भगवद्गीता 14.12

Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 14.12 — "हे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अ"
भगवद्गीता 14.12 — Gunatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा | रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ||१४-१२||

लिप्यंतरण

lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā . rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha ||14-12||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह बता रहे हैं कि जब मनुष्य के मन में 'रजोगुण' (उत्तेजना और चंचलता) प्रबल हो जाता है, तो पाँच मुख्य विकार जन्म लेते हैं। ये विकार हैं: लोभ (अत्यधिक इच्छा), कर्मों का अराध्दिक आरंभ बिना विचार के, शम (आत्म-नियंत्रण) की अनुपस्थिति और निरंतर स्पृहा या तड़प। यह श्लोक हमें समझाता है कि रजोगुण के प्रभाव में मानव मन अशांत होकर न्यायसंगत कार्य नहीं, बल्कि फल-लाभ की लालसा में चलने लगता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक संख्या दर्शन और गीता के 'गुणत्रयी' (तीन गुणों) के सिद्धांत पर आधारित है, जो प्राकृतिक अवस्थाओं की व्याख्या करता है। यह कर्म योग की तैयारी का हिस्सा है क्योंकि एक साधक को पहले अपने मन में प्रबल रजोगुण और उसके विकारों (लोभ, स्पृहा) की पहचान करनी होगी ताकि वे उसे ज्ञान द्वारा पार कर सकें। यह सिद्धांत बताता है कि कर्म और उसका फल-लाभ के प्रति अतिसंलग्नता रजोगुण का प्रमुख लक्षण है, जिसे दमन करने से ही सात्विक स्थिति में पहुँचा जा सकता है।

शब्दार्थ
लोभः greed, प्रवृत्तिः activity, आरम्भः the undertaking, कर्मणाम् of actions, अशमः restlessness, स्पृहा longing, रजसि in Rajas, एतानि these, जायन्ते arise, विवृद्धे having become predominant, भरतर्षभ O best of the Bharatas (or O Lord of the Bharatas)
पारंपरिक भाष्य
Greed Covetousness Desire to appropriate the property of others a desire to possess more wealth though one has sufficient already. Pravritti Action in general. Asamah Restlessness being agitated by joy, attachment, etc. I will do this and then I wil take up that action. After finishing the second? I will take up the third, and so on. There is no end to the continuity of desire, will and action. This is called Asama or restlessness. Spriha Thirsting or longing for all sensual objects in general. These are the characteristic marks that indicate that Rajas is predominant. Do not mistake Rajasic restlessness or Rajasic movements for Karma Yoga or divine activity. People may say that they are doing selfless service to the world, but if you analyse their motives,there will be the taint of personal desire in some form or other. Many persons cannot sit iet even for a moment. They think that moving about here and there or doing some action or other is to full of life. The Yogi or sage who sits still by calming the mind, who does nothing at all physically, is the most active man in the whole world whereas the man who runs here and there and who is always very busy does nothing at all. This may be paradoxical to you. Very few can comprehend the truth of this statement. Sattva is intense activity. A wheel that revolves very rapidly appears to be at rest. So is Sattva. So is a Sattvic man.

यह कहाँ घटित होता है

कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर, महाभारत के मध्य, जब पांडवों की सेना और कौरवों का सामना होने वाला था, अर्जुन विषाद (उदासी) में डूबे हुए थे। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें ज्ञान दिया कि रक्तपाप के लिए वे क्यों नहीं लड़ रहे हैं। इस श्लोक के संदर्भ में, कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि उनके विचारों में जो चंचलता और भय है, वह 'रजोगुण' का प्रभाव हो सकता है। उन्होंने कहा (14.5) कि यह गुण धर्म से बंधने के लिए उत्पन्न होता है, और इस श्लोक में वे स्पष्ट करते हैं कि इसके परिणामस्वरूप कौन-से पांच विकार जन्म लेते हैं ताकि अर्जुन अपने मन की स्थिति को पहचान सकें।

आज के जीवन में

आधुनिक कार्यस्थल पर, जब कोई व्यक्ति प्रोत्साहन के रूप में बोनस या promotion की लालसा (लोभ) और तुरंत नतीजे की अपेक्षा से भरा होता है, तो रजोगुण का प्रभाव देखने को मिलता है। ऐसे समय में व्यक्ति बिना गहराई से सोचे कठिन परियोजनाओं को आरंभ करता है लेकिन जब परिणाम नहीं मिलते तो उसे तुरंत थकान और अशांति (अशम) महसूस होती है, जिससे उसकी श्रद्धा और ध्यान खो जाता है। यह स्थिति तब भी देखी जा सकती है जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के लिए या अपनी भावनाओं को शांत रखने में विफल रहता है क्योंकि वह निरंतर कुछ नया मांग रहा होता है, जिससे घरेलू वातावरण अशांत हो जाता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे तुम बहुत ज्यादा खिलौनों या मीठाई को देख रहे हो और तुम्हें सब कुछ चाहिए, लेकिन तुम सुनते नहीं कि कब रुक जाना है। जब हमारे मन में 'रजोगुण' (एक चंचल शक्ति) हावी होता है, तो जैसे बच्चे जो चाहते हैं उसे तुरंत लेने की कोशिश करते हैं। इससे लोभ पैदा होता है, काम करना शुरू करने का बेतहाशा ज़ोर लगता है और हमें शांति नहीं मिलती क्योंकि हमेशा कुछ नया मांगना शुरू हो जाता है। कृष्ण कहते हैं कि जब यह चंचल भाव बढ़ेगा तो हम अक्सर सोच-समझकर काम करने के बजाय सिर्फ चाहत में चल पड़ेंगे।

दैनिक चिंतन

आज जब आप किसी चीज़ को पाने के लिए बेचैन हैं या बिना सोचे-समझे कार्य शुरू करने लगते हैं, तो जान लें कि यह रजोगुण का प्रभाव है जो आपको बांध रहा है। यह क्षण आपके भीतर की गहराई में जाकर देखने और 'शम' को वापस बुलाने के लिए सबसे उपयुक्त समय है। याद रखें, हे मनुष्य, जब तक आप इन अस्थिर इच्छाओं पर काबू नहीं पातेंगे, तब तक आपको सच्ची शांति और स्थिरता कभी प्राप्त न होगी।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन में उत्पन्न होने वाले नए लोभ या अनियंत्रित इच्छाओं को देखें और समझें कि यह रजोगुण की वृद्धि का संकेत है। इन बुरी प्रवृत्तियों के पीछे छिपी चेतना से जुड़कर, अपने कर्मों में शांति और संयम वापस लाने की इच्छा को मजबूत करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. रजोगुण की पंचक (पंचक)
    भगवान कृष्ण बताते हैं कि रजोगुण बढ़ने पर चार मुख्य बुराइयाँ पैदा होती हैं: लोभ, अत्यधिक प्रवृत्ति, आरम्भ का उन्माद और शम की अनुपस्थिति। ये सभी गुण मानसिक शांति को नष्ट करके व्यक्ति को कर्मों के चक्कर में फंसाने का कार्य करते हैं।
  2. शम का अभाव: आंतरिक संतुलन की हार
    'शम' या शरीर और मन पर नियंत्रण का न होना रजोगुण के सबसे खतरनाके प्रमाण हैं। जब यह गुण बढ़ता है, तो व्यक्ति बाहरी सुखों के पीछे भागने लगता है और भीतरे स्थिरता को भूल जाता है।
  3. संयम का मार्ग
    इस श्लोक हमें यह सीखाता है कि जब लोभ या असंतुलन महसूस हो, तो तुरंत अपने आंतरिक संतुलन को पुनः स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। केवल बाहरी गतिविधियों से मुक्त होकर ही हम ब्रह्म की ओर बढ़ सकते हैं।

विषय

रजोगुण का प्रभावमन की चंचलता और अशांतिलोभ और स्पृहा के कारणकर्मों में आत्म-नियंत्रण (शम) की अनुपस्थितिगुणत्रयी विभाग योग का सारब्रह्म ज्ञान के लिए मन को शोधना

संबंधित श्लोक

2.473.304.186.518.66

आगे पढ़ें

  1. 14.7 — इसे पढ़ें ताकि यह समझा जा सके कि रजोगुण को प्रकाश और ज्ञान से कैसे अलग किया जाता है, जो इस श्लोक की समस्या का समाधान देता है।
  2. 2.59 — इस अनुच्छेद में संन्यासी के लक्ष्य और इंद्रिय निग्रह पर चर्चा है, जो 'शम' की कमी को दूर करने का व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत करता है।
  3. 3.27 — यह श्लोक बताता है कि कैसे हमें यह समझना चाहिए कि गतिविधियां स्वभाव (प्रकृति) द्वारा की जा रही हैं, न कि अहंकार द्वारा।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रजोगुण के प्रभाव में 'अशम' (आत्म-नियंत्रण) की अनुपस्थिति से क्या तात्पर्य है?
'अशम' का अर्थ है आत्म-दमन या शम न होना। जब रजोगुण हावी होता है, तो व्यक्ति अपने इच्छाओं और क्रोध पर नियंत्रण खो देता है और बिना विचार किए कर्म करने लगता है। यह स्थिति मनुष्य को अशांत बनाती है क्योंकि वह अपनी प्रवृत्तियों का दास बन जाता है।
क्या रजोगुण बुरा होता है या इसे पूर्ण रूप से त्यागना चाहिए?
रजोगुण स्वयं में 'बुरा' नहीं है, क्योंकि यह कर्म करने और प्रयास करने के लिए आवश्यक शक्ति देता है। हालाँकि, जब यह अत्यधिक बढ़ जाता है (विवृद्ध), तो लोभ और अशांति जन्म लेते हैं जो मुक्त होने की बाधा बन जाते हैं। सही दृष्टिकोण इसे संतुलित करना या उससे ऊपर उठना है, न कि कर्मों को छोड़ देना।
आज के समय में रजोगुण का प्रभाव कैसे पहचाना जा सकता है?
यदि आप लगातार कुछ हासिल करने की लालसा (लोभ) और निरंतर तड़प (स्पृहा) महसूस करते हैं, तो यह रजोगुण के बढ़ने का संकेत है। इसके साथ ही यदि आप बिना सोचे-समझे काम शुरू कर रहे हैं लेकिन बीच में थकान या अशांति आ रही है, तो यह भी इसका लक्षण है।
'भरतर्षभ' शब्द का संदर्भ और महत्व क्या है?
यह भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को संबोधित करने के लिए प्रयोग किया गया एक सम्मानजनक नाम है, जिसका अर्थ 'भारत वंश में श्रेष्ठ' या 'अर्जुन' होता है। यह संदर्भ बताता है कि भगवान कृष्ण अर्जुन को उसकी क्षमता और महत्व के लिए याद दिला रहे हैं ताकि वे रजोगुण की चंचलता से ऊपर उठ सकें।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 14.12 →