भगवद्गीता 17.6

Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 17.6 — "और शरीरस्थ भूतसमुदाय को तथा मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करने वाले अर्थात् कष्ट पहुँचाने वाले जो अविवेकी"
भगवद्गीता 17.6 — Shraddhatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः | मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ||१७-६||

लिप्यंतरण

karṣayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetasaḥ . māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tānviddhyāsuraniścayān ||17-6||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो लोग अपने शरीर और उसमें निवास करने वाले जीवों (भूत) को, तथा स्वयं ईश्वर को भी कष्ट देकर या तंग करके जीवन बिताते हैं, वे अविवेकी मानी जाती हैं। यह आत्म-निर्देशन है कि जब हम अपने शरीर और अंतर्मन की स्थिति का ध्यान रखने के बजाय उसे नुकसान पहुंचाते हैं, तो वह 'आसुरी' या पशुवत् स्वभाव वाला माना जाता है। कृष्ण स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि देह को दुख देना और ईश्वर का अस्तित्वात्मक स्वरूप भूल जाना आध्यात्मिक गलती की निशानी है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक संख्य दर्शन (Sankhya) और कर्म योग (Karma Yoga) की अवधारणाओं को जोड़ता है, जहाँ देह और आत्मा के बीच अंतर समझना आवश्यक माना गया है। यह 'आसुरी' स्वभाव का वर्णन करता है, जो तामसिक गुणों से जुड़ा है और व्यक्ति को ईश्वर-साक्षात्कार (Brahman) से विमुख कर देता है। इसका मुख्य उद्देश्य बताना है कि कर्म योग केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का संतुलन भी उसकी अनिवार्य हिस्सा है।

शब्दार्थ
कर्षयन्तः torturing, शरीरस्थम् dwelling in the body, भूतग्रामम् all the elements, अचेतसः senseless, माम् Me, च and, एव even, अन्तःशरीरस्थम् who dwells in the body within, तान् them, विद्धि know, आसुरनिश्चयान् to be of demoniac resolves
पारंपरिक भाष्य
Bhutagramam The aggregate of all the elements composing the body. Elements Organs. Mam Me Vaasudeva, the witness of their thoughts and deeds. He who thus tortures Me disregards My teachings entirely. Achetasah Senseless, unintelligent, having no discrimination.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर द्रोणपुत्री भीम और अर्जुन की संवाद में आता है, जहाँ श्री कृष्ण रथ चालक हैं। इससे ठीक पहले अध्याय 17 का श्लोकों का सिलसिला 'श्रद्धात्रय विभाग योग' के रूप में शुरू हुआ था, जो भक्ति और विश्वास की तीन प्रकृतियों (सात्विक, राजसिक, तामस) पर चर्चा करता है। अर्जुन युद्धभूमि में संदेह और वैराग्य से जूझ रहे थे, और कृष्ण उन्हें यह समझा रहा हैं कि केवल शारीरिक यांत्रिकता नहीं बल्कि आंतरिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है; जो लोग अपने अस्तित्व को नष्ट करते हैं, वे सच्चे धर्म का पालन नहीं कर रहे।

आज के जीवन में

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जब कोई व्यक्ति डिप्रेशन या अत्यधिक तनाव (stress) के कारण अपनी नींद को त्याग देता है, अनियमित खाना खाता है और लगातार खुद पर चिल्लाकर अपने मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है, वह कृष्ण द्वारा बताई गई 'कर्षयन्तः' (कष्ट देने वालों) की श्रेणी में आता है। इस स्थिति में व्यक्ति केवल काम या सफलता का पीछा करते हुए अपना अंतर्मन और ईश्वर को भूल जाता है, जो दीर्घकालिक जीवन में गहरा दुख ला सकता है। वास्तविक समाधान यह नहीं कि हम शरीर को पूरी तरह त्याग दें, बल्कि इसे एक मंदिर की तरह देखकर उसकी देखभाल करें और अंतर्मन के साथ जुड़े रहें ताकि वह 'आसुरी' स्थिति से बाहर निकल सके।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे अगर कोई बच्चा अपनी खुद की नाव (शरीर) में पानी भरने के लिए छेद कर दे, तो वह डूब जाएगा और उसे बहुत तकलीफ होगी। ठीक उसी तरह, जब लोग अपने शरीर को खराब पोषण या नकारात्मक विचारों से दुख देते हैं, वे अपनी आत्मा की भी हानि करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि जो इस तरह दूसरों और खुद को तंग करके रहता है, वह समझदार नहीं माना जाता, बल्कि उसे 'आसुरी' स्वभाव वाला कहा गया है क्योंकि उसने अच्छे रास्से को भूल दिया है।

दैनिक चिंतन

आपने कभी सोचा है कि अपने शरीर या मन के प्रति कठोरता करना अहंकार की एक रूप क्या हो सकता है? जब हम खुद को या दूसरों पर अन्याय करते हैं, तो यह आत्म-विनाश का मार्ग बन जाता है। श्रीकृष्ण आपको यह बताने के लिए कह रहे हैं कि ऐसे कष्ट देने वाले विचार और व्यवहार 'आसुरी' प्रकृति की निश्चितता (निस्चय) से जुड़े होते हैं, न कि दिव्य संवेदना से। आज अपनी दयालुता को चुनने का समय है ताकि आप अपने भीतर के ईश्वर को कष्ट नहीं पहुंचा सकें।

आज के लिए एक अभ्यास

इस श्लोक को ध्यान में रखते हुए, अपने अहंकार और शरीर के प्रति कठोरता की जाँच करें। जो चीजें आपको या अन्य जीवों को नुकसान पहुँचा रही हैं, उन पर विराग भाव से विचार करके स्वयं को दयालु होने का संकल्प लें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. आत्म-कल्याण की अनिवार्यता
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि अपने शरीर या मन का दुर्व्यवहार करना अज्ञान और आसुरी प्रकृति का लक्षण है। सच्चा धर्म वह नहीं जो हमें कष्ट दे, बल्कि वह है जो जीवों की रक्षा और उन्नति करे।
  2. अंत्यामी ईश्वर के प्रति सम्मान
    कृष्ण स्वयं शरीर में रहने वाले अंतर्यामी हैं; इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना या अपने आप पर अन्याय करना, मूल रूप से भगवान का अपमान है। हमें हर प्राणी के जीवन में निवास करने वाले ईश्वर की पहचान करनी चाहिए।
  3. आसुरी संकल्प का परिणाम
    'आसुरिनिश्चय' (दुष्ट निश्चय) से तात्पर्य है कि जो लोग दुर्गुणों में बंधे होते हैं, वे कठोरता को ही सत्य मान लेते हैं। यह विवेकहीन व्यवहार व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति का सबसे बड़ा बाधा बनकर खड़ा होता है।

विषय

शरीर और आत्मा का संबंधआसुरी स्वभाव की पहचानअंतर्मन की देखभालतमोगुण के प्रभावध्यान योग और स्वास्थ्यईश्वर में विश्वास

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आगे पढ़ें

  1. 17.3 — इस श्लोक का सीधा परिचय है जो बताता है कि कैसे 'श्रद्धा' (विश्वास) तीन प्रकृति की होती है और यह आसुरी व्यवहारों से जुड़ी है।
  2. 16.4 — यह श्लोक आसुरी गुणों, जैसे अंहकार, अभिमान और क्रोध का विस्तृत वर्णन करता है जो इस प्रकरण में चर्चा किए गए कष्ट देने वाले व्यवहार की जड़ हैं।
  3. 16.24 — अंत में, यह श्लोक आपको मार्गदर्शन देता है कि शास्त्रों के अनुसार चलकर कैसे आसुरी प्रवृत्तियों से बचकर दिव्य जीवन जीया जाए।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कृष्ण 'आसुरनिश्चय' (demoniac resolves) से क्या समझाते हैं?
'आसुरनिश्चय' का अर्थ है वह दृढ़ निश्चय या प्रकृति जो स्वयं को और दूसरों, विशेषकर शरीर और ईश्वर के प्रति अन्यायी व्यवहार करने की ओर ले जाती है। यह नकारात्मक विचारों, हिंसा और अहंकार से जुड़ा होता है जहाँ व्यक्ति अपने आंतरिक शांति और बाह्य सृष्टि को नुकसान पहुंचाने में विश्वास रखता है।
इस श्लोक के अनुसार हमें अपनी देह (शरीर) से कैसे व्यवहार करना चाहिए?
कृष्ण का संदेश यह है कि हमें अपने शरीर को 'भूतग्राम' या जीवों की मंडली मानकर उसकी देखभाल करनी चाहिए, न कि उसे कष्ट देने के लिए उपयोग करना। देह एक साधन है आत्म-साक्षात्कार और सेवा के लिए, इसलिए इसे दुख नहीं दिया जाना चाहिए बल्कि इसका संतुलित पालन किया जाना चाहिए।
'अन्तःशरीरस्थं' (dwells within the body) शब्द का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
यह शब्द यह दर्शाता है कि ईश्वर या परमात्मा हर जीव के अंदर, उसके हृदय में निवास करते हैं और सब कुछ देख रहे होते हैं। जब हम अपने शरीर को तंग करते हैं, तो वास्तव में हम उसी ईश्वर का अपमान कर रहे होते हैं जो हमारे भीतर विद्यमान है, इसलिए यह एक गंभीर आध्यात्मिक पाप माना जाता है।
क्या शारीरिक कष्ट (torture of the body) और अंतर्मन का दुख देना अलग-अलग हैं?
इस श्लोक में दोनों को एक साथ जोड़ा गया है क्योंकि शरीर के दुख देने से सीधे प्रभावित होने वाले 'भूतग्राम' (मूल तत्व) और उसमें निवास करने वाली आत्मा/ईश्वर पर भी वही असर पड़ता है। जब हम शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से खुद को या दूसरों को दुख देते हैं, तो यह 'अचेतसः' (बेवकूफ) व्यवहार की ओर ले जाता है जो आध्यात्मिक विकास में बाधा बनता है।
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