भगवद्गीता 9.12

Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 9.12 — "वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को "
भगवद्गीता 9.12 — Raja Vidya Raja Guhya Yoga
संस्कृत

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ||९-१२||

लिप्यंतरण

moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ . rākṣasīmāsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ ||9-12||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो लोग वरिष्ठ ज्ञान और आध्यात्मिक मार्ग को नकारकर केवल वांछाओं, व्यर्थ कर्मों और मिथ्या ज्ञान पर जीते हैं, वे राक्षसी और असुरी प्रकृति में लिप्त हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होते हैं और भौतिक दुनिया की मोहिनी छलांग के चक्कर में आत्म-विनाश का मार्ग अपना लेते हैं। कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जब कोई मनुष्य ईश्वरीय धर्म को छोड़ देता है, तो उसका स्वभाव निश्चित रूप से पतन की ओर जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह उपदेश 'भक्तियोग' (Bhakti Yoga) के तहत पड़ता है जो ज्ञान और कर्म की शुद्धता पर आधारित है, यह स्पष्ट करता है कि भक्ति का अभाव या विपरीत मार्ग मानव प्रकृति को राक्षसी बना देता है। यह 'संख्या' (Sankhya) दर्शन के तर्कों से जुड़ा हुआ है जो दो प्रकार की प्रकृतियों — ईश्वरीय और असुरी/राक्षसी — का विवेचन करता है, जहाँ मोह (illusion) को हटाना आवश्यक है। यह 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) के इस सिद्धांत को भी विकसित करता है कि सच्चा ज्ञान वह नहीं जो अस्थायी फल की अपेक्षा करे, बल्कि वह हो जिसमें ईश्वरीय धर्म और आत्म-साक्षिकता शामिल हो।

शब्दार्थ
मोघाशाः of vain hopes, मोघकर्माणः of vain actions, मोघज्ञानाः of vain knowledge, विचेतसः senseless, राक्षसीम् devilish, आसुरीम् undivine, च and, एव verily, प्रकृतिम् nature, मोहिनीम् deceitful, श्रिताः (are) possessed of
पारंपरिक भाष्य
They entertain vain hopes, for there can be no hope in perishable forms. It is vain hope because they run after transient objects and miss the Eternal. It is vain action, because it is not performed by them as sacrifice unto the Lord. The Agnihotra (a ritual) and other actions performed by them are fruitless, because they insult the Lord. They are senseless. They have no,discrimination. They have no idea of the eternal Self. They worship their body only. They behold no self beyond the body. They neglect their own Self. They do atrocious crimes and cruel actions. They rob others property and murder people. They partake of the nature of the demons and the undivine beings. The Rakshasa are Tamasic and the Asuras are Rajasic. Prakriti means here Svabhava (ones own nature).They see the external human body only. They have no knowledge of the Self that dwells within the body. They do not behold God in the universe. They life for eating and drinking only. He who entertains hope of getting the rewards of actions through mere Karma alone, without the grace of the Lord is one of empty hope and empty deed. Karmas are insentient. They cannot give rewards independently. The omniscient Lord Who knows the relationship between Karmas and their fruits can dispense them. He who has obtained knowledge from books which do not admit of the existence of the Self and which do not speak of the Self is one of empty knowledge. This will not give any reward. That knowledge obtained through the study of spiritual books which treat of Brahman alone can give the reward. (Cf. VII.15XVI.6?20)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश का हिस्सा है, जब वे 'राजविद्या राज गुह्य योग' (अध्याय 9) की चर्चा कर रहे हैं। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अपने विश्वरूप और अपनी सर्वव्यापी प्रकृति के बारे में बताया था, जो अर्जुन को मोहित करने वाले भौतिक बंधनों से मुक्त करता है। अर्जुन युद्ध का बोझ उठाकर संघर्ष कर रहे थे, लेकिन कृष्ण उन्हें बताते हैं कि यदि वे ईश्वरीय ज्ञान और धर्म की अनदेखी करते हुए केवल पद-प्राप्ति या लालसा में जीवित रहेंगे, तो उनका परिणाम राक्षसी प्रकृति में लिप्त होना होगा। यह संवाद उस समय हुआ जब अर्जुन को अपनी कर्तव्यनिष्ठा और भक्ति के बीच स्पष्टता की आवश्यकता थी।

आज के जीवन में

आधुनिक जीवन में, एक व्यक्ति जो लगातार सोशल मीडिया पर 'सफलता' या 'लोकप्रियता' पाने के लिए व्यर्थ प्रयास कर रहा है और जिसका ध्यान सिर्फ तुरंत रिजल्ट हासिल करने तक सीमित है, वह इसी श्लोक की स्थिति में हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपने व्यावसायिक या पारिवारिक निर्णयों में ईमानदारी (धर्म) को छोड़कर केवल लालच और स्वार्थ पर चलता है, तो वह मानसिक शांति खो देता है और एक गहरे दुख या 'अशांत' भावना में जीने लगता। इस स्थिति से बचने के लिए, हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हमारा कर्म (action) वास्तव में सार्थक है या वह सिर्फ बाहरी दिखावे और अस्थायी लालसाओं का परिणाम है, जिससे हम अपनी आत्मिक शक्ति को कमजोर कर रहे हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे किसी बच्चे ने अपने दोस्तों के साथ खेलने का वादा किया लेकिन वह सिर्फ अपनी नई खिलौनों में उलझा रहा और दूसरों को भूल गया, जिससे उसे सबका प्यार नहीं मिला। इस श्लोक कहानी हमें बताती है कि अगर कोई बस अपने मन की हर इच्छा पूरी करने पर ध्यान देता है और सही रास्ता भूल जाता है, तो वह एक ऐसे जंगल में फंस सकता है जो डरावना होता है। जैसे किसी को गलत दिशा में ले जाने वाला चक्कर (मोह) उसे असली खुशी से दूर कर देता है, वैसे ही लोग भी बुरी आदतों और झूठे सपनों में उलझ जाते हैं जो उन्हें दुख देती हैं।

दैनिक चिंतन

प्यारे मित्र, अक्सर हम बिना विचार के अपनी कामनाओं और कर्मों को मोह की दुनिया में बहा देते हैं। यह भगवान श्री कृष्ण बता रहे हैं कि जब हम राक्षसी या असुरी प्रकृति का आश्रय लेते हैं, तो हमारा ज्ञान भी फिक्सा हो जाता है और जीवन वथा निकलता है। आज से निर्णय लें कि आपका हर विचार और कर्म मोह से मुक्त होकर दिव्य चेतना की ओर अग्रसर हो।

आज के लिए एक अभ्यास

आज की साधना में यह सोचें कि आपकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान किस दिशा में बह रहे हैं। क्या वे अस्थिरता और भ्रम के स्वभाव (प्रकृति) को धारण कर रही हैं या स्थिर चेतनता की ओर? एक गहन सांस लेते हुए अपने मन से पूछें: 'क्या मैं वथा आशाओं में फँसा हूँ?'

मुख्य शिक्षाएँ

  1. मोहित प्रकृति का आश्रय लेने का परिणाम
    जब व्यक्ति राक्षसी या असुरी स्वभाव को अपनाता है, तो वह भौतिक मोह में फंस जाता है जो उसे दिव्य ज्ञान से दूर रखता है। यह प्रकृति 'मोहिनी' कहलाती है क्योंकि इसमें रहकर मनुष्य अपनी वास्तविक पहचान और परमात्मा को नहीं देख पाते।
  2. तुरंत वथा आशा, कर्म और ज्ञान का नाश
    इस श्लोक में तीन प्रकार की 'मोघ' (वर्थ) स्थितियों का वर्णन है: बिना फल के चिंता करना, नैतिक आधार से रहित कर्म करने और अविचारी ज्ञान रखना। इन तीनों को छोड़कर ही मनुष्य मोह की यह गतिरोधक अवस्था से मुक्त हो सकता है।
  3. अविचारशीलता के रूप में चेतना का अभाव
    'वचेतसः' शब्द उन लोगों को संदर्भित करता है जिनका विवेक और बुद्धि विकृत हो चुकी है, वे बिना गहराई से सोचें कर्म करते हैं। जब चेतना का मार्ग अंधकार में डूब जाता है, तो व्यक्ति अपनी ही प्रकृति के भ्रम में जीता रहता है।

विषय

धर्म और अधर्म (Dharma vs Adharma)असुरी प्रकृति (Demoniac Nature)मोह और भ्रम (Illusion and Deceit)व्यर्थ कर्म और ज्ञान (Vain Actions & Knowledge)आत्म-विनाश (Self-Destruction)ईश्वरीय मार्ग का महत्व (Importance of Divine Path)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक आपको 'कर्म फल' के सिद्धांत को समझने में मदद करेगा जो वथा कर्म और आशा से सीधा संबंधित है।
  2. 3.27 — यह पढ़ें ताकि आप समझ सकें कि कैसे प्रकृति के गुणों में बंधे रहकर मनुष्य स्वतंत्र कर्ता बनने से वंचित हो जाता है।
  3. 16.3 — इस अध्याय का यह श्लोक राक्षसी और दैवी गुणों के अंतर को स्पष्ट करता है, जो इस विषय की गहराई बढ़ाएगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रुद्धि (श्लोक) के अनुसार 'मोघाशा' और 'मोगहाशा' का क्या मतलब है?
'मोघाशा' का अर्थ है व्यर्थ आशा या निराधार इच्छाएं, जहाँ व्यक्ति सही दिशा में नहीं देखता बल्कि केवल भौतिक फलों की लालसा रखता है। जब कोई व्यक्ति ईश्वरीय धर्म को नजरअंदाज करके केवल अपने स्वार्थ पूरे करने की उम्मीद करता है, तो उसे 'मोघाशा' कहा जाता है जो अंततः निराश और हतोत्साहित बनाती है।
क्या यह श्लोक केवल पापियों पर लागू होता है या आम मनुष्यों पर भी?
यह श्लोक सभी मानवों पर लागू होता है जो ईश्वरीय ज्ञान और धर्म का मार्ग छोड़कर अज्ञानता में चलते हैं। यदि कोई व्यक्ति समय-समय पर अपनी प्रकृति को सही दिशा देने के बजाय लालसा, क्रोध या मोह में लिप्त हो जाता है, तो वह इस 'असुरी' अवस्था की ओर बढ़ सकता है जो सभी मनुष्यों के लिए एक चेतावनी है।
'राक्षसी प्रकृति' और 'आसुरी प्रकृति' में क्या अंतर है?
श्लोक में दोनों शब्दों का उपयोग समानार्थी रूप से किया गया है जो एक ही अवस्था को दर्शाते हैं — वह जहाँ मनुष्य ईश्वरीय गुणों (सत्व, रज, तम के संतुलन) की अनुपस्थिति में अहंकार और क्रोध में जीता है। 'राक्षसी' शब्द बलात्कारी या हिंसक स्वभाव को दर्शा सकता है जबकि 'आसुरी' अधिकतर ईश्वरीय नैतिकता से विमुख होने के संदर्भ में प्रयोग होता है, लेकिन यहाँ दोनों का अर्थ एक ही है।
इस श्लोक से हमें जीवन में क्या सीखनी चाहिए?
हमें यह समझना चाहिए कि व्यर्थ आशाओं और झूठे ज्ञान पर जीने का परिणाम मानसिक दुःख और नैतिक पतन है। सच्ची खुशी तभी मिलती है जब हम अपने कर्मों को ईश्वरीय धर्म के अनुसार निष्कामी भाव से करते हैं और भौतिक मोह की छलांग से बचते हुए आत्म-साक्षिकता पर आधारित जीवन जीते हैं।
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