भगवद्गीता 14.25

Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 14.25 — "जो मान और अपमान में सम है; शत्रु और मित्र के पक्ष में भी सम है, ऐसा सर्वारम्भ परित्यागी पुरुष गुणाती"
भगवद्गीता 14.25 — Gunatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः | सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ||१४-२५||

लिप्यंतरण

mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ . sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate ||14-25||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति सम्मान और अपमान में समान भाव रखता है, न तो मित्र को अधिक प्यार करता है और न ही शत्रु से घृणा करता है, वही 'गुणातीत' माना जाता है। यह वर्णन उन मनुष्यों के लिए है जो सभी कर्मों का त्याग करके अपने स्वभाव की तीनों गुणों (सत्त्व, रजस् और तम) से ऊपर उठ चुके हैं। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि बाहरी परिस्थितियों या दूसरों के व्यवहार से प्रभाव न होकर आंतरिक स्थिरता ही वास्तविक मुक्ति की निशानी है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह अध्याय 'गुणों' (Prakriti) की प्रकृति और उनसे मुक्ति के सिद्धांत पर आधारित है, जो संख्य दर्शन और कर्मयोग का गहरा अंग है। यह श्लोक भक्ति योग के उस चरण को परिभाषित करता जहाँ साधक 'गुणातीत' (Gunaatita) बन जाता है—अर्थात् वह सृष्टि की तीनों गुणों से प्रभावित होने वाले बंधन में नहीं फंसता और न तो आशा करता है और न ही भयभीत होता है। यह ज्ञानयोग का भी हिस्सा है क्योंकि इसमें 'पुरुष' (आत्म) के अनात्मात्व को समझाया गया है जो गुणों से परे स्थित है।

शब्दार्थ
मानापमानयोः in honour and dishonour, तुल्यः the same, तुल्यः the same, मित्रारिपक्षयोः to friend and foe, सर्वारम्भपरित्यागी abandoning all undertakings, गुणातीतः crossed the Gunas, सः he, उच्यते is said
पारंपरिक भाष्य
He keeps a balanced mind in honour and dishonour. He is the same to friend and foe. He is not affected by the dual throng. He has risen above the Gunas. He rests in his own essential nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute. He abids in his own Self. He is a Gunatita (one who has transcended the alities of Nature) who is not affected by the play of the alities. He keeps an even outlook amidst changes. He maintains a clam eilibrium. He abandons all actions that can bring visible or invisible fruits or results but he does actions that are necessary for the bare maintenance of his body. The alities described in verses 23? 24 and 25, such as indifference, etc., are the means for attaining liberation. They represent the ideal that you should have before you. The aspirant should cultivate them. But one attains knowledge of the Self when he abides in his own true nature. These attributes form part and parcel of his nature and serve as marks to indicate that he has crossed beyond the three alities. The Lord gives in the following verse the answer to the third estion of Arjuna How does one go beyond the three alities

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा महाराज अर्जुन को दिया गया उपदेश का हिस्सा है, जो पांडवों और कौरवों के बीच संघर्ष की घोषणा से ठीक पहले आया था। इस समय तक कृष्ण ने गीता में कर्मयोग, ब्रह्मज्ञान और भक्ति मार्ग का विस्तृत वर्णन किया है और अब वे अर्जुन को 'सर्वगुणातीत' (गुणों से परे) व्यक्ति की परिभाषा दे रहे हैं। अर्जुन इस युद्ध में संदेह और करुणा के कारण उदाश होकर खड़े थे, इसलिए कृष्ण उन्हें यह सिखा रहे हैं कि कैसे मन को बाहरी दुनिया के द्वंद्वों (मान-अपमान) से मुक्त किया जाए।

आज के जीवन में

कल्पना करें एक प्रोफेशनल जो अपने करियर में किसी बड़ी प्रमोशन या ऑनलाइन ट्रांसफॉर्मेटिव फीडबैक का सामना करता है; अगर वह न तो अत्यधिक घमंडी हो जाए और न ही हार मान लें, वही गुणातीत व्यवहार होगा। एक माता-पिता के रूप में यदि आपका बच्चा आपके प्रति कृतज्ञ नहीं होता (अपमान) या बहुत आदर करता है (सम्मान), तो भी आप अपने प्यार और निर्णयों को स्थिर रखते हैं, यह यही सिद्धांत है। जब किसी दुख की घड़ी में मित्र आपको साथ देता है और शत्रु आपको छोड़ जाता है, तो गुणातीत व्यक्ति दोनों के प्रति समान भावनाओं से कार्य करता है क्योंकि उसे पता होता है कि परिस्थितियां क्षणभंगुर हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे एक बड़ा सा पहाड़, चाहे ऊपर कोई उसे फूल दे (सम्मान) या नीचे कंक्रीट का टुकड़ा मारे (अपमान), वह हिलता नहीं और अपनी जगह पर वही रहता है। ठीक उसी तरह जो व्यक्ति मित्र के साथ बहुत ज्यादा खुश होकर चिढ़ाया जाए तो नाराज भी नहीं होता, या शत्रु से मिलने पर घबराता भी नहीं, वही सबसे बहादुर और समझदार इंसान कहलाता है। जब हम अपने दिल को पहाड़ की तरह मजबूत बना लेते हैं, तो बाहर कुछ भी हो जाए, अंदर शांति बनी रहती है।

दैनिक चिंतन

आपने कभी सोचा है कि सच्ची शांति तब मिलती है जब बाहरी दुनिया आपके प्रति क्या कर रही है, इस पर आपका ध्यान नहीं रहता? यह श्लोक आपको बताता है कि एक गुणातीत पुरुष वही है जो न तो प्रशंसा में घमंडी होता है और न ही निन्दा में हतोत्साह। जब आपके मित्र और विरोधी दोनों की स्थिति आपकी आंतरिक शांति को नहीं बदल सकती, तब आप वास्तव में कर्म के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। यह याद रखें कि आपका असली स्वभाव इन सबके बाहर है, इसलिए आज किसी भी परिस्थिति का सामना समान मनोदशा से करें।

आज के लिए एक अभ्यास

आज की प्रार्थना में, जब भी आपके मन में कोई मान या अपमान का भाव उठे, तुरंत रुक जाएं और अपने आप से पूछें: 'यह कौन है जो दुखी हो रहा है?' शत्रु के प्रति क्रोध या मित्र के प्रति अतिशय स्नेह जैसे दो ध्रुवीय विचारों को एक ही स्थान पर रखकर देखिए। इस समभाव (समत्व) की अनुभूति करते हुए, अपनी आत्मा को इन गुणों से ऊपर उठाने का अभ्यास करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. मान और अपमान में समत्व (Samatva)
    जीवन के उतार-चढ़ावों, यानी प्रशंसा या निन्दा में बराबर रहना ही सच्चे ज्ञान का लक्षण है। जब व्यक्ति इन दोनों से अलग होकर अपनी आत्मिक स्थिति को बनाए रखता है, तो वह गुणों के नियंत्रण से बाहर निकल जाता है।
  2. मित्र और शत्रु में समभाव
    सच्चे योगी की दृष्टि में मित्र भी वही हैं जो विरोधी, क्योंकि वे दोनों ही कर्म-फल के कारण होते हैं न कि आत्मा के गुणों से। इस प्रकार का निष्पक्ष भाव व्यक्ति को पारस्परिक द्वंद्व और मोह से मुक्त करता है।
  3. सर्वारम्भ परित्याग (Tyaga)
    यहाँ 'परित्याग' का अर्थ कर्म करने से मना करना नहीं, बल्कि फल की इच्छा और स्वार्थ के साथ किए जाने वाले सभी प्रयासों को त्याग देना है। जो व्यक्ति ईश्वर-अर्पण भाव में सर्वोच्च उद्देश्य के लिए कार्य करता है, वही 'गुणातीत' कहलाता है।

विषय

समत्व (Equanimity)गुणातीत पुरुष (The Transcendental Soul)मान-अपमान की समताकर्म त्याग (Renunciation of Action)द्वंद्व से मुक्ति (Freedom from Dualities)चिन्तामणि (Steadfastness)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग का मूल सिद्धांत देता है और गुणातीत होने के लिए फल त्याग की आवश्यकता को समझने में मदद करता है।
  2. 3.30 — इसमें कर्मों का पूर्ण रूप से ईश्वर को अर्पित करने (ईश्वरादिष्ट कर्म) की विधि बताई गई है, जो समभाव बनाए रखने में सहायक होती है।
  3. 12.15 — भगवान स्वयं उन भक्तों का वर्णन करते हैं जिनसे सभी दुखी होते और जो किसी से न खुश होते, यह गुणातीत जीवन की एक मूर्ति है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुणातीत (Gunaatita) शब्द का अर्थ क्या है?
'गुण' से तात्पर्य प्रकृति की तीन गुणों—सत्व, रज और तम से है। 'अतीत' का मतलब उससे परे होना या उनका बंधन तोड़ देना होता है। इसलिए गुणातीत वह व्यक्ति है जो इन तीनों गुणों के प्रभाव (जैसे आशा, भय, मोह) से मुक्त होकर उनके ऊपर स्थित रहता है।
क्या सर्वारम्भ परित्यागी का मतलब यह है कि व्यक्ति कुछ भी नहीं करे?
नहीं, इसका अर्थ कर्म न करना या आश्रय लेना नहीं है। 'सर्वारम्भपरित्यागी' का तात्पर्य उन सभी कार्यों को छोड़ने से है जो केवल फल की इच्छा, घमंड या व्यक्तिगत लाभ के लिए किए जाते हैं। गुणातीत व्यक्ति कर्म करता है लेकिन किसी विशेष परिणाम (फल) में बंधे बिना, निस्वार्थ भाव से कार्य करके उस स्थिति को प्राप्त किया जाता है।
क्या यह श्लोक केवल संन्यासियों या ऋषि-मुनि के लिए है?
यह सिद्धांत सभी मनुष्यों के लिए प्रासंगिक है, चाहे वे घर में रहते हों या वानप्रस्थ/सन्यासी। गीता का उद्देश्य यह नहीं कि कोई भौतिक जीवन छोड़ दे, बल्कि मन को बाहरी दुनिया के द्वंद्वों (मान-अपमान) से मुक्त करके उसमें ही स्थिर रहना सिखाती है।
मित्र और शत्रु पर समभाव रखने का व्यावहारिक तरीका क्या है?
इसका अर्थ यह नहीं कि हम मित्र को न पहचानें या शत्रु की बुराई स्वीकार करें। इसका मतलब है कि हम अपनी भावनाओं और आत्म-मूल्य का निर्णय दूसरों के व्यवहार पर आधारित न होने दें, चाहे वे कृपया करके भी हों या घृणा करके भी। जब आप किसी व्यक्ति को उसकी प्रकृति (गुण) से नहीं देखकर उसके आत्मिक स्वरूप के रूप में देखते हैं, तब समभाव स्वतः ही प्राप्त होता है।
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