भगवद्गीता 2.57
Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||२-५७||
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham . nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||2-57||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
यह श्लोक भगवान कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि जो व्यक्ति हर स्थिति में किसी वस्तु या परिस्थिति से अधिक स्नेह (आसक्ति) नहीं रखता, वह न तो अच्छी चीज़ों के मिलने पर अत्यधिक खुश होता है और न ही बुरे अनुभव होने पर दुख या क्रोधित होता है। जब कोई व्यक्ति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिस्थितियों में समान दृष्टि से देखता रहता है, तभी उसकी बुद्धि स्थिर मानی जाती है। यह श्लोक 'प्रज्ञापतिष्ठित' या स्थिर प्रज्ञा की पहचان को स्पष्ट करता है कि मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों द्वारा हिलाने नहीं देना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
इस श्लोक का सार 'ज्ञान योग' और 'कर्मयोग' की प्रगति से जुड़ा है, जहाँ अविद्या (अज्ञान) के कारण उत्पन्न आसक्ति को दूर करके बुद्धि को स्थिर करना सिखाया गया है। यह संख्या दर्शन पर आधारित है जो भेदभाव (शुभ और अशुभ) की प्रकृति में समझाता है कि आत्मा इन दोनों से असंबंधित होती है, और जब व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है तो उसे 'प्रज्ञापतिष्ठिता' कहा जाता है। यह भावना भक्ति योग के उच्च स्तर पर भी लागू होती है जहाँ प्रेम (भक्त) ईश्वर में स्थिर होकर किसी बाहरी परिणाम की चिंता नहीं करता।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जहाँ पांडवों की सेना और कौरवों की सेना आमने-सामने खड़ी हैं। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने अर्जुन को अपने धर्म (युद्ध) का पालन करने के लिए प्रेरित किया है, क्योंकि युद्धभूमि में अत्यंत शोक और विषाद की अवस्था से गुजर रहे हैं। यह संवाद 'संख्या योग' अध्याय का हिस्सा है जहाँ कृष्ण आत्मा की अनश्वरता और कार्य के बंधन से मुक्ति का मार्ग समझाते हुए अर्जुन को स्थिर बुद्धि प्राप्त करने का उपदेश दे रहे हैं।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं और आपके boss द्वारा आपको बहुत सारी सराहना मिलती है, या फिर अचानक कोई बड़ा विफलता आ जाती है। स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए न तो वह सराहना उसे घमंड में डाल देगी और न ही उस विफलता से वह डिप्रेशन या क्रोध की अवस्था में चला जाएगा; वे दोनों स्थितियों में अपने कार्य पर ध्यान केंद्रित रखेंगे। इस प्रकार, आप किसी भी सकारात्मक या नकारात्मक परिणाम के प्रति अति प्रतिक्रिया (over-react) करने के बजाय संतुलन बनाए रख सकेंगे और बेहतर निर्णय ले पाएंगे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे तुम एक बहुत पुरानी, भारी और स्थिर चट्टान हो जो तूफ़ान में भी हिलती नहीं है। जब चांद निकलता है (अच्छा समय), तो चट्टान ज्यादा मुस्कुराती नहीं है, और जब बादल छा जाते हैं (बुखार या बुरे दिन), तो वह डरकर कांपती नहीं है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि अगर तुम भी उस चट्टान की तरह होओगे—न ज्यादा खुश होंगे न ज्यादा दुःखी, चाहे घर में क्या भी हो—तो तुम्हारा मन हमेशा शांत और मजबूत रहेगा।
दैनिक चिंतन
प्रिय मित्र, जीवन के हर पल आपको कुछ न कुछ प्राप्त होता है या खोता भी रहता है, और इससे आपका मन कभी खुश तो कभी दुखी हो जाता है। श्रीकृष्ण आज बता रहे हैं कि सच्ची बुद्धि का लक्षण यह नहीं है कि बाहरी परिस्थितियां अच्छी हों, बल्कि यह है कि चाहे जो भी घटे आप न प्रसन्न होते हैं और न ही द्वेष करते हैं। जब आप शुभ-अशुभ के चक्र में फंसने की जगह उन्हें देखते रहेंगे तो आपका मन स्थिर हो जाएगा और आपको आंतरिक शांति मिलेगी।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए, मन को स्थिर करने की प्रार्थना करें कि आप सुख और दुःख दोनों में समान रहें। जब भी कोई शुभ या अशुभ घटना आपके सामने आए, तो तुरंत संतोष और उदासीनता का भाव लाएं। इस प्रकार अपने मन को बाहरी परिस्थितियों से स्वतंत्र करके आंतरिक शांति में स्थापित करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- समभाव का योग (Equanimity)
यह शिक्षा बताती है कि एक स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति सुख और दुःख दोनों को समान दृष्टि से देखता है। वह न तो सफलता पर अति प्रसन्न होता है और न ही विफलता या कठिनाइयों में घबराहट या द्वेष करता है। - स्नेह-रहित दृष्टिकोण (Detachment)
'अनभिषेह' का अर्थ है निष्पक्षता और आसक्ति की अनुपस्थिति; यह वह अवस्था है जहां व्यक्ति वस्तुओं या परिणामों से भावनात्मक रूप में जुड़ा नहीं होता। जब हम किसी चीज़ के प्रति अति स्नेह नहीं करते, तो न कोई हानि होने पर दुःख होता है और न लाभ मिलकर घमंड आता है। - प्रज्ञा की स्थिरता (Steady Wisdom)
जब मन सफल-असफल के द्वंद्व से मुक्त हो जाता है, तभी वास्तविक ज्ञान या 'प्राज्ञ प्रतिष्ठित' का मार्ग खुलता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्थिर बुद्धि बाहरी दुनिया को नकारना नहीं है, बल्कि उसमें रहते हुए भी आत्म-नियंत्रण और स्पष्ट दृष्टिकोण बनाए रखना है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.48 — इसके बाद श्लोक पढ़ें जो 'योग' की परिभाषा देता है और बताता है कि कैसे कार्य करते समय फल के आकांक्षा से मुक्त रहना चाहिए।
- 3.30 — आगे का पाठ आपको सिखाएगा कि कर्मों को ईश्वर में समर्पित करके कैसे द्वेष और आसक्ति दोनों से मुक्त होकर कार्य करना है।
- 12.15 — अंत में, इस श्लोक का अध्ययन आपको बताएगा कि भगवान के लिए समस्त जीवों की आत्माओं को प्रिय बनने वाले कौन से गुण हैं जो स्थिरता लाते हैं।
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