भगवद्गीता 17.4

Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 17.4 — "सात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं और राजस लोग यक्ष और राक्षसों को, तथा अन्य तामसी जन प्रेत और भूत"
भगवद्गीता 17.4 — Shraddhatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः | प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ||१७-४||

लिप्यंतरण

yajante sāttvikā devānyakṣarakṣāṃsi rājasāḥ . pretānbhūtagaṇāṃścānye yajante tāmasā janāḥ ||17-4||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मनुष्य की श्रद्धा (विश्वास) के तीन प्रकार होते हैं: सात्विक, राजस और तामस। जो लोग शुद्ध मन से देवताओं की पूजा करते हैं वे सात्त्विक कहलाते हैं, जिनमें वासना अधिक होती है वे यक्ष-राक्षसों को पूजते हैं (राजस), और अज्ञानी व्यक्ति भूत-प्रेतों में विश्वास करके उनकी उपासना करते हैं (तामस)। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि हमारा आचरण और पूजा उसी स्तर की होती है जो हमारे भीतर के गुणों पर निर्भर करता है, न कि बाहरी रस्मों पर।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगवद् गीता के 'सामंजस्य' (स्वरूप) का भाग है जो कर्म योग और उपनिषदों की आत्म-विज्ञान की अवधारणाओं को विकसित करता है। यह सिद्धांत बताता है कि बाहरी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान तभी फलदायी होते हैं जब वे 'सात्विक' गुणों (पurity, clarity) से जुड़े हों, जो मूलतः ब्रह्मान के प्रति एक सकारात्मक और शुद्ध दृष्टि को दर्शाते हैं। यह कर्म योग की बुनियाद पर खड़ा है कि हमारा आचरण अंतर्निहित चेतना (सत्त्व, रजस, तम) द्वारा निर्धारित होता है।

शब्दार्थ
यजन्ते worship, सात्त्विकाः the Sattvic or pure men, देवान् the gods, यक्षरक्षांसि the Yakshas and the Rakshasas, राजसाः the Rajasic or the passionate, प्रेतान् ghosts, भूतगणान् the hosts of Bhutas or the naturespirits, च and, अन्ये the others, यजन्ते worship, तामसाः the Tamasic, जनाः people
पारंपरिक भाष्य
Lord Krishna, after defining faith, tells Arjuna how this faith determines the object of worship. The nature of the faith (whether it is Sattvic? Rajasic or Tamasic) has to be inferred from its characteristic effects, viz., the worship of the gods and the like. Each man selects his object of worship according to the ruling Guna of his being. The expression of a mans faith depends on the Guna that is predominant in him. A Sattvic man will give his faith the Sattvic expression, a Rajasic man the Rajasic expression and a Tamasic man the Tamasic expression. Sattvic persons or people with Sattvic faith who are devoted to the worship of the gods, are rare in this world. Yakshas are the brothers of Kubera, the lord of wealth gnomes, the spirits that guard wealth. Rakshasas Beings of strength and power such as Nairrita demons giants gifted with illusive powers. Bhutas Ghosts.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध की तैयारी में कुरुक्षेत्र मैदान पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई उपदेशावली का हिस्सा है, जहाँ 'श्रद्धारत्रय विभाग योग' (विश्वास के तीन प्रकार) का वर्णन किया जा रहा है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने भोज्य आहार और यज्ञ की प्रकृति पर चर्चा पूरी की थी, अब वे श्रद्धा के स्वरूप को समझा रहे हैं क्योंकि अर्जुन युद्ध से विमुख होकर गहरे द्वंद्व में थे। इस संदर्भ में कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि एक योद्धा का मन कैसे सकारात्मक और सात्विक बनना चाहिए ताकि वह अपने धर्म के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो सके, न कि भूत-प्रेत या अज्ञानता में फंसा रहे।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक कठिन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं और आपको असफलता का डर है; तामसिक दृष्टि से आप शायद सौभाग्य या किसी बाहरी ताकत के चरणों में मदद मांगेंगे (यक्ष-राक्षस/भूत प्रेत जैसा), जबकि राजसिक दृष्टि से आप सिर्फ नतीजे की लालच में काम करेंगे। सात्विक दृष्टि अपनाकर, आप अपने कर्तव्य पर ध्यान केन्द्रित करके ईमानदारी और समझदारी (देवता/उच्च तत्त्व) के साथ कार्य करेंगे, जो दीर्घकालिक सफलता देती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि जब भी कोई मुसीबत हो, तो हमारा विश्वास किस पर आधारित है—डर और अज्ञानता पर नहीं, बल्कि उच्च मूल्यों और नैतिकता पर।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए जैसे अगर आप बहुत खुश हैं तो आपके पास अच्छे खाना और खेलना होता है, लेकिन अगर आप डरे हुए या गुस्से में होंगे तो आपको अजीब चीजें पसंद आ सकती हैं। कृष्ण भगवान कहते हैं कि हमारे मन के अनुसार ही पूजा होती है: जो लोग अच्छे और शांत होते हैं वे देवताओं को मानते हैं, जो बहुत घबराने वाले या गुस्से वाले होंगे वे डरावनी चीजों की तरफ आकर्षित होते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने मन को साफ-सुथरा और अच्छा बनाएं ताकि हम सही रास्तें चुन सकें।

दैनिक चिंतन

आज जब आप किसी ईश्वर को संप्रेषित करते हैं या पूजा-पाठ कर रहे होते हैं, तो स्वयं से यह विचार करें कि वह क्या दर्शाता है। यदि आपके पास सात्त्विक आस्था है, तो आप प्रेम और ज्ञान के माध्यम से दिव्य शक्तियों को पहचानेंगे; लेकिन यदि मन में राजस या तामस गुण अधिक हैं, तो आपको कभी-कभी भ्रष्ट उद्देश्यों की ओर धकेलने वाला अनुभव हो सकता है। यह अवसर आपके लिए एक दर्पण है जो आपकी आंतरिक शुद्धता को परखता है और बताता है कि आप किस दिशा में बढ़ रहे हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के साधना में, अपने मन की स्थिति का विचार करें कि आपकी आस्था किस गुण से प्रेरित है। स्वयं से पूछें: क्या मेरा भक्ति-मार्ग देवताओं जैसे उच्च सत्त्विक मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है या तामसिक अंधविश्वासों में फंस रहा है? इस विचार के साथ शांत बैठकर, अपने भीतर की शुद्ध आस्था का विकास करने की प्रार्थना करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. आस्था का स्वरूप कर्म की ओर निर्देशित करता है
    कृष्ण जी स्पष्ट करते हैं कि हम जो भी पूजा-अर्चना या अनुष्ठान करते हैं, वह सीधे हमारे मन के गुणीय (सात्त्विक, राजस, तामस) स्वभाव पर निर्भर करता है। यह सिद्धांत बताता है कि बाहरी रूप से एक ही कार्य अलग-अलग आंतरिक भावनाओं में पूरी तरह भिन्न हो सकता है।
  2. देवतानुगृहीत पूजा और पितरों की उपासना का विभाजन
    सात्त्विक व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं जो सत्य और ज्ञान के प्रतीक हैं, जबकि तामसी लोग अंधविश्वास या भूत-प्रेतों में आस्था रखकर उपासना करते हैं। यह विभाजन इस बात का संकेत है कि हमारी आस्था हमें either मोक्ष की ओर ले जाती है या पुनर्जन्म और अधःपतन की ओर धकेलती है।
  3. राजसिक उपासना में अहंकार और शक्ति का लोभ
    राजस लोग यक्षों या राक्षसों को पूजते हैं क्योंकि वे मानव जीवन की सीमाओं के बाहर कुछ प्राप्ति, धन या शक्ति चाहते हैं। यह आस्था कर्म-फल की इच्छा और स्वार्थ से प्रेरित होती है जो अंततः मन को स्थिरता नहीं देती बल्कि अनिश्चितता में रखती है।

विषय

श्रद्धा का स्वरूप (Nature of Faith)त्रिगुण की अवधारणा (Concept of Three Gunas)धर्म और कर्तव्य (Dharma and Duty)मन की शुद्धता (Purity of Mind)भक्ति योग का आधार (Foundation of Bhakti Yoga)अज्ञान बनाम ज्ञान (Ignorance vs Knowledge)

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आगे पढ़ें

  1. 17.3 — इसे पढ़ने से पहले यह समझना आवश्यक है कि 'आस्था' स्वभाव (गुण) के अनुसार कैसे उत्पन्न होती है, जो इस श्लोक की आधारशिला है।
  2. 17.5 — यह अगला श्लोक तामसिक और राजसिक उपासनाओं के दुष्परिणामों और उनका वर्गीकरण करता है, जो 17-4 की व्याख्या को पूर्णता देता है।
  3. 9.26 — यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि सात्त्विक भक्त कृष्ण जी केवल प्रेम और समर्पण की भावना में दिया गया सरल फूल भी स्वीकार करते हैं, जो उच्चतम आस्था का परिचायक है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यश (Yakshas) और राक्षसों की पूजा गीता में क्यों मानी गई?
गीता के संदर्भ में यक्ष और राक्षस ऐसे देवी-देवताओं या प्राणियों को दर्शाते हैं जो शक्तिशाली होते हैं लेकिन नैतिक रूप से उच्च नहीं, अक्सर व्यक्तिगत स्वार्थों की पूजा करते हैं। कृष्ण यह समझा रहे हैं कि राजसी लोग अपनी वासना पूर्ति के लिए ऐसे साधनों या शक्तियों को अपनाते हैं जो उन्हें तुरंत परिणाम दे सकती हैं लेकिन आत्मिक विकास नहीं करतीं।
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