भगवद्गीता 17.12
Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् | इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ||१७-१२||
abhisandhāya tu phalaṃ dambhārthamapi caiva yat . ijyate bharataśreṣṭha taṃ yajñaṃ viddhi rājasam ||17-12||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि यदि कोई यज्ञ, पूजा या किसी भी कार्य को केवल दूसरों की प्रशंसा पाने (दम्भ) और स्वार्थी फल की आकांक्षा रखकर किया जाता है, तो वह 'राजस' स्वरूप का होता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ईर्ष्या या अहंकार से किए गए कर्म भगवान को प्रिय नहीं हैं। इसमें कृष्ण ने सच्ची निष्काम भावना की महत्ता पर जोर दिया है, न कि दिखावे के लिए किए जाने वाले धार्मिक कार्यों की।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्मा योग' और 'गुण-त्रिवृत् सिद्धांत' (सत्व, रज, तम) के अंतर्गत आता है जो भक्ति और कर्म की शुद्धि को दर्शाता है। यह उपदेश 'राजोगुण' का विश्लेषण करता है, जहाँ कार्य करने वाला व्यक्ति स्वयं से जुड़ा हुआ (अहंकार) होता है और फल की लालसा रखता है। इससे कर्मयोग के मूल सिद्धांत पर जोर दिया जाता है कि कार्य करना चाहिए लेकिन 'फल' की चिंशा नहीं करनी चाहिए, जैसा कि अध्याय 2 में भी कहा गया था।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित होता है, जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भीषण संघर्ष होने वाला था। इस समय भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को धर्म की निस्वार्थ भावना समझा रहे हैं, जो युद्ध से पहले उनके मन में उत्पन्न हुए वैराग्य और दुविधा का समाधान कर रहा है। कुरुक्षेत्र के इस संघर्ष में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि भक्ति या यज्ञों की शुद्धि कैसे हो सकती है, ताकि वे युद्ध में अपनी कर्तव्यपालना (धर्म) का सही मार्ग अपना सकें।
आज के जीवन में
आज के समय में कई लोग सोशल मीडिया पर फोटो खींचकर 'लोकसेवा' या धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य लाइक्स और कमेंट्स प्राप्त करना होता है। यदि आप किसी बड़ी कंपनी में काम कर रहे हैं और अपने प्रोजेक्ट को सिर्फ इसलिए पूरा नहीं करते कि आपको 'बॉस के आगे' अच्छा दिखना हो, तो वह कार्य राजसिक माना जाएगा। वास्तविक सफलता तभी मिलती है जब आप अपने कर्तव्य को निष्काम भाव से, बिना किसी दिखावे या व्यक्तिगत लाभ की चिंता किए पूरा करते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जानते हो अर्जुन? जब हम कोई अच्छा काम करते हैं तो क्या हमें दूसरे सब देख रहे होंगे और तालियां बजाएंगे, यह सोचना चाहिए या नहीं? कृष्ण भगवान कहते हैं कि अगर तुम सिर्फ इसलिए मंदिर जाओ या दोस्तों की मदद करो ताकि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें या कोई इनाम मिले, तो वह काम सच्चा नहीं है। असली अच्छाई तब होती है जब हम बिना किसी दिखावे और बिना किसी पुरस्कार के दिल से दूसरों की भलाई करते हैं।
दैनिक चिंतन
अगर हमारा किसी भी धर्म या सेवा का आधार 'दम्भ' (दिखावा) है, तो वह वास्तविक नहीं हो सकता और न ही उसमें शांति मिल सकती है। प्रिय पाठक, आज आपने जो कुछ किया, उसे अपने अहंकार को पोषित करने के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की इच्छा से करना चुनिए। जब हम फल की चिंता छोड़कर शुद्ध भाव से कार्य करते हैं, तो वही कर्म हमें राजसिक बाधाओं से मुक्त करता है और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन में एक क्षण रुकें और पूछें कि क्या मैं जो भी कर रहा हूँ, उसे सिर्फ दिखावे के लिए या किसी फल की आकांक्षा रखकर किया जा रहा है? इस दम्भ और फल-लाभ की भावना को छोड़कर कार्य को स्वयं भगवान को अर्पित करने का संकल्प लें।
मुख्य शिक्षाएँ
- दम्भार्थं यज्ञ: दिखावे की परीक्षा
यदि कोई कर्म या पूजा केवल समाज में अपनी छवि सुधारने या प्रसिद्ध होने के लिए किया जाता है, तो वह 'राजसिक' स्वरूप का होता है। इस प्रकार की आस्था अस्थायी होती है और यह व्यक्ति को गहरी शांति से वंचित रखती है। - फलप्राप्ति में फंसना
कर्म करने का मुख्य उद्देश्य केवल स्वयं कर्तव्य पालन होना चाहिए, न कि किसी भौतिक या मानसिक फल की अपेक्षा। जब फल की आकांक्षा कार्य को नियंत्रित कर लेती है, तो वह यज्ञ राजसी बन जाता है जो मोक्ष का मार्ग रोकता है। - राजसिक कर्म से पार
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि दम्भ और फल-लाभ की भावना वाले यज्ञों का परिणाम केवल भोग या पुनः जन्म हो सकता है। सच्ची आस्था (सात्विक) तब होती है जब कर्म बिना किसी स्वार्थ, दिखावे या अपेक्षा के समर्पित किया जाए।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक राजसिक कर्मों से मुक्ति के लिए 'कर्म फल त्याग' का मूल सिद्धांत प्रस्तुत करता है।
- 3.9 — इसमें बताया गया है कि कैसे यज्ञ को छोड़कर कर्म करने वालों पर बंधन नहीं होते, जो इस विषय का सीधा पूरक है।
- 17.20 — राजसिक और सात्विक दान के बीच अंतर स्पष्ट करता है ताकि हम अपनी आस्था की शुद्धता को समझ सकें।
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