भगवद्गीता 17.5
Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः | दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ||१७-५||
aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ . dambhāhaṃkārasaṃyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ ||17-5||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे तपस्या (कठोर अनुशासन) जो शास्त्रों के नियमों का पालन किए बिना की जाती है, वह हानिकारक होती है। जब कोई व्यक्ति दम्भ, अहंकार, काम और राग जैसे पाखंडी भावों से प्रेरित होकर कठोर तप करता है, तो उसे वास्तव में आत्म-निर्माण नहीं मिलता। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि भक्ति या अनुशासन केवल बाहरी दिखावे और अपनी इच्छाओं को पूरा करने की भावना से किया जाना चाहिए, न कि शास्त्रों द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलकर।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक कर्म योग और भक्ति योग की गहराई से जुड़ा है, जो दर्शाता है कि कार्य का गुण (सत्व) उसकी नीयत पर निर्भर करता है। यह ज्ञान योग के सिद्धांतों को भी प्रभावित करता है क्योंकि अहंकार और दम्भ सत्य की बाधा हैं; यदि तपस्या में 'मैं' भाव नहीं मिटता, तो वह मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार तक ले जाने वाला मार्ग नहीं बन पाती।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जहाँ वे पांचवें अध्याय से 'श्रद्धान्त्रय विभाग योग' का वर्णन कर रहे हैं। इस समय तक कृष्ण ने अर्जुन को धर्म और कार्य के महत्व समझाए थे, लेकिन अब वे भक्ति की प्रकृति पर चर्चा कर रहे हैं कि कैसे सही विश्वास (श्रद्धा) का होना आवश्यक है। अर्जुन युद्ध में संभ्रांत भावों से घिरा हुआ था, और कृष्ण उसे यह समझाने के लिए कहते हैं कि तपस्या की नीयत साफ़ नहीं तो वह फलदायी नहीं होगी।
आज के जीवन में
आजकल कई लोग सोशल मीडिया पर अपनी 'दुर्बिन्ता' या स्वास्थ्य रूटीन को दिखाकर प्रशंसा पाने के लिए कठोर तप करते हैं, लेकिन अंदर से वे घमंडी होते हैं और सिर्फ अपने शरीर की सुविधा के लिए यह कर रहे हैं। यदि आप किसी नौकरी में उतनी मेहनत नहीं कर पाते जितना कि आपको करना चाहिए क्योंकि आपका मन 'राग' (लगाव) या 'अहंकार' से भरा है, तो वह काम सफलता की ओर नहीं ले जाएगा बल्कि तनाव बढ़ाएगा। इस श्लोक का उपयोग यह समझने के लिए करें कि जब भी कोई कठोर निर्णय लें या नई आदत डालें, तो पूछें: 'क्या मैं इसे किसी और को दिखाने के लिए कर रहा हूँ या वास्तव में सुधार के लिए?'
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे अगर कोई बच्चा बिना शिक्षक के बताए किसी मजेदार खेल का नियम तोड़कर खुद बना ले और उसे 'अच्छा' समझे, तो वह शायद अपने आप को चोट पहुँचा दे। कृष्ण कहते हैं कि जब हम कुछ बहुत मुश्किल काम करते हैं (जैसे तपस्या), लेकिन सिर्फ दूसरों की प्रशंसा पाने या अपना मन बहलाने के लिए, तो वह सही नहीं है। असली अच्छाई तब होती है जब हम वही करें जो स्कूल में शिक्षकों ने हमें बताया हो और बिना घमंड के किया जाए।
दैनिक चिंतन
क्या आप कभी ऐसा महसूस करते हैं कि आपके कठोर प्रयास वास्तव में केवल दूसरों की तारीफ पाने या अपनी शक्ति दिखाने का साधन बन गए हैं? भगवान श्रीकृष्ण आज हमें बताते हैं कि जब तप दम्भ, अहंकार और राग से युक्त हो जाता है, तो वह वास्तव में घोर दुःखदायी सिद्ध होता है। सच्ची आध्यात्मिकता का मार्ग केवल बाहरी कठिनाइयों को सहने से नहीं, बल्कि मन की शुद्धि और नम्रता से गुजरकर चलता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने तप और साधना के मूल उद्देश्य पर गौर करें कि क्या वह ईश्वर की प्रसन्नता हेतु है या केवल अहंकार को सुख देने के लिए? जब भी मन में घमंड या फल की कामना आए, तो शास्त्रों द्वारा निर्धारित मार्ग का अनुसरण करने वाली विनम्रता को अपनाएं।
मुख्य शिक्षाएँ
- शास्त्र-विहित तप का महत्व
तपस्या वह कठोर साधना नहीं होनी चाहिए जो शास्त्रों के सिद्धांतों और विधि से बाहर हो। जब किसी आचरण की स्थापना वैदिक या धर्मग्रंथों में न हो, तो उसका परिणाम सुखदायी नहीं बल्कि क्लेशकारी होता है। - अहंकार और दम्भ का विघ्न
जब तप करने वाले के मन में 'मैं' की भावना (दम्भा) और अहंकार प्रवेश कर जाता है, तो वह साधना पावन नहीं रह जाती। यह आत्म-केंद्रित होने से कर्म का स्वरूप बदलकर एक प्रकार का मानसिक बंधन बन जाता है। - इंद्रियों और काम के वश में होना
यदि तपस्या को काम (कामनाएं) और राग (आसक्ति) द्वारा प्रेरित किया जाए, तो वह वास्तविक उद्देश्य से विचलित हो जाती है। ऐसी साधना अंततः व्यक्ति को भौतिक सुख या फूलने की इच्छा में ही बांधे रखती है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग के मूल सिद्धांतों को स्पष्ट करता है कि कैसे फल की कामना किए बिना कर्तव्य पालन करें, जो इस वचन में वर्णित अहंकार का समाधान है।
- 3.27 — इस श्लोक में प्रकृति और गुणों की भूमिका समझाई गई है, जो यह स्पष्ट करती है कि अहंकार केवल मन का विकार क्यों होता है।
- 17.4 — यह श्लोक त्रिगुणात्मक आस्था (विश्वास) की तीन भावनाओं को परिभाषित करता है और बताता है कि कैसे दम्भी लोग भगवान में अस्थिर विश्वास रखते हैं।
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