भगवद्गीता 6.7
Dhyana Yoga · हिन्दी अनुवाद
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः | शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ||६-७||
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ . śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ||6-7||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को ध्यान योग के महत्व समझाते हुए कह रहे हैं कि जब मनुष्य अपने मन और इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है, तो वह सदा प्रशान्त रहने लगता है। ऐसा जितात्मा व्यक्ति चाहे सर्दी हो या गर्मी, सुख मिले या दुःख हो, तथा मान-अपमान का सामना करें, उसे उसमें कोई विशेष भिन्नता नहीं दिखाई देती। इस स्थिति में परमात्मा (आत्मरूप) ऐसे पुरुष के हृदय में पूर्णतः सम्यक् प्रकार से विद्यमान हो जाता है और वे आनंदमय जीवन जीते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'ध्यान योग' और 'ज्ञान योग' की गहनता को जोड़ता है, जहाँ 'समभाव' (equanimity) एक प्रमुख साधना माना गया है। इसमें सिद्ध किया जाता है कि जब व्यक्ति संसार के द्वंद्वों (दुःख-सुख, शीतोष्ण, मान-अपमान) से मुक्त होकर 'विषमता' को दूर कर लेता है, तभी वह आत्मरूप में स्थिर होता है और परमात्मा का अनुभव करता है। यह उपदेश सांख्य दर्शन की प्रकृति के द्वंद्वों (gunas) से मुक्ति और योग के अंतर्गत मानसिक एकाग्रता को विकासशील सिद्धांत पर आधारित है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित है, जहाँ अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने विषम अवस्था और संघर्ष का वर्णन किया था। इससे पूर्व, कृष्ण ने गीता के पहले छह अध्यायों (संख्या 1-5) में ज्ञान योग और निष्काम कर्म की बात करते हुए अर्जुन को क्रोध व मोह से मुक्त होने का मार्ग दिखाया था। अब श्लोक संख्या 6.7 के समय, कृष्ण 'ध्यान योग' (अष्टांग योग) प्रारंभ कर रहे हैं और बता रहे हैं कि मानसिक शांति प्राप्त करने वाला साधक कैसे ईश्वर-साक्षात्कार की स्थिति में पहुँचता है। अर्जुन अभी भी द्वंद्वों से ग्रस्त था, लेकिन कृष्ण उसे यह संदेश देते हैं कि आत्मविश्वास और समभाव (equanimity) ही परमात्मा को प्राप्त करने का प्रमुख साधन है।
आज के जीवन में
आज के तनावपूर्ण कार्यकाल में जब एक नौकरशाह या एचआर मैनेजर अचानक किसी गलत निर्णय की वजह से कठोर आलोचना (अपमान) का सामना करता है, तो उसकी प्रतिक्रिया 'समभाव' होनी चाहिए। यदि वह मान-अपमान और सुख-दुःख को समान दृष्टि से देखता है, न कि डर या घमंड में बह जाता है, तो उसे यह पता चलता है कि उसकी आत्मिक शक्ति बाहर की परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। इस स्थिति में वह व्यक्ति तुरंत अपनी मानसिक शांति को पुनः प्राप्त करता है और सही निर्णय लेने की क्षमता से वंचित नहीं रह जाता, बल्कि कृष्ण के अनुसार उसमें ईश्वरीय दृष्टि (परमात्मा) का आगमन होता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना कीजिए कि एक बहुत शक्तिशाली राजा अपने मन पर कब्ज़ कर लेता है, जैसे कोई कुत्तों को पकड़कर रखने वाली मजबूत जंजीर से बांध देता है। जब वह राजा गर्मी में भी ठंड महसूस करता है या सर्दी में ही गर्मी, और किसी के द्वारा उसे सम्मान मिले या बदनाम किया जाए, तो वह गिर नहीं जाता बल्कि मुस्कुराता रहता है क्योंकि उसका मन शांत है। यही एक 'जितात्मा' (अपने आप पर विजय पाने वाला) व्यक्ति होता है, और भगवान कृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोगों के साथ ईश्वर सबसे अच्छी दोस्ती करते हैं और हमेशा उनके साथ रहते हैं।
दैनिक चिंतन
क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि बाहरी परिस्थितियाँ—चाहे वह गर्मी हो या ठंडा मौसम, चाहे कोई आपकी प्रशंसा करे या ताना मारे—आपके अंदर के शांत को खराब कर देती हैं? इस पद में भगवान कृष्ण बताते हैं कि जब हम 'जितेंद्रिय' हो जाते हैं, तो इन सभी विरोधों में भी आपका मन समता बनाए रखता है। सच कहूँ तो, तभी वास्तविक शांति मिलती है और परमात्मा आपके हृदय में पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए अपने मन को स्थिर करके बैठें और शीत या उष्णता, सुख या दुःख जैसे बाहरी अनुभवों पर ध्यान दें। इन सभी विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को एक गहरा शांत सक्षम (श्रद्धालु) पुरुष की तरह देखें और समझें कि आपकी आत्मा इन सब से ऊपर है, जहाँ परमात्मा निवास करता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- समभाव (Samata) की योगाभ्यास
योगी का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि वह सुख और दुःख, मान और अपमान जैसे विपरीत अनुभवों में समान रहता है। जब मन इन बाहरी आवेगों से प्रभावित नहीं होता, तभी आत्म-ज्ञान की गहराई प्राप्त होती है। - परमात्मा का निवास
जब एक व्यक्ति अपने इन्द्रियों और मन को जीत लेता है (जितेन्द्रिय), तो वह आत्मरूप में स्थिर हो जाता है। ऐसे स्थापित पुरुष के लिए परमात्मा सदैव सम्यक् प्रकार से उपस्थित रहते हैं, क्योंकि वे अब भिन्न नहीं होते। - बाहरी संवेदनाओं का अतीत
'शीतोष्ण' और 'सुख-दुःख' के साथ 'मानापमान' भी इस सूक्ति में शामिल हैं, जो दर्शाता है कि सामाजिक मान्यताएँ या उनकी विपर्याय से मुक्त होना आवश्यक है। यह समझना ही ध्यान योग की सच्ची प्रगति है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस श्लोक के लिए कर्मयोग का आधारभूत सिद्धांत समझने हेतु यह आगे पढ़ें, जहाँ 'फल की इच्छा न करना' और मन को स्थिर रखना बताया गया है।
- 3.30 — अर्जुन के कर्मों का समर्पण करने की बात करते हुए, यह पढ़ें कि कैसे दृढ़ निश्चय और भक्ति से मन को स्थिर किया जाता है।
- 12.15 — जो व्यक्ति सुख-दुःख में समान रहता है, वह कृष्ण का प्रिय माना गया है; यह पढ़ें कि एक आदर्ष्ट भक्त के गुण क्या हैं।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.