भगवद्गीता 17.11
Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
अफलाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते | यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ||१७-११||
aphalāṅkṣibhiryajño vidhidṛṣṭo ya ijyate . yaṣṭavyameveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ ||17-11||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि भक्ति और यज्ञ का सबसे पवित्र रूप वह है जब कोई कार्य फल की आशा के बिना, केवल अपने धर्म या कर्तव्य के निर्वहन के लिए किया जाए। इस श्लोक में 'सात्त्विक' (पवित्र) कर्म को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि यदि मन स्थिर हो और यह विचार हो कि 'यह करना मेरा कर्तव्य है', तो वह कार्य सफल होता है चाहे फल कुछ भी मिले। मुख्य शिक्षा यह है कि हमें यज्ञ या किसी भी अच्छे काम को नियमों के अनुसार, निष्काम भाव से और बिना लालच किए करने चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म योग' (Karma Yoga) और 'सात्विक गुणों' के सिद्धांत पर आधारित गीता का एक केंद्रीय उपदेश है, जो ज्ञान की ओर ले जाता है। यह दर्शाता है कि जब कर्त्ता अपने अहंकार को त्यागकर केवल कार्य को धर्म (dharma) और विधि के अनुसार करता है, तो वह संसार से बंधन मुक्त हो जाता है। इसमें 'निष्काम कर्म' का सिद्धांत विकसित किया गया है जहाँ फल की प्रत्याशा छोड़ना ही आत्म-शुद्धि (sattva) की कुंजी है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई शिक्षा का हिस्सा है, जहाँ अर्जुन संकट और निराशा की स्थिति से गुजर रहे थे। इस समय (अध्याय 17) के दौरान, कृष्ण ने 'श्रद्धात्रयी विभाग योग' में बताया कि मानव स्वभाव तीन प्रकार का है: सात्विक, राजसिक और तामसिक। अर्जुन जिस भक्ति या धर्म की भावना से युद्ध करने वाले हैं उसकी शुद्धता को समझने के लिए यह श्लोक महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृष्ण उन्हें बता रहे हैं कि सच्ची आस्था कैसे फल की अपेक्षा के बिना कार्य करती है।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप अपने काम पर एक मुश्किल प्रोजेक्ट संभालते हैं जो आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है और जिसका परिणाम आपको बड़ा पुरस्कार दिला सकता है। यदि आप उस कार्य को केवल इसलिए करते हैं क्योंकि यह कंपनी का नियम है या आपकी जिम्मेदारी (dharma) है, बिना इस चिंता के कि 'क्या मुझे प्रोन्नति मिलेगी?' तो वह कर्म सात्त्विक होगा और आप तनावमुक्त रहेंगे। वास्तव में, आज की दुनिया में जब हम किसी समस्या का समाधान करते हैं या कोई सामाजिक कार्य करते हैं बिना इस सोच के कि लोग क्या कहेंगे या बदलावा क्या मिलेगा, तो वह आंतरिक शांति और सफलता की ओर ले जाता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे जब आप अपने घर की सफाई करते हैं, तो आपको पता होता है कि यह करना आपके कर्तव्य (duty) का हिस्सा है, न कि यह सोचकर कि 'अगर मैंने साफ किया तो मुझे कैश मिलेगा'। भगवान कहते हैं कि जब हम कोई अच्छा काम बिना किसी इनाम की उम्मीद किए और बस इसलिए करते हैं क्योंकि वह सही है, तो वह सबसे पवित्र (सात्त्विक) होता है। जैसे आप अपने दोस्त को मदद कर सकते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे मदद की ज़रूरत है, न कि यह सोचकर कि वह आपको कुछ देगा।
दैनिक चिंतन
क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम किसी कार्य को सिर्फ अपने कर्तव्य के तहत और फल की प्रतीक्षा किए बिना करते हैं, तो वह कार्य कैसे बदल जाता है? जैसे-जैसे मन 'यह मेरा कर्तव्य है' इस संकल्प पर ठहरता है, अकर्तापन का आभास बढ़ता है। आज के दिन जब भी कोई काम पूरा करें, खुद से पूछें कि क्या मैंने उसमें स्वार्थ या फल की लालसा को छोड़ा है? यह सात्त्विक दृष्टि ही आपको कर्मों में बंधे रहकर भी मुक्त होने का मार्ग दिखाती है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के साक्षी भाव में बैठकर अपने मन को स्थिर करें और सोचें कि क्या आप जो कुछ भी कर रहे हैं, उसमें फल की इच्छा नहीं रखते? एक गहरी श्वास लें और मानसिक रूप से दोहरें: 'यह मेरा कर्तव्य है,' बजाय इसके के 'मैं इसे क्यों करता हूं'।
मुख्य शिक्षाएँ
- फल की आकांक्षा का त्याग (Tyaga of Desire for Fruits)
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि यज्ञ या किसी भी कर्म को तब तक सात्त्विक नहीं कहा जा सकता जब तक उसमें फल की इच्छा न हो। जब हम कार्य के परिणाम से मुक्त होते हैं, तो वह कार्य स्वतः पवित्र और पूर्ण बन जाता है। - शास्त्रविधि का अनुपालन (Adherence to Scriptural Rules)
कर्तात्व के बिना कर्म नहीं हो सकता; यह श्लोक बताता है कि कार्य 'शास्त्रविधि' से नियंत्रित और सही विधानों में किया जाना चाहिए। धार्मिक अनुष्ठान या दैनिक कर्तव्य जब शास्त्र की सीमाओं के भीतर होते हैं, तभी वे शुद्ध माने जाते हैं। - कर्त्त्व का निश्चय (Sankalpa of Duty)
'यह मेरा कर्तव्य है' मन की यह दृढ़ता सात्त्विक गुणों में से एक महत्वपूर्ण पहलू है। जब मानसिक समाधान केवल 'कर्तव्य पालन' पर केंद्रित होता है, तो वह व्यक्ति अज्ञान और मोह से मुक्त होकर ईश्वरार्पण की भावना को प्राप्त करता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मफल की चिंका न करने के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करता है जो इस अध्याय में वर्णित सात्त्विक यज्ञ का आधार है।
- 3.9 — इसमें कर्म योग और यज्ञ की अवधारणा पर चर्चा है कि कैसे कर्मों को बंधन से मुक्त किया जाए, जो 17वें अध्याय के विषय का सारांश देता है।
- 9.27 — यह श्लोक बताता है कि यदि आप अपने सभी कर्मों को भगवान की अर्पित करें, तो वह कैसे सात्त्विक और पवित्र बन जाता है।
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