अहम् I, भोगी the enjoyer, सिद्धः perfect, अहम् I, बलवान् powerful, सुखी happy
पारंपरिक भाष्य
I will be the lord of all I survey. I will kill everyone who will not serve me. In fact I am the lord of all creation. I will be successful in all my undertakings. I have got plenty of landed property, cattle and immense wealth. I have got plenty of children and grandchildren. Even Indra is not eal to me. I am not an ordinary man. I am very powerful, strong, healthy and happy in every respect. In this verse there is a description of the vain imaginations of the people of demoniacal nature.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर स्थित है जहाँ अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण एक-दूसरे से संवाद कर रहे हैं। यह दसवें अध्याय में वर्णित 'दैवासुर संपदा विभाग योग' का हिस्सा है, जो पांडवों के पक्ष की आसुरी शक्तियों (जैसे कौरवाओं और अन्य अरिष्टास्मिक लोगों) के मनोविज्ञान को उजागर करता है। इस समय तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दैवीय गुणों का वर्णन किया था, अब वे आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों की बात कर रहे हैं जो युद्ध में घबराए हुए या अभिमानी होकर बोलते हैं। श्रोता अर्जुन इस वचनों के माध्यम से यह समझ रहे हैं कि उनके विरोधी कौशल और भय पर कैसे निर्भर होते हैं, जबकि वे ईश्वरीय नियमों को नजरअंदाज़ कर रहे हैं।

आज के जीवन में

आज की दुनिया में एक प्रबंधक या नेतृत्व पद रखने वाला व्यक्ति अक्सर अपने सफलता के बाद यह महसूस करता है कि 'मैं ही सब कुछ हूँ, मेरी कंपनी बिना मेरे नहीं चल सकती'। वह अपनी शक्ति को ईश्वर या टीम का सहयोग मानने की बजाय स्वतंत्र रूप से अनुभव करता है और भविष्य के चुनौतीपूर्ण निर्णयों में दूसरों को नजरअंदाज़ कर देता है। जब कोई व्यक्ति केवल अपने 'सुख', 'भोग' या 'बल' पर आधारित अपनी पहचान बना लेता है, तो वह तनाव और अकेलेपन का अनुभव करता है क्योंकि उसे लगता है कि सब कुछ उसके हाथ में ही है। इस स्थिति से बचने के लिए हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि सफलता आती-जाती रहती है और असली शक्ति ईश्वरीय सहयोग या समग्र नियमों की चेतना में निहित है, न कि व्यक्तिगत अहंकार में।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि एक लड़का खेलते हुए दूसरे को हराता है और फिर यह सोचने लगता है कि 'मैं सबसे ताकतवर हूँ, मैं सब कुछ कर सकता हूँ'। वह खुद को अरबों का राजा समझ लेता है और हर किसी के ऊपर अपनी इच्छा चलाता है। लेकिन सच्चाई यह होती है कि जब कोई बड़ा होता है या दौड़ में जीत जाता है, तो उसे कभी-कभी लग सकता है कि वह ही सब कुछ हैं। असलियत में हम सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं और ईश्वर की शक्ति सबसे ऊपर है; अगर कोई सिर्फ खुद को ताकतवर समझकर गुमराह हो जाए, तो उसे हार का सामना करना पड़ सकता है।

दैनिक चिंतन

दोस्त, क्या आपने कभी महसूस किया है कि जब हम दूसरों पर हावी होने की सोचते हैं या खुद को सर्वशक्तिमान समझ लेते हैं, तो भीतर एक खालीपन आ जाता है? यह श्लोक हमें बताता है कि 'मैं मारूंगा' और 'मैं ईश्वर हूँ' जैसे विचार अहंकार की जड़ से निकले होते हैं जो वास्तविक शांति को बाधित करते हैं। जब आप अपने बल, संपत्ति या जीत के चक्कर में भटकते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि असली सिद्धि और सुख ईश्वर की शरण में आने से मिलता है न कि दूसरों को हराकर। आज का दिन अपने आप पर नियंत्रण रखने और अहंकार के धोखे को पहचानने के लिए समर्पित करें, तभी आपको सच्चा सुख मिल पाएगा।

आज के लिए एक अभ्यास

जब भी आपके मन में 'मैं' का अहंकार या दूसरों को जीतने की इच्छा जागृत हो, तो तुरंत रुकें और यह सोचें कि वास्तविक शक्ति स्वयं के अंदर है। अपने आप से पूछें: क्या मैं ईश्वरीय गुणों में स्थित हूँ या अहंकार की दयालुता का भ्रम? इस ध्यान से मन को शांत करें और आत्म-पराधीन भावना अपनाएं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अहंकार का विनाशकारी स्वरूप
    यह श्लोक राक्षसी स्वभाव के लोगों की वृत्ति को दर्शाता है जो 'मैं' और 'मेरा' भाव में फंसकर अहंकार से ग्रस्त हो जाते हैं। वे दूसरों का विनाश करने या खुद को सर्वोपरि मानने में अपनी शक्ति समझते हैं, जो उन्हें मोक्ष के मार्ग से भटकता है।
  2. भोगी और सिद्ध पुरुष की गलतफहमी
    असली 'सिद्ध' (पूर्ण) और 'ईश्वर-स्वरूप' होने का अर्थ शारीरिक बल या भौतिक सुखों में नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान में स्थिर होना है। जो व्यक्ति केवल बाहरी उपकरणों को जीतकर खुद को ईश्वर समझता है, वह वास्तविक योग का पाठक नहीं बन सकता।
  3. सुख और बल की असली परिभाषा
    यह श्लोक बताता है कि अहंकारी व्यक्ति को 'बलवान' और 'सुखी' होने का भ्रम होता है, जबकि वह वास्तव में दुर्गुणों के बंधन में फंसा होता है। सच्चा सुख तभी मिलता है जब हम अपने स्वयंशक्ति पर निर्भर होने की इच्छा त्यागकर दैवीक गुणों का पालन करते हैं।

विषय

अहंकार का विनाशकारी प्रभावदैवीय और आसुरी स्वभावईश्वरीय भक्ति की कमीकर्मों में निष्ठामनोविज्ञान और अभिमानी स्वरूपजीवन का उद्देश्य

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  1. 16.24 — इस श्लोक का निष्कर्ष क्या करना चाहिए, इसे समझने के लिए 'शास्त्र विहित' और 'अहंकार की सीमाओं' को जानना आवश्यक है।
  2. 16.5 — दैवीक और आसुरी स्वभावों का अंतर समझने के लिए यह श्लोक 16वें अध्याय की आधारशिला है जो इस विषय को स्पष्ट करता है।
  3. 2.47 — कर्मयोग और फलत्याग का सिद्धांत सीधे तौर पर अहंकार के बंधनों से मुक्ति पाने का रास्ता दिखाता है, जो इस श्लोक की समस्या का समाधान है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक किसके द्वारा कहा जा रहा है और यह किसे समझाया जा रहा है?
इस श्लोक की भाष्य श्रीकृष्ण अर्जुन को सुना रहे हैं, लेकिन इसमें वर्णित वाक्य 'मैं ईश्वर हूँ' आदि एक अभिमानी व्यक्ति (आसुरी स्वभाव वाला) के मन से निकले विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। कृष्ण अर्जुन को यह समझाने की बात कर रहे हैं कि ऐसे व्यक्तियों की मानसिकता क्या होती है जो ईश्वर को भूलकर खुद को सर्वोच्च मान लेते हैं।
क्या 'मैं सिद्ध पुरुष हूँ' कहने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति पूर्ण हो गया?
नहीं, यहाँ 'सिद्ध पुरुष' होने का दावा एक गलतफहमी या अभिमानी भावना है। सच्चा सिद्ध पुरुष वह होता है जो ईश्वर की शक्ति को स्वीकार करता है और अहंकार से मुक्त हो जाता है, न कि जो केवल अपनी बलवानता का दावा करता है। गीता में यह दिखाया गया है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं को पूर्ण मानकर दूसरों को कम समझता है, तो वह वास्तव में अधूरा और विनाश की ओर अग्रसर होता है।
आसुरी स्वभाव वाले लोगों का मुख्य लक्षण क्या है जो इस श्लोक में दिखाया गया है?
इस श्लोक के अनुसार आसुरी स्वभाव वालों की सबसे बड़ी विशेषता 'अहंकार' और 'मद' (गर्व) है, जहाँ वे खुद को ईश्वर, भोगी और सर्वशक्तिमान मान लेते हैं। ये लोग न तो दैवीय गुणों का पालन करते हैं और न ही अपने कर्मों के परिणामों की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं; बल्कि वे दूसरों को मारने या जीतने पर ही ध्यान देते हैं।
क्या यह श्लोक हमें आक्रामक होना चाहिए ऐसा संकेत देता है?
बिल्कुल नहीं, बल्कि इसके विपरीत; यह श्लोक उन व्यक्तियों का वर्णन करता है जो गलत दिशा में भ्रष्ट होकर आक्रामक बन जाते हैं। कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जब कोई व्यक्ति केवल अपनी ताकत और अभिमानी भावनाओं पर निर्भर रहता है, तो वह विनाश की ओर जाता है। गीता का मूल संदेश हमें दया, करुणा और ईश्वरीय नियमों का पालन करने को प्रेरित करता है, न कि आक्रामकता या अहंकार को बढ़ावा देना।
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