भगवद्गीता 17.10
Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् | उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ||१७-१०||
yātayāmaṃ gatarasaṃ pūti paryuṣitaṃ ca yat . ucchiṣṭamapi cāmedhyaṃ bhojanaṃ tāmasapriyam ||17-10||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि तामसिक (अंधकारमय) स्वभाव वाले लोग भोजन का चयन कैसे करते हैं। वे ऐसे खाने की प्रेरणा लेते हैं जो अधपका हो, बिल्कुल स्वाद-रहित, दुर्गंधित या सड़ा हुआ है। इसमें वह अन्न भी शामिल है जो किसी और के बाकी हुए (उच्छिष्ट) नमक से दूषित हो गया हो। यह श्लोक सिखाता है कि तामसिक प्रकृति वाले व्यक्ति स्वयं को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों में आनंद लेते हैं, जो उनकी मानसिक और शारीरिक विकास में बाधा डालती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भक्ति योग और कर्म योग के संदर्भ में 'प्रकृति की तीन गुणों' (त्रि-गुण: सत्, रज, तम) की अवधारणा को विकसित करता है। यह दर्शाता है कि मानव का आहार चयन सीधे उसके मन और बुद्धि के स्तर पर प्रभाव डालता है, जो मोक्ष या बंधन के मार्ग में निर्णायक भूमिका निभाता है। तामसिक गुणों की ओर रुख करने से अज्ञान (अविद्या) बढ़ती है, जबकि सत्वगुणी आहार विवेक और साधना को सुदृढ़ करता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित है, जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भीषण संघर्ष होने वाला है। इस समय भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं क्योंकि अर्जुन ने युद्ध छोड़ने की विकल्प चुना था और वे उदास थे। पांच अध्यायों में उन्होंने धर्म, आत्मा और कर्म के विस्तृत ज्ञान दिया है, जिसके बाद इस 17वें अध्याय में 'श्रद्धा' (विश्वास) का वर्णन किया जा रहा है। यह श्लोक तब बोला गया जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को तीन प्रकार की श्रद्धा और भोजन के महत्व के बारे में बताते हुए, मानसिक स्थिति पर खाने के प्रभाव का विश्लेषण किया था।
आज के जीवन में
आजकल कई लोग तनाव या अवसाद (depression) में होते हैं जो तेज़ी से और बिना सोचे-समझे अनिष्ट भोजन, जैसे कि बहुत ज्यादा मसालेदार या सड़े हुए खाने को खा लेते हैं। अगर आप काम के दबाव में हों तो यह श्लोक आपको चेतावनी देगा कि अपनी मानसिक शांति बनाए रखने के लिए स्वस्थ और ताज़ा आहार चुनना जरूरी है, न कि दुर्गंधित या बासी खाने को। एक कठिन निर्णय लेते समय भी, यह सिखाता है कि हमें ऐसे विचारों से बचना चाहिए जो 'बासी' या पुरानी और अशुद्ध हैं; बदले में तार्किक और स्पष्ट सोच (सत्वगुणी) अपनाकर आगे बढ़ना चाहिए।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बच्चो, कल्पना कीजिए कि आपके पास एक पकवान (मिठाई या चावल) है जिसका स्वाद बिल्कुल नहीं आ रहा है और वह सड़ने वाला भी लगता है। अगर कोई आपसे पूछे कि क्या आपको यह खाना खाना चाहिए, तो जवाब 'नहीं' होगा, क्योंकि इससे पेट खराब हो जाएगा। श्री कृष्ण कहते हैं कि जो लोग हमेशा ऐसे नुकसानदेह काम करते हैं या बुरी आदतों में लिप्त रहते हैं, वे तामसिक होते हैं। सही और ताजा भोजन ही हमें मजबूत बनाता है, जैसे पढ़ाई के लिए साफ किताब की जरूरत होती है।
दैनिक चिंतन
आज आपने जो भोजन किया, उसमें क्या तामसिक गुण (अलसता या विषाक्तता) थे? कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि बासी या दुर्गंधयुक्त भोजन हमारे सत्त्व को दबा देता है। अपने दिन के आहार का जागरूक होकर मूल्यांकन करें और उसे एक पवित्र समर्पण में बदलें, जो आपको ऊर्जावान बनाए रखे।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने भोजन को एक आध्यात्मिक यज्ञ के रूप में ग्रहण करें। शरीर और मन को पोषक, ताजा और पवित्र अन्न से ही समर्पित करने का संकल्प लें, जो आपको स्पष्टता और प्रकाश दे।
मुख्य शिक्षाएँ
- तामसिक भोजन की पहचान
यह श्लोक तामसिक प्रकृति के लोगों को प्यारा वह खाना बताता है जो बासी, रसरहित या दुर्गंधित हो। ऐसे आहार न तो स्वास्थ्य देते हैं और न ही मन को शांति, बल्कि वे अलसता और मोह की ओर ले जाते हैं। - शरीर का पूजा-स्थान के रूप में सम्मान
देह एक ताम्रपात्र नहीं है जिसे किसी भी अवस्था में डाला जाए, बल्कि यह आत्म-साक्षात्कार का साधन है। इसलिए अमेध्य (अपवित्र) या उच्छिष्ट भोजन से परहेज करना शरीर और मन की पवित्रता बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। - सात्विक आहार का महत्व
इस तामसिक वर्णना के विपरीत, सात्विक भोजन (फल, दूध, अन्न) जीवन को दीर्घायु और तेज प्रदान करता है। यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि जो खाना हम निरर्थक या हानिकारक समझते हैं, वही हमारे धार्मिक विकास में बाधा बन सकता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 17.8 — इस श्लोक के तुरंत बाद (17.8) में भोजन की वास्तविक परिभाषा दी गई है जो सात्विक, राजस और तामसिक गणना को स्पष्ट करती है।
- 3.13 — यह श्लोक बताता है कि कैसे पुण्यात्मा लोग (जो पवित्र भोजन करते हैं) सभी पापों से मुक्त होकर दीर्घायु और प्रसन्न होते हैं।
- 17.16 — यह श्लोक आहार के नियम (आहार-श्रद्धा) का निष्कर्ष निकालता है और बताता है कि कैसे पवित्र भोजन हमारे चित्त को स्थिर करता है।
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