भगवद्गीता 14.24

Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 14.24 — "जो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित), सुख-दु:ख में समान रहता है तथा मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखत"
भगवद्गीता 14.24 — Gunatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ||१४-२४||

लिप्यंतरण

samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ . tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ ||14-24||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि गुणातीत (सूत्रों से परे) व्यक्ति कैसे होता है। ऐसा मनुष्य सुख और दुःख में समान रहता है, उसे मिट्टी, पत्थर या सोने में कोई अंतर नहीं दिखता। वह प्रशंसा और निन्दा को भी बराबर मानते हुए अपने आत्मस्वरूप में स्थिर रहता है। यह श्लोक बताता है कि वास्तविक शांति तभी मिलती है जब बाहरी परिस्थितियों से हमारा स्वभाव अटूट हो जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग और ज्ञान योग के सिद्धांतों को जोड़ता है, विशेष रूप से सांख्य दर्शन की त्रि-गुण (सत्त्व, रज, तम) चेतना से मुक्ति का विषय। यह 'निरपेक्ष बुद्धि' और 'स्वस्थ स्थिति' के अवधारणा को विकसित करता है जो भक्त या ज्ञानी व्यक्ति की पहचान बनती हैं।

शब्दार्थ
समदुःखसुखः alike in pleasure and pain, स्वस्थः standing in his own Self, समलोष्टाश्मकाञ्चनः regarding a clod of earth, a stone and gold alike, तुल्यप्रियाप्रियः the same to the dear and the undear, धीरः firm, तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः the same in censure and praise
पारंपरिक भाष्य
Night and day have no meaning to a post fixed in the ground. Even so pleasure and pain have no meaning to a sage who dwells in his own Self. He is above the pairs of opposites. In his eyes cowdung or gold, a jewel or a stone, are of eal value. He is free from the idea of,giving and taking. His mind is not perturbed by anything pleasant or unpleasant. He is the same towards agreeable and disagreeable things. Praise and censure cannot affect him. He stands adamant. He abides in his own essential state as ExistenceKnowledgeBliss Absolute. He is ever calm and serene. (Cf. V.18)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में होता है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण पार्थ (अर्जुन) को गीता का उपदेश दे रहे हैं। इससे ठीक पहले, अर्जुन ने कर्म और गुणाओं की चिंता व्यक्त करते हुए अपने संदेहों को छेड़ दिया था। भगवान अब उन्हें 'त्रि-गुण' (सत्व, रज, तम) से ऊपर उठने के लक्षण बता रहे हैं ताकि अर्जुन अपनी कर्मभूमि पर वापस आ सकें और युद्ध में भागीदार बन सकें।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन आपके boss द्वारा कुछ सकारात्मक (प्रशंसा) या नकारात्मक (निन्दा) टिप्पणी की गई है। इस स्थिति में 'गुणातीत' व्यक्ति तुरंत खुशी के उच्च स्तर पर नहीं जाएगा और न ही निराशा में डूबेगा; वह अपनी क्षमता का विश्लेषण करके आगे बढ़ेगा। चाहे उसे महंगा उपहार मिले या मिट्टी की बर्तन, उसकी मानसिक शांति अखंड रहेगी क्योंकि उसके लिए मूल्य 'स्वयं' में है, न कि बाहरी वस्तुओं में।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे तुम खेल रहे हो और कोई मित्र तुम्हें प्रशस्ति देता है या गुस्ताखी करता है, लेकिन तुम अपनी खुशी नहीं खोते। इस श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं कि एक सच्चा दोस्त वही है जो सोने के गहनों और मिट्टी की बर्तन को समान मानता है। अगर कोई तुम्हें प्यार करता है या नफरत, तो भी उसका असर नहीं होना चाहिए क्योंकि तुम अपने अंदर खड़े होकर सब देखते हो।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि मिट्टी का टुकड़ा, पत्थर या स्वर्ण की लकीर आपके लिए एक जैसी क्यों हैं? जब आप प्रिय और अप्रिय दोनों को समान दृष्टि से देखते हैं, तो मन की अशांति अपने आप विलुप्त हो जाती है। आज का दिन इस बात पर केंद्रित करें कि बाहरी परिस्थितियाँ आपके आंतरिक स्वभाव (स्वरूप) में बदलाव नहीं ला सकतीं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज स्वस्थ होकर, अपने भीतर की उस शांत साक्षी भावना को पहचानें जो सुख और दुःख दोनों के बीच समरसता बनाए रखती है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. परम स्थिरता: स्वस्थ भावना
    यह श्लोक बताता है कि आत्मज्ञानी पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप में अटल रहते हैं, चाहे बाहर का संसार क्या भी हो। सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो उसे विचलित नहीं कर सकते क्योंकि वह उनसे ऊपर स्थित है।
  2. समदृष्टि: निरपेक्षता
    एक सच्चा साधक मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में कोई अंतर नहीं देखता क्योंकि सभी वस्तुएं मूल रूप से एक ही ब्रह्मा की अभिव्यक्ति हैं। यह दृष्टि बाहरी सामग्री या स्थिति के आधार पर न तो लालच करती है और न ही घिनौनापन, बल्कि सबमें समानता देखती है।
  3. विजय: निंदा और स्तुति का त्याग
    किसी की प्रशंसा (स्तुति) या आलोचना (निन्दा) से उसका मन अस्थिर नहीं होता क्योंकि उसे इन दोनों को तुल्य समझने वाली बुद्धि प्राप्त है। यही वह मार्ग है जहाँ कर्मयोग और भक्ति का परम फल मिलता है, जो व्यक्ति को सभी द्वंद्वों से मुक्त कर देता है।

विषय

समभाव (Equanimity)गुणातीत स्थिति (Transcending the Gunas)आत्म-ज्ञान (Self-Knowledge)कर्मयोग की परिपक्वता (Mature Karma Yoga)विषयों से मुक्ति (Detachment from Objects)मानसिक शांति (Inner Peace)

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  1. 2.14 — यह श्लोक द्वंद्वों (सुख-दुःख) के स्वभाव को समझने की नींव रखता है कि वे अस्थायी हैं और उन्हें सहना चाहिए।
  2. 2.56 — 'दर्शन' वाले इस श्लोक में स्वरूप स्थित पुरुष का विस्तृत वर्णन है जो 14वें अध्याय की अवधारणा को और गहराई से समझने के लिए आवश्यक है।
  3. 6.7 — समाधिन लब्धि का यह श्लोक बताता है कि मन को कैसे संतुलित किया जाए ताकि निंदा और स्तुति से मुक्ति मिल सके।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'स्वस्थ' शब्द का क्या मतलब है?
यहाँ स्वस्थ का तात्पर्य किसी बीमारी से मुक्त होना नहीं, बल्कि आत्म-स्वरूप में स्थिर रहना है। यह उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति बाहरी दुनिया की लहरों के बीच भी अपने मूल चेतन स्वरूप (आत्मा) पर अडिग बना रहता है और न तो सुख से घबराता है न दुःख से टूटता है।
प्रशंसा और निन्दा का तुल्य होना कैसे संभव है?
जब व्यक्ति अपनी पहचान अपने आत्मस्वरूप (आत्मा) से जोड़ लेता है, तो बाहरी शब्दों—चाहे वे प्रशंसा हों या निन्दा—उसके अस्तित्व को नहीं बदल सकते। ऐसा वीर पुरुष जानबूझकर अपनी बुद्धि के द्वारा दोनों को बराबर मानता है क्योंकि उसे स्पष्ट रूप से पता होता है कि ये शब्द केवल बाहरी ध्वनियों हैं और आत्म-सत्य का हिस्सा नहीं हैं।
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