भगवद्गीता 17.8
Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः | रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ||१७-८||
āyuḥsattvabalārogyasukhaprītivivardhanāḥ . rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛdyā āhārāḥ sāttvikapriyāḥ ||17-8||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि सात्विक व्यक्ति के लिए भोजन का चयन कैसे होना चाहिए। यह श्लोक बताता है कि जो खाद्य पदार्थ आयु, बल, स्वास्थ्य और सुख बढ़ाते हों, वे हमेशा प्रिय होते हैं। ऐसा भोजन स्वादिष्ट, नमकीन (स्निग्ध) और पाचनीय होना चाहिए जो मन को स्थिरता व शांति दे।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक वेदांत की 'त्रिगुणात्मक' (Satva-Rajas-Tamas) सिद्धांत पर आधारित है और विशेष रूप से भक्ति योग और कर्म योग के अन्तर्गत आता है जहाँ शरीर को ईश्वर का मंदिर मानकर उसकी देखभाल करना आवश्यक बताया गया है। यह 'आहार-विचार' (food-mind) संबंध पर जोर देता है, यह सिद्धांत कि हमारे भोजन के गुण सीधे हमारे मन और बुद्धि की स्थिति को प्रभावित करते हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है, जो गीता के चौदहवें अध्याय में आता है। इस समय तक कृष्ण ने सात्विक, राजसिक और तामसिक गुणों का वर्णन कर दिया था और अब वे इनके प्रतिकूल विषय पर चर्चा कर रहे हैं। अर्जुन युद्ध के लिए उत्साहित होकर अपने मन में संदेह दूर करने की स्थिति से गुजर रहा है, इसलिए कृष्ण उसे यह बता रहे हैं कि कैसे सही भोजन और आहार उसके मानसिक स्वरूप (मूड) को सात्विक बना सकता है।
आज के जीवन में
आज के भागदौड़ भरे जीवन में जब हम बार-बार बाहर का तला हुआ या पैकेट वाले खाने पर निर्भर हो जाते हैं, तो अक्सर थकान और चिंता महसूस होती है। इस श्लोक को लागू करते हुए, आप अपने काम की दोपहर के भोजन में ऐसे पदार्थों (जैसे दाल, सब्जी या फल) का चयन करें जो पाचन आसान हों और आपको रात भर ऊर्जा दें न कि भारी बनाएं। जब आप अपनी खान-पान को सात्विक रखते हैं, तो काम के दौरान मानसिक स्पष्टता बढ़ती है और तनाव कम होता है, जिससे कठिन निर्णय लेना आसान हो जाता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे एक कार चलने के लिए अच्छी क्वालिटी की पेट्रोल लेती है ताकि वह तेज़ चले, वैसे ही हमारी शरीर और दिमाग भी 'अच्छा खाने' से सुखी होते हैं। अगर आप ऐसी चीजें खाएंगे जो आपको मज़बूत बनाएं और बहुत थका न दें (जैसे ताजे फल या दही), तो आप खुश रहेंगे। लेकिन चिपचिपा या बेस्वाद खाना आपके दिमाग को भारी कर देता है, इसलिए कृष्ण जी कहते हैं कि हमें ऐसा खाना चुनना चाहिए जो आपको ऊर्जा और प्रसन्नता दे।
दैनिक चिंतन
आज जब आप अपना अन्न ग्रहण करते हैं, तो केवल पाचन का कार्य नहीं कर रहे होते, बल्कि अपने शरीर की ऊर्जा को सतत्विक बनाने का साधक भी बन जाते हैं। क्या आपके भोजन में वह 'स्निग्धता' और 'स्थिरता' है जो मन को प्रसन्न करती हो? याद रखें कि आपका अहम इस भोज्य पदार्थ के गुणों से ही निर्मित होता है; यदि यह रसायुक्त और हृद्य होगा, तो आपकी सत्त्व भी वही होगी।
आज के लिए एक अभ्यास
अपने आज के भोजन को सतत्विक आहार का रूप देने की प्रार्थना करें। मन में यह धारणा लाएं कि जो खा रहे हैं वह आपकी आयु, बल और सुख को बढ़ा रहा है। इस भोज्य पदार्थ से अपने शरीर को शुद्धि मिल रही है और हृदय को शांति प्राप्त हो रही है, इसे अनुभव करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- आहार का आत्म-निर्माण में योगदान
भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि हमारी आयु और प्रकृति (सत्त्व) को बढ़ाने के साधन है। सतत्विक आहार शरीर की शुद्धि और मन में स्थिरता लाकर व्यक्ति को ऊंचाई पर ले जाता है। - स्वाद और स्निग्धता का महत्व
सात्त्विक भोजन वह होता जो स्वादिष्ट (रसयुक्त) हो, तेल या घी से युक्त (स्निग्ध) हो, और हृदय को प्रिय लगे। यह आहार न तो अत्यधिक कड़वा है और न ही अधिक मसालेदार; बल्कि संतुलित होता है जो शरीर के लिए स्थिरता लाता है। - प्रकृति की चयन में सात्त्विक सत्य
जिस आहार से सुख, प्रीति और आरोग्य बढ़ते हैं वही 'सात्त्विक' कहलाता है। यह विधि हमें सिखाती है कि भोजन का चयन न केवल स्वाद से, बल्कि उसकी गुणात्मक सद्गुणों (आयु, बल, सुख) को बढ़ाने की क्षमता से किया जाना चाहिए।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 17.9 — इसके बाद पढ़ें कि कौन से आहार 'राजसिक' हैं जो दुःख और रोग देते हैं, ताकि सात्त्विक बनाम राजसिक का स्पष्ट अंतर समझा जा सके।
- 17.10 — अगला पाठ 'तामस' आहार के बारे में है जो शरीर और मन को मंद करता है; यह चक्र को पूरा करने हेतु आवश्यक है।
- 3.13 — यह पद भी भोजन की शुद्धि के महत्व पर प्रकाश डालता है, जहां कहा गया है कि यज्ञ-उपवास और संतुलित आहार से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
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