भगवद्गीता 14.23
Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते | गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ||१४-२३||
udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate . guṇā vartanta ityevaṃ yo.avatiṣṭhati neṅgate ||14-23||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति गुणों (सत्व, रज और तम) के प्रभाव से विचलित नहीं होता, वह वास्तव में स्थिर हो जाता है। ऐसा व्यक्ति यह समझकर शांत रहता है कि 'गुण ही कार्य कर रहे हैं' न कि मैं स्वयं कुछ कर रहा हूँ। इस प्रकार की उदासीन अवस्था आत्म-ज्ञान और मोक्ष का मुख्य संकेतक मानी जाती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक वेदांत और सांख्य दर्शन की 'ज्ञान योग' और 'कर्म योग' की अवधारणाओं को जोड़ता है जहां कर्ता-भाव (कर्त्तृत्व) का त्याग होता है। यह द्रष्टा-सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें आत्मसाक्षी के रूप में स्थिर रहकर गुणों के संघर्ष से मुक्त होना मुख्य उद्देश्य है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र में कुुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश का भाग है, जो अध्याय 14 'गुणत्रयी विभाग योग' की चरम सीमा पर स्थित है। इस समय तक कृष्ण ने आत्मा और गुणों के बीच के संबंधों, ज्ञान-विज्ञान की प्रकृति को समझाया है जो अर्जुन में संचारित संदेह और भय का कारण था। अर्जुन युद्ध से भागने या कष्टग्रस्त होकर बैठे हुए थे, जब तक कि वे गुणों के बंधनों की पहचान न कर लेंगे; यह श्लोक उन्हें उस स्थिति में पहुंचाता है जहां वह अपने स्वभाव और बाहरी परिस्थितियों का भ्रम तोड़ लेते हैं।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप ऑफिस में एक अत्यंत कठिन प्रोजेक्ट के दौरान किसी से तीव्र आलोचना सुन रहे हैं, जिससे आपको गुस्सा या निराशा महसूस हो रही है। इस श्लोक का उपयोग करते हुए, आप तुरंत यह समझें कि 'यह मेरी असली पहचान नहीं है' बल्कि केवल रजोगुण (क्रोध) और तमोगुण (अज्ञान) ने आपके मन को प्रभावित किया है। जब आप स्वयं को इस स्थिति से अलग करके यह मान लेते हैं कि 'गुण ही व्यवहार कर रहे हैं', तो आप बिना किसी उलझन के शांत भाव से उस समस्या का समाधान खोजने में लग जाते हैं, न कि व्यक्तिगत हमले पर।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे एक बच्चा खेलते हुए बहुत जल्दी गुस्सा हो जाता या डर जाता है, लेकिन तुम जो स्वयं को समझदार मानते हो वह वही देख रहा है परंतु न खुश होता है और न ही दुखी। कृष्ण कहते हैं कि असली बुद्धिमान व्यक्ति भी बिल्कुल वैसा ही रहता है; उसे लगता है कि 'गुस्सा, डर या खुशी' उसके अंदर नहीं आ रहे हैं, बल्कि ये तो बाहरी शक्तियां (जैसे मौसम) हैं जो चल रही हैं। जब तुम्हें पता हो जाता है कि यह सब केवल गुणों का खेल है, तो तुम कभी भी घबराते या डरते नहीं रह जाते और हमेशा शांत बैठे रहते हो।
दैनिक चिंतन
क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपके आकार-प्रकाश या व्यवहार के बावजूद भी आपकी असली पहचान वही रही? आज की इस श्रुति हमें बताती है कि जब तक हम 'मैं' नहीं कहते और न ही गुणों को अपने कर्म का स्वामी समझते हैं, तब तक हम वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते हैं। आप वह अटूठ साक्षी हैं जो रजोगुणी या तामसिक होने पर भी डगमगाती नहीं है; बस यह जानने की आवश्यकता है कि 'ये गुण चल रहे हैं'। जब आपको लगता है कि कोई परिस्थिति आपके मन को हिला रही है, तो ठहरें और अपने आप से पूछें: क्या मैं वास्तव में विचलित हो रहा हूँ या केवल मेरे भीतर का एक गुण प्रतिक्रिया दे रहा है?
आज के लिए एक अभ्यास
आज जब भी मन कोई गुण (सत्त्व, रजस् या तम) की ओर खींचने लगे, तो खुद को एक गवाह के रूप में स्थित करें। यह अनुभव करने का अभ्यास करें कि 'गुण ही व्यवहार कर रहे हैं', न कि आप उन्हें चला रहा हैं। इस उदासीनता से मन को शांत और अचल बनाए रखें, जैसे पहाड़ हवाओं से नहीं हिलता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- गुणों की अव्यक्त शक्ति को पहचानना
यह समझना कि सभी कर्म और भावनाएँ तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तम) के प्रभाव से होती हैं। जब व्यक्ति यह जान लेता है कि 'गुण ही व्यवहार कर रहे हैं', तो वह स्वतंत्र हो जाता है। - उदासीन साक्षी बने रहना
सच्चा योगी उन गुणों के प्रभाव से विचलित नहीं होता, जैसे हवा में उड़ते हुए पंखियाँ जमीन को नहीं छूतीं। यह स्थिति 'उदासीन' होने की है, न कि निष्क्रियता या लापरवाही। - स्थिरचित्त का लक्षण
जो व्यक्ति गुणों के प्रभाव से अचल रहता है और उस स्थिति में कभी नहीं झुकता, वही वास्तविक मुक्ति को प्राप्त करता है। यह समर्पित जीवन की सबसे ऊँची अवस्था है जहाँ कर्मकर्ता न बनकर साक्षी बना जाता है।
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