भगवद्गीता 5.19
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः | निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ||५-१९||
ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ . nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ ||5-19||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जिस व्यक्ति का मन समभाव में स्थित है, वह इसी जीवन (इह) में ही संसार की बंधनों या 'सर्ग' पर विजय प्राप्त कर लेता है। यह श्लोक कहता है कि चूंकि ब्रह्म निर्दोष और सभी के लिए समान है, इसलिए जो लोग मन को उसमें स्थिर करते हैं, वे स्वतः ही ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं या ब्रह्म की उच्च अवस्था में स्थापित हो जाते हैं। मुख्य शिक्षा यह है कि बाहरी दुनिया के दोषों से मुक्त होने और परमात्मा को देखने के लिए 'समत्व' या समभाव ही सही मार्ग है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) और सांख्य दर्शन के सिद्धांतों को जोड़ता है, विशेष रूप से 'समत्व' की अवधारणा को विकसित करता है जो कर्मयोग का भी आधार है। यह बताता है कि जब व्यक्ति ब्रह्मात्वात्मक स्वरूप (निर्दोष और सम) में स्थिर होता है, तो वह अंतःस्थ आत्मा के रूप में सभी सृष्टि पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसमें भेदभाव को त्यागकर 'अद्वैत' या एकत्व की अनुभूति पर जोर दिया गया है कि सब कुछ ब्रह्म से ही बना है और उसी में विलीन होता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान में कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है, जो 'कर्म संन्यास योग' (अध्याय 5) में आता है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अर्जुन को बताया था कि ज्ञानी और अनुभवी व्यक्ति सभी प्राणियों में समान द्रष्टा के रूप में परमात्मा का दर्शन करते हैं, न कि शारीरिक या सामाजिक भेदों को देखते हैं। कृष्ण इस समय अर्जुन के मनोविश्लेषण को आगे बढ़ा रहे थे ताकि वह समझ सके कि युद्ध की स्थिति में भी मानसिक शांति और मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है, जो उस वक्त उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।
आज के जीवन में
कल्पना करें आप एक बहुत तनावपूर्ण कार्यस्थल पर हैं जहां आपके सहकर्मी या ग्राहक अत्यधिक कठिन व्यवहार कर रहे हैं और आपको क्रोध आ रहा है। इस श्लोक का प्रयोग करने का मतलब यह नहीं कि आप अपनी जिम्मेदारी छोड़ दें, बल्कि आपका मन 'समत्व' में बना रहे: न उनके गुस्से से डरें (उदासी) और न ही उन्हें प्यार या घृणा के आधार पर अलग-अलग देखें। जब आप अपने मानसिक संतुलन को कायम रखते हैं, तो वह स्थिति 'जीती' जाती है और आप किसी भी परिणाम की चिंता किए बिना अपनी कार्यक्षमता बनाए रख सकते हैं, क्योंकि आपका मन बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं रह रहा होता।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारे पास एक बहुत सुंदर, चिकनी पेंटर का रंग है जो किसी भी चीज़ में लगाओ तो उसे खूबसूरत बना देता है और उसमें कोई दाग नहीं छोड़ता। जैसे-जैसे तुम इसका इस्तेमाल करते हो, तुम्हारी दुनिया साफ़ और सुंदर लगने लगती है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि अगर हमारा मन भी वही समभाव (समान दृष्टि) अपना लेता है, तो हम किसी बड़े संघर्ष या डर को जीत जाते हैं। जब तुम्हारे दिमाग में न अच्छा-बुरा का भेद हो और सबको एक जैसा देखो, तो तुम भी उस पवित्र चमक (ब्रह्म) की तरह बन जाओगे जो हमेशा साफ़ रहती है।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, आज जब भी जीवन में कोई असंतुलन या द्वंद्व आपको घेर ले, तो एक गहरे सांस के साथ खुद से पूछें कि क्या मेरा मन अभी भी समत्व पर टिका है? यह श्रावण (श्रद्धा) और ज्ञान की सच्चाई यह है कि जब हम बाहरी परिस्थितियों में अंतर नहीं देखते, तो वास्तविक जीत यहीं प्राप्त हो जाती है। आपका मन ब्रह्म के सम रूपी होने पर आकर स्थिर होगा, जो जीवन का सबसे गहरा शांति और सुरक्षा प्रदान करता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आँखें बंद करें और अपने मन को समत्व के उस अवस्था में स्थिर होने की कल्पना करें जहाँ सुख-दुःख, लाभ-हानि या मान-अपमान का भेदभाव नहीं है। इस क्षण में यह स्वीकार करते हुए कि आपका अस्तित्व ही निर्दोष ब्रह्म के साथ अभिन्न है, अपने शरीर और मन को पूर्ण शांति की ओर आकर्षित करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- समत्व में ही जीत की प्राप्ति (Victory through Equanimity)
यह श्लोक स्पष्ट रूप से बताता है कि संसार को पार करना या 'जीतना' बाहरी कार्यक्षेत्रों में नहीं, बल्कि मन के समभाव भाव में स्थिर होने पर ही होता है। जब विषम और सौख्य दोनों का अनुभव एक जैसा हो जाता है, तब सर्ग (सृष्टि/जन्म-मृत्यु चक्र) जीत लिया जाता है। - निर्दोष ब्रह्म की प्रकृति (Nature of the Sinless Brahman)
भगवान कृष्ण समझाते हैं कि परमात्मा या ब्रह्म स्वभावतः निर्दोष और सर्वसमान है, अर्थात उसमें कोई दोष नहीं और न ही वह किसी के प्रति पक्षपाती होता है। यह निराली प्रकृति मनुष्य को आकर्षित करती है क्योंकि हमारा लक्ष्य भी वही शुद्धता प्राप्त करना होना चाहिए। - ब्रह्म में स्थिति (Abiding in Brahman)
जिनका मन समत्व में रहता है और वे ब्रह्म की सच्चाई को पहचानते हैं, वे वास्तविक अर्थों में 'ब्रह्म में स्थित' हो जाते हैं। यह केवल शारीरिक तपस्या नहीं है, बल्कि आत्म-ज्ञान के माध्यम से ईश्वर की निवास भावावस्था को प्राप्त करना है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.48 — यह श्लोक 'योगस्थः कुरु कर्मणि' कहकर समत्वभाव में कार्य करने के व्यावहारिक अनुशासन पर प्रकाश डालता है, जो 5.19 की दार्शनिक गहराई को आगे ले जाता है।
- 3.30 — इस श्लोक में कर्मों का समर्पण करने के माध्यम से भी उसी समत्व और मुक्ति की ओर जाने का मार्ग बताया गया है, जो 5.19 के विचार को पूरा करता है।
- 12.15 — यह श्लोक भक्तों के लिए 'असंज्ञान' (निष्ठाहीन) और समभाव वाले व्यक्ति की महिमा का वर्णन करता है, जो ब्रह्म में स्थित होने वाला आदर्श ज्ञानी है।
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