भगवद्गीता 14.7
Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् | तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ||१४-७||
rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam . tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam ||14-7||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि 'रजोगुण' (उत्साह और लालच का गुण) रागात्मक है, जिसका सीधा स्रोत तृष्णा और आसक्ति होती है। यह गुरु भारी देही या जीवात्मा को कर्मों की फल-आशा से बांधकर जन्म-मरण के चक्र में पटकता रहता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जब तक हम किसी काम के परिणाम पर अटूट आसक्ति रखेंगे, तब तक हम निरंतर बद्ध ही रहेंगे।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक सांख्य दर्शन और कर्म योग के सिद्धांतों पर आधारित है जो गुण-त्रय (सत्त्व, रज, तम) की प्रकृति को समझने का विस्तार करता है। यह 'बन्धन' (bandha) और 'निर्लिप्तता' (detachment) के गहन सिद्धांतों को विकसित करके बताता है कि कैसे मनुष्य स्वयं की आकांक्षाओं द्वारा ही बंधन में फंस जाता है। यह ज्ञान योग का वह हिस्सा है जो हमें पहचानने देता है कि कर्म सत्य हैं, लेकिन उनमें लगी हुई 'आसक्ति' ही दुःख और पुनर्जन्म की मूल वजह है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित है, जहाँ पांडवों और कौरवों का भयानक संघर्ष शुरू होने वाला था। अर्जुन ने अपने गुरुओं और परिवार को मारने से इनकार कर दिया था और वे शोक व विचारों के समुद्र में डूबे हुए थे, जिस पर श्रीकृष्ण उन्हें सांत्वना देकर गुण-त्रय की चर्चा कर रहे हैं। इस समय तक अर्जुन ने 'सात्त्विक' (ज्ञान) और 'तमोगुणी' (अज्ञान/मोह) के बारे में सुना था, अब श्रीकृष्ण उन्हें तीसरे गुण, रजोगुण का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं।
आज के जीवन में
आधुनिक जीवन में यह श्लोक उस व्यक्ति पर लागू होता है जो नौकरी या व्यापार के प्रति अत्यधिक लालसी होकर काम करता है, लेकिन परिणाम मिलने की चिंता (तृष्णा) उसे तनाव और अनिद्रा से ग्रस्त कर देती है। ऐसे में व्यक्ति कर्मों को 'अर्पित' करने का भूल जाता है और केवल फल पर निर्भर होकर खुद को बांध लेता है, जिससे वह असंतुष्ट रहता है। इस स्थिति से मुक्ति के लिए हमें यह समझना होगा कि प्रयास करना अपना कर्म है, लेकिन सफलता या विफलता का परिणाम स्वीकार करना ही वास्तविक आजादी है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो तुम्हें एक नया खिलौना पसंद आ गया है और तुम उसे बहुत चाहते हो (यही 'तृष्णा' या भूख है)। जब तुम्हारा ध्यान सिर्फ उसी खिलौने पर रहता है, तो तुम किसी अन्य बच्चे के साथ खेलना भूल जाओगे और फिर भी वह खिलौना मिले तक चिंतित रहोगे (यही 'आसक्ति' या बांधन)। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब हमें कोई चीज़ बहुत ज्यादा पसंद आती है, तो हम उसी के पीछे भागते-भाग थक जाते हैं और स्वतंत्र होकर खेलना भूल देते हैं; असली खुशी तब मिलती है जब हम किसी एक चीज की ललक से मुक्त होते हैं।
दैनिक चिंतन
देखो, जब भी तुम्हें किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक लालसा या चिपकाव महसूस होता है, तो समझ जाओ कि 'रजोगुण' ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया है। यह वह शक्ति है जो तुम्हारे कर्मों की आसक्ति से तुममें बांधन पैदा करता है और तुम्हें अंततः दुख में डाल देता है। आज के दिन जब भी कोई नया वास्ते या तृष्णा उठे, तो इसे पहचानो कि यह एक 'राग' (आसक्ति) की अवस्था है जो आत्मा को कर्मों से बंधा रहा है, और धीरे-धीरे इससे मुक्त होने का प्रयास करो।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपनी आसक्तियों और तृष्णाओं पर ध्यान दें, जो आपको कर्मों में फंसाए रखती हैं। मन को शांत करके यह प्रश्न पूछें: 'क्या मैं अपने रोजमर्रा के कार्यों से बंधा हूँ या उनमें निपुण?' एक क्षण के लिए इन बाहरी आकर्षकों से दूर होकर अपनी वास्तविक आत्मा की पहचान करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- रजोगुण: राग और तृष्णा की उत्पत्ति
श्रीकृष्ण बताते हैं कि रजोगुण स्वभावतः 'रागात्मक' है, जिसका अर्थ है यह लालसा और आसक्ति को जन्म देता है। जब मन किसी वस्तु या परिस्थिति से जुड़ने की इच्छा रखता है, तो यही गतिशील शक्ति उसमें 'तृष्णा' (बेचैनी) पैदा करती है। - कर्मों के प्रति आसक्ति: बंधन का कारण
यह गुण देही को कर्मों की आसक्ति से बांधता है, जिससे व्यक्ति अपने कार्य और उनके परिणामों में अटका रह जाता है। इस प्रकार, रजोगुण मानव को स्वतंत्र चेतना के स्थान पर भौतिक कार्यों का दास बना देता है। - मोक्ष की ओर कदम: आसक्ति से मुक्ति
इस बांधन को तोड़ने के लिए हमें यह समझना होगा कि तृष्णा और राग ही वे श्रृंखलाएं हैं जो देही को बद्ध रखती हैं। जब हम इन आकर्षणों की प्रकृति को पहचानते हैं, तो हम कर्मफल में लीन होने के बजाय निष्काम भाव से कार्य कर सकते हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.61 — इसके बाद यह पढ़ना चाहिए कि कैसे इंद्रियों पर नियंत्रण पाकर मनुष्य को रजोगुण के प्रभाव से मुक्त किया जा सकता है।
- 3.27 — यह श्लोक समझाता है कि कैसे हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि सभी कार्य गुणों द्वारा किए जा रहे हैं, न कि स्वयं आत्मा द्वारा।
- 14.20 — अंत में इस श्लोक का पाठ करें जो बताता है कि कैसे मनुष्य तीनों गुणों से पार होकर ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है।
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