भगवद्गीता 14.11
Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते | ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ||१४-११||
sarvadvāreṣu dehe.asminprakāśa upajāyate . jñānaṃ yadā tadā vidyādvivṛddhaṃ sattvamityuta ||14-11||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जब इस शरीर के सभी इन्द्रियों (आँख, कान आदि) में ज्ञान का प्रकाश फैल जाता है और व्यक्ति धर्म की ओर मुड़ता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्त्वगुण उसमें प्रबल हो गया है। यह श्लोक बताता है कि हमें बाहरी कृत्यों से नहीं बल्कि आंतरिक ज्ञान के उदय से गुणों की पहचान करनी चाहिए। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि सत्त्वगुण का लक्षण अज्ञान और मोह में छिपा रहना नहीं, बल्कि स्पष्टता और समझ का प्रकट होना है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक सांख्य दर्शन और भगवद गीता के 'जिज्ञासा' (ज्ञान) मार्ग का एक केंद्रीय सिद्धांत है, जो बताता है कि मोक्ष की ओर बढ़ने वालों में ज्ञान कैसे प्रकट होता है। यह सत्त्व-प्रधान अवस्था को 'विवृद्ध' या पूर्ण विकसित मानता है, जो कर्म योग और भक्ति के लिए एक आवश्यक आधारभूत स्थिति (साधना) की ओर इशारा करता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई उपदेशों का हिस्सा है, जहाँ वे पाँचवें अध्याय के बाद तीसरे गुण (राजस और तमस) की चर्चा कर रहे हैं। इससे ठीक पहले कृष्ण ने बताया था कि कैसे प्रत्येक व्यक्ति में इन तीन गुरुओं का मिश्रण रहता है, जो उसे बंधन या मुक्ति देते हैं। अर्जुन अभी भी संदेह और विचलित मन की स्थिति से गुजर रहे थे, इसलिए कृष्ण उन्हें यह समझा रहे थे कि कैसे वे अपने मन को 'सत्त्व' (शुद्धि) के स्तर पर ले जाएं ताकि वे सही निर्णय ले सकें।
आज के जीवन में
आज की दुनिया में जब हम किसी बड़े फैसले, जैसे नौकरी बदलने या रिश्ते को सुधारने से डर रहे होते हैं, तो अक्सर भ्रम और घबराहट (तमस) हावी होती है। जीवन का यह प्रयोग बताता है कि अगर आपका मन शांत हो जाए, आपको सच की पहचान होने लगे और सभी इन्द्रियां एक स्पष्ट दिशा में केंद्रित हों, तो समझें कि आपके भीतर 'सत्त्व' जाग रहा है। उदाहरण के लिए, जब किसी तनावपूर्ण कार्यक्षेत्र में आप बिना गुस्से या डर के शांत मन से समस्या का समाधान सोच पाते हैं, यह वही ज्ञान-प्रकाश है जो आपको सफलता की ओर ले जाता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बच्चों, सोचो जैसे एक कमरे के सभी दरवाजे खोल दिए जाएं तो सूरज की रोशनी पूरा घर चमका देती है। ठीक वैसे ही जब हमारी आँखें और कान ज्ञान से भरी हो जाती हैं, तब पता चल जाता है कि 'सुई' (सत्त्व) नाम का गुण अब सबसे ज्यादा ताकतवर हो गया है। यह उस समय की बात होती है जब अर्जुन के मन में सफाई और समझ आती है, ठीक जैसे बादलों हटने पर चमकदार सूर्य निकलता है।
दैनिक चिंतन
आपके शरीर और मन के सभी द्वारों पर ज्ञान की रोशनी फैलना एक बड़ी सफलता है, क्योंकि यह दर्शाता है कि आप अपने अस्तित्व को गहराई से समझ रहे हैं। जब भी कोई विचार आपके पास आता है जो आपको डरावने या भ्रमित करने के बदले स्पष्ट और हल्का बना देता है, तो उसे सत्त्वगुण की वृद्धि मानें। आज आप इस प्रकाश को अपनी दैनिक गतिविधियों में कैसे बढ़ा सकते हैं? यह सोचते रहें कि आपके व्यवहार में कौन सी चीज़ अब अधिक स्पष्ट और सुखद बन रही है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने सारे इन्द्रियों के द्वारों पर ध्यान केंद्रित करें और देखें कि ज्ञान का प्रकाश कहाँ-कहाँ जागृत हो रहा है। जब भी आप किसी विचार या कार्रवाई में स्पष्टता, शांति और शुद्धि को महसूस करते हैं, तो समझ लें कि सत्त्वगुण उस क्षण वर्धमान हुआ है। इस प्रकाश के साथ अपने अंतरात्मा को जोड़ते हुए कुछ पल अधिक धीरे सांस लेने का अभ्यास करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- इन्द्रियाँ ज्ञान के द्वार हैं
शरीर के सभी संवेदनशील अंग (आंखें, कान आदि) गुरुत्वाकर्षण की शक्ति को प्रकाशित करने वाले द्वारों की तरह कार्य करते हैं। जब इनके माध्यम से ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्त्वगुण वर्धमान हो रहा है। - सत्त्वगुण की पहचान
कृष्णा ने विस्तार से बताया है कि जब अज्ञान और तमोगुण के कोहरे में घिरी दशाओं का स्थान ज्ञान का प्रकाश ले लेता है, तो सत्त्वगुण की वृद्धि मानी जाती है। यह अवस्था व्यक्ति को आत्म-संयम और शांति की ओर अग्रसर करती है। - प्रकाश का उत्पन्न होना
'उत्पन्न' शब्द इस बात पर जोर देता है कि ज्ञान एक स्थिर अवस्था नहीं, बल्कि सक्रिय प्रक्रिया है जो निरंतर विकसित होती रहती है। यह सत्त्वगुण की चमक तब तक बढ़ती जाती है जब तक व्यक्ति अपने कर्मों और विचारों में शुद्धता बनाए रखे।
विषय
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आगे पढ़ें
- 14.6 — इस श्लोक में कृष्णा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के मूल गुणों का विस्तृत वर्णन करते हैं।
- 14.26 — यह श्लोक बताता है कि सत्त्वगुण को प्राप्त करने वाले व्यक्ति कृष्णा की परम सेवा कैसे कर सकता है और उनसे जुड़ सकता है।
- 18.20 — अध्याय 18 में, यह श्लोक सत्त्वगुण के आधार पर कर्म का अर्थ समझने की एक स्पष्ट परिभाषा प्रदान करता है।
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