भगवद्गीता 17.9

Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 17.9 — "कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति उष्ण, तीक्ष्ण (तीखे, मिर्च युक्त), रूखे. दाहकारक, दु:ख, शोक और रोग उत्पन"
भगवद्गीता 17.9 — Shraddhatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः | आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ||१७-९||

लिप्यंतरण

kaṭvamlalavaṇātyuṣṇatīkṣṇarūkṣavidāhinaḥ . āhārā rājasasyeṣṭā duḥkhaśokāmayapradāḥ ||17-9||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मानव की आस्था और उसके भोजन का गहरा संबंध होता है। राजसिक स्वभाव के लोग ऐसे खाद्य पदार्थों को प्रिय करते हैं जो कड़वे, खट्टे, लवणीय, अत्यधिक तैलीय या गर्म होते हैं तथा जिन्हें खाने से शरीर में जलन और दुख होता है। यह गीता का मूल सिद्धांत है कि हमारा भोजन न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि मन की स्थिति (सत्त्व, रजस या तम) को भी निर्धारित करता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक गीता के 'सांख्य' दर्शन और 'गुणात्मक सिद्धांत' (Three Gunas) पर आधारित है जो बताते हैं कि भोजन, कर्म और आस्था तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह उपदेश विशेष रूप से 'कर्मा योग' के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि कैसे शारीरिक अभ्यास (आहार) हमारे मानसिक ध्यान और कर्म की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जिससे आत्म-शुद्धि संभव होती है।

शब्दार्थ
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः those that are bitter, sour saline, excessively hot, pungent, dry and burning, आहाराः foods, राजसस्य of the Rajasic, इष्टाः are liked, दुःखशोकामयप्रदाः are productive of pain, grief and disease
पारंपरिक भाष्य
Excessively This alification should be taken to apply to each of the seven alities -- thus, excessively saline, and so on. Food of a passionate nature produces restlessness in the mind, evil thoughts, excitement, craving now for one thing and then for another, pain, trouble and disease. The Rajasic man always plans to prepare various kinds of preparations to satisfy his palate. He takes salt, chillies, mustard, cloves, condiments, pungent pickles, etc., in excess. Tears flow from his eyes and water dribbles from his nose and yet he will not leave the hot and pungent articles. The palate remains unsatisfied until the stomach is completely filled with pungent things, till the tongue is burnt with chillies. Ladysfinger? Puri? Kachori, pungent condiments, meat, fish, eggs, sweets, potato, fried bread, curd, brinjal, carrots, blackgram, onions, garlic, lemon? Masur, tea, coffee, betels, tobacco are Rajasic artciles of food.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर स्थित है, जहाँ अर्जुन ने अपने भाइयों और गुरूओं को मारने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें संघर्ष का बोझ महसूस हो रहा था। भगवान श्रीकृष्ण धर्म के मार्ग पर चलने के लिए अर्जुन को प्रेरित करते हुए, उनके मन की अवस्था (राजसिक) और उसका संबंध आहार से समझा रहे हैं। यह वार्तालाप तब हो रहा है जब अर्जुन का संदेह दूर करने के लिए कृष्ण उन्हें गुणाओं (गुणों) और भक्ति की विस्तृत व्याख्या कर रहे थे, जो इस अध्याय में 'श्रद्धात्रय विशभायोग' शीर्षक से आगे बढ़ती है।

आज के जीवन में

आज के व्यस्त जीवन में कई लोग तनाव या थकावट को कम करने के लिए अत्यधिक नमकीन, मिर्च युक्त या बहुत तेज़ खाने (जैसे स्प्राइट्स, पकौड़ियाँ) पर निर्भर हो जाते हैं। यदि आप किसी कठिन कार्य या प्रोजेक्ट की तैयारी कर रहे हैं और बार-बार ऐसे 'फास्ट फूड' या तीखे भोजन से अपनी ऊर्जा बढ़ाने का प्रयास करते हैं, तो यह आपको अस्थायी रूप में सक्रिय जरूर करता है लेकिन बाद में चिंता (anxiety), पेट खराब होने और मानसिक थकान दे सकता है। सही जीवनशैली के लिए हमें ऐसे भोजन को चुनना चाहिए जो हमारी कर्मक्षमता बनाए रखे न कि मन को अशांत करके निर्णय लेने की क्षमता कम करे।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो अगर तुम्हें बहुत मीठे और स्वस्थ आइस्क्रीम के साथ-साथ कुछ ऐसा खाना मिलता जो मुंह में जलन कर दे, तो तुम उसे पसंद करोगे? राजसी (जोश वाले) लोग ऐसे भोजनों को पसंद करते हैं जिससे उन्हें तुरंत मज़ा या ताकत महसूस होती है, जैसे बहुत नमकीन चिप्स या मिर्च वाली चीज़ें। लेकिन अगर तुम्हारा मन और शरीर थका हुआ हो या घबराया हुआ हो, तो ऐसा खाना बस आपको और ज्यादा उदास या बीमार कर देता है। कृष्ण कहते हैं कि हमें ऐसे भोजन को चुनना चाहिए जो हमारे लिए शांति लाए न कि तनाव।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, क्या आपने कभी notice किया है कि जब हम तीखे, खट्टे या बहुत मसालेदार भोजन करते हैं तो मन में अचानक चिंता और उलझन क्यों बढ़ जाती है? श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक हमें बताता है कि ऐसे 'राजसिक' आहार दुःख, शोक और रोग के मूल कारण बन सकते हैं। आज से प्रयास करें कि आपका भोजन न तो अत्यधिक कड़वा हो और न ही बहुत अधिक तैलीय या तीखा, बल्कि वह संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक हो जो आपके शरीर को हल्का और मन को स्थिर रखे। जब हम अपने आहार में सत्व (पवित्रता) की ओर झुकते हैं, तो जीवन के सुख-दुःख का अनुभव भी अत्यंत शांतिपूर्वक होने लगता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के भोजन को चुनते समय, अपनी भावनाओं और शरीर की आवश्यकताओं पर ध्यान दें। क्या यह खाना आपको ऊर्जा दे रहा है या तनाव और असंतोष? एक क्षण रुककर सोचें कि आप जो खा रहे हैं वह आपके चित्त को शांति प्रदान करेगा या विकार उत्पन्न, इस विचार से ही आहार का पवित्रकरण हो जाता है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. राजसिक आहार की प्रकृति और परिणाम
    इस श्लोक में भगवान कृष्ण उन खाद्य पदार्थों का वर्णन कर रहे हैं जो तीखे, खट्टे, अत्यंत लवणीय या बहुत गर्म होते हैं। ऐसे आहार राजसिक प्रकृति वाले व्यक्तियों को प्रिय लगते हैं लेकिन वे शारीरिक और मानसिक रूप से दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करते हैं।
  2. आहाराश्रित मन की स्थिति
    गुणों के अनुसार आहार का चयन हमारे अंतर्मन को सीधे प्रभावित करता है; राजसिक भोजन मन में तामसी या राजसी गतिविधि बढ़ाता है। यह श्लोक सिखाता है कि जो खान-पान व्यक्ति की बुद्धि और आत्मज्ञान के विकास में बाधा बनता है, वह वास्तव में हमारे लिए हितकर नहीं है।
  3. संतुलन का महत्व (त्रिविध भोज्य)
    यह श्लोक गीता के 'त्रिविध आहार' सिद्धांत का हिस्सा है, जो बताता है कि सत्त्वगुणी, राजोगुणी और तमोगुणी लोगों की प्राथमिकताएं अलग-अलग होती हैं। हमें अपने वर्तमान गुणों को पहचानकर ऐसे आहार की ओर बढ़ना चाहिए जो हमारी प्रकृति को शुद्धि दें न कि विकृत करें।

विषय

आहार और मन का संबंध (Diet and Mind)राजसिक गुण की प्रकृति (Nature of Rajas Guna)स्वास्थ्य और आस्था (Health and Faith)तनाव प्रबंधन (Stress Management)धर्म योग में भूमिका (Role in Dharma Yoga)आत्म-शुद्धि की विधि (Method of Self-Purification)

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आगे पढ़ें

  1. 17.8 — इस श्लोक से पहले पढ़ें, जो सत्त्वगुणी (पवित्र) आहार का वर्णन करता है ताकि विरोधाभास स्पष्ट हो।
  2. 17.10 — इस श्लोक के बाद पढ़ें, जो तमोगुणी (अंधकार) आहार का वर्णन करता है और तीन प्रकारों की पूर्णावस्था दिखाता है।
  3. 17.6 — यह श्लोक भोज्य, बलि और दान के सामान्य सिद्धांत को स्थापित करता है जिसके आधार पर ये तीन वर्गीकरण किए गए हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या राजसिक भोजन हमेशा बुरा माना जाता है?
राजसिक भोजन को 'बुरा' नहीं कहा गया, लेकिन इसे अस्थायी ऊर्जा देने वाला और बाद में तनाव उत्पन्न करने वाला बताया गया है। यह उन लोगों के लिए उपयुक्त हो सकता है जिन्हें तात्कालिक शारीरिक या मानसिक परिश्रम की आवश्यकता होती है, परन्तु दीर्घकालिक शांति और स्वास्थ्य के लिए इसे सीमित करना चाहिए।
यह श्लोक सिर्फ भोजन के बारे में क्यों बता रहा है?
गुरु कृष्ण यह समझाते हैं कि हमारा बाहरी आहार (भोजन) सीधे हमारे भीतरी मन की स्थिति को प्रभावित करता है। यदि आपका मन राजसिक या तामसिक हो, तो उस भेष में ही आपको शांति और उच्च ज्ञान नहीं मिल सकता; इसलिए शारीरिक शुद्धि मानसिक शुद्धि का आधार है।
राजसिक व्यक्ति के लिए कौन सा आहार सबसे अच्छा होता है?
यदि कोई व्यक्ति राजसिक स्वभाव से ग्रस्त है, तो उसे धीरे-धीरे सत्त्विक भोजन (ताजा, हल्का और पकाने योग्य) की ओर झुकना चाहिए। गीता के अनुसार, सबसे उत्तम आहार वह होता है जो जीवन को बढ़ाए, बुद्धि को स्थिर करे और शरीर में बल प्रदान करे बिना किसी ज्वलन या तनाव के।
क्या यह सिर्फ भौतिक स्वास्थ्य पर लागू होता है?
नहीं, इसका विस्तार मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य तक भी जाता है। गीता का कहना है कि तीक्ष्ण या कड़वे भोजन से मन में क्रोध, घृणा और दुख पैदा होता है जो हमारे ध्यान (dhyana) को बांट देते हैं और मोक्ष के मार्ग में अड़चनें खड़ी करते हैं।
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