भगवद्गीता 14.22
Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवानुवाच | प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव | न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ||१४-२२||
śrībhagavānuvāca . prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava . na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati ||14-22||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि एक ज्ञानी पुरुष संसार के तीन गुणों — प्रकाश (सत्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) — के आने या जाने पर न तो उनसे घृणा करता है और न ही उनके लौट आएँगे उनकी इच्छा रखता है। यह श्लोक बताता है कि जब ये गुण कार्य कर रहे हों, तब भी वे उन्हें स्वीकार करते हैं और जब गायब हो जाएं, तब भी उनका पीछा नहीं करते। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि बुद्धिमान व्यक्ति इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के ऊपर स्थिर रहता है, न तो खुश होता है न दुखी।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग और संख्या दर्शन के तहत 'गुणातीत' (Gunatita) अवस्था का वर्णन करता है, जो कार्मिक कर्मों से मुक्ति की ओर ले जाता है। यह सिद्धांत बताता है कि आत्मा इन तीन गुणों (प्रकृति) के अस्तित्व में भी स्वतंत्र रह सकती है और उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का भाग नहीं मानना चाहिए।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश का हिस्सा है, जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भीषण संघर्ष की तैयारी चल रही थी। इससे पहले कृष्ण ने गीता के 14 वें अध्याय में प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) का विस्तृत वर्णन किया था और अर्जुन को यह समझाया कि ये सभी मन और बुद्धि पर कैसे असर करते हैं। कुरुक्षेत्र की युक्ति में अर्जुन अपनी भूमिका से संकटग्रस्त थे, इसलिए कृष्ण उन्हें इन गुणों के चक्रव्यूह से मुक्त होकर स्थिरचित्त बनने का मार्ग दिखा रहे हैं ताकि वे निःस्वार्थ भाव से युद्ध कर सकें।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं और अचानक बड़ी सफलता मिल जाती है; ज्ञानी व्यक्ति उस खुशी में इतना डूब नहीं जाता कि वह अपनी सावधानी खो दे। यदि वही प्रोजेक्ट विफल हो जाए या समस्याएं आ जाएं, तो वे उदासीन भी नहीं होते और न ही निराश होकर हार मान लेते हैं। यह दृष्टिकोण आपको कार्य के दौरान तनाव (stress) से मुक्त रखता है, क्योंकि आप परिणामों की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य पर ध्यान दे पाते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे आप एक स्कूल की नाटक में हैं और कहानी बहुत रोमांचक या डरावनी हो रही है, लेकिन आपका दोस्त बाहर खड़ा सब कुछ देख रहा है और उस पर असर नहीं पड़ता, वैसा ही ज्ञानी व्यक्ति होता है। जब जीवन में खुशियाँ (प्रकाश) आती हैं तो वह बहुत ज्यादा兴奋 नहीं होता, और जब मुसीबतें या उदासी (मोह) आती हैं तो वह दुखी भी नहीं होता। वह बस यह देखता रहता है कि ये सब क्या हो रहा है, बिना खुद को इनसे जोड़े रखे।
दैनिक चिंतन
क्या आप भी जीवन के उतार-चढ़ावों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं? जब मन शांत और प्रकाशमय होता है तो खुशी मिलती है, लेकिन जैसे ही गहरा मोह या अज्ञान छा जाता है, हम निराशा में डूब जाते हैं। भगवान कृष्ण आपको बता रहे हैं कि एक ज्ञानी पुरुष न तो इन तीनों गुणों के प्रभाव से घबराता है और न ही उनके गायब होने पर चिंतित होता है। आप भी इस स्थिति में आ सकते हैं, बस यह समझकर कि ये सब 'गुण' हैं जो चलते रहेंगे, जबकि आप उनसे अलग एक साक्षी बनना सीख लें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए, जब भी मन में प्रकाश (सकारात्मकता), प्रवृत्ति (उत्साह) या मोह (अज्ञान) का उदय हो, स्वयं को यह बताएं कि ये तीनों ही स्वाभाविक रूप से आते और जाते हैं। अपने आप को इन भावनाओं के प्रति न तो विरोध करें और न ही इन्हें रोकने की कठोरता दिखाएँ; बस एक साक्षी (साक्षी-भावन) के रूप में उन्हें देखकर स्थिर रहें।
मुख्य शिक्षाएँ
- निष्पक्षता का मार्ग (Path of Neutrality)
कर्मयोगी न तो सकारात्मक गुणों के आने पर हर्षित होता है और न ही ऋणात्मक या भ्रामक गुणों से द्वेष करता है। यह समझना कि ये सभी प्रकृति की अवस्थाएँ हैं, हमें उनके दास बनने से मुक्त करती है। - गुणों का चक्र (The Cycle of the Gunas)
प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह एक-दूसरे के बाद आते हैं; इनकी निरंतरता ही जीवन की प्राकृतिक गति है। जब यह अवस्था समाप्त होती है, तो ज्ञानी व्यक्ति उसे वापस पाने की लालसा (कांक्षा) नहीं रखता क्योंकि वह जानता है कि नया चक्र शुरू होने वाला है। - स्वतंत्र साक्षी भावना (The State of Detached Witness)
वास्तविक मुक्ति तब आती है जब हम इन गुणों के प्रभाव को स्वीकार करते हुए भी उनके अंदर नहीं डूबते। यह 'द्वेष' और 'कांक्षा' का त्याग ही वह स्थिति है जो पुरुषार्थी को ब्रह्म के निकट लाती है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.14 — इस श्लोक में 'स्पर्शा' (छूत) की गति का वर्णन है जो इसमें आने वाले गुणों के अस्थायी स्वरूप को समझाने में मदद करता है।
- 14.20 — यह श्लोक बताता है कि कैसे व्यक्ति इन तीनों गুণों से मुक्त होकर 'गुणोत्तीर्ण' (उनसे ऊपर उठने) की स्थिति प्राप्त करता है।
- 14.25 — इसमें वह विधि और लक्षण दिए गए हैं जो ज्ञानी पुरुष को इन गुणों से मुक्त कर देते हैं, जिससे श्लोक 14.22 का परिणाम स्पष्ट होता है।
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