भगवद्गीता 9.8

Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 9.8 — "प्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्"
भगवद्गीता 9.8 — Raja Vidya Raja Guhya Yoga
संस्कृत

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ||९-८||

लिप्यंतरण

prakṛtiṃ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ . bhūtagrāmamimaṃ kṛtsnamavaśaṃ prakṛtervaśāt ||9-8||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे अपनी स्वयं की प्रकृति (महान सामर्थ्य) के अधीन रहते हुए, इस संपूर्त विश्व और सभी जीवों को बार-बार रचते हैं। यह दर्शाता है कि भगवान स्वयं निर्माता नहीं हैं बल्कि वे उस शक्ति का प्रयोग करते हैं जो उनकी ही है। मुख्य शिक्षा यह है कि यदि आप अर्जुन या कोई भी व्यक्ति समझ ले तो वह जान सकता है कि सभी जीव इस प्राकृतिक नियम के अधीन कठोर रूप से कार्य कर रहे हैं और अंततः उसी पर लौटते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह शिक्षा 'संख्य योग' (Sankhya Yoga) के सिद्धांतों का गहरा विकास करती है, जहां भगवान को संचालक और प्रकृति को सामान्य कार्यकर्ता माना गया है। यह कर्मयोग की अवधारणा पर आधारित है कि जब तक व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति से स्वयं के अहंकार को नहीं हटा देता, तब तक वह अपने कार्यों का फल भोगने में बंधा रहता है। इसमें 'अवश्य' (helpless) शब्द उस अवस्था को दर्शाता है जब जीवात्मा अपनी इच्छाशक्ति के बिना प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित होती है, जो ज्ञान योग और भक्तियाँ की ओर ले जाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।

शब्दार्थ
प्रकृतिम् Nature, स्वाम् My own, अवष्टभ्य having animated, विसृजामि (I) send forth, पुनः again, पुनः again, भूतग्रामम् multitude of beings, इमम् this, कृत्स्नम् all, अवशम् helpless, प्रकृतेः of Nature, वशात् by force
पारंपरिक भाष्य
The Lord leans on, presses or embraces Nature. He invigorates and fertilises Nature which had gone to sleep at the end of the Mahakalpa or universal dissolution and projects again and again this whole multitude of beings. He gazes at each level and plane after plane comes into being. The term Prakriti denotes or indicates the five Kleshas or afflictions, viz.? Avidya (ignorance)? Asmita (egoism)? Raga (likes)? Dvesha (dislikes) and Abhinivesa (clinging to earthly life). (Cf. IV.6)

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर हुआ है जहां अर्जुन ने भीम को रोकने की बात करके अपने विषाणुओं (बाण) गिराने और लड़ाई न करने का निर्णय लिया था। भगवान कृष्ण, जो अब तक अर्जुन के चेतना में उनकी उदासी और संदेह को दूर करते आए हैं, इस श्लोक के माध्यम से उन्हें यह समझा रहे हैं कि वह स्वयं सृष्टि का रचनाकर्ता है। कुरुक्षेत्र की लड़ाई सिर्फ एक भौतिक युद्ध नहीं था, बल्कि अर्जुन को उस आध्यात्मिक वास्तविका के बारे में बताया जा रहा था जिसमें वे और उनके सभी शत्रु भी प्रकृति के नियमों का पालन कर रहे हैं।

आज के जीवन में

मान लीजिए कि आप एक बड़े परियोजना मैनेजर हैं जो अपने टीम को लगातार नई चुनौतियों से निपटाने की उम्मीद रखते हैं, लेकिन प्रोजेक्ट बार-बार असफल हो रहा है। इस श्लोक का उपयोग करके आप यह समझ सकते हैं कि आप पूरी स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख सकते; कुछ चीज़ें समय और परिस्थितियों (प्रकृति) के कारण होती हैं। इसके बजाय चिंता करने की जगह, आपको अपनी शक्ति को सही दिशा में लगाते हुए अर्जुन की तरह कर्म करना चाहिए और परिणामों को उस प्रकृति पर छोड़ना चाहिए जो स्वभाव से चल रही है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

बच्चों, जैसे एक बड़ा कारखाना अपने मालिक की आज्ञा का पालन करते हुए हर रोज नई चीज़ें बनाता है, वैसे ही भगवान कृष्ण अपनी शक्ति के माध्यम से इस दुनिया को बार-बार खींचते हैं। वे कहते हैं कि यह पूरी दुनिया और उसमें रहने वाले सभी जीव (जानवर, पक्षी, पेड़) उनके नियंत्रण में आकर चल रहे होते हैं। जब आप सोचेंगे कि कृष्ण सब कुछ रोक सकते थे लेकिन फिर भी उन्होंने इसे अपने स्वभाव के अनुसार दोहराया, तो आपको समझ आएगा कि वे ही मूल स्रोत हैं और हम उनकी शक्ति का हिस्सा हैं।

दैनिक चिंतन

आज जब आप जीवन की किसी नई शुरुआत या बदलाव का अनुभव करेंगे, तो यह समझें कि वह आपके अपने भीतर छिपी उस अद्वितीय सृजनशक्ति (प्रकृति) का प्रभाव है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं उस शक्तिया के वश में होकर इस सम्पूर्ण विश्व को बार-बार रचते हैं, जो आपके भीतर भी काम कर रही है। इसलिए, जब आप जीवन की कोई चुनौती या नया अवसर देखेंगे, तो इसे एक पवित्र सृजन प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करें और आश्वस्त रहें कि यह सब उसी दिव्य इच्छा का फल है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने अंदर के वह सृजन शक्ति को पहचानें जो हर क्षण नया जीवन दे रही है। इस संकल्प के साथ बैठें कि आप उस प्रकृति में अपना विश्वास रखते हैं, जो आपके भीतर और बाहर सभी भूतों को पुनः-पुनः रचना करती रहती है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सर्वातंत्र सृष्टि का नियम
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि समस्त भूत-जगत स्वभाव की प्रकृति के वश में है, न कि व्यक्तिपरक इच्छाओं पर। कृष्ण यह बताते हैं कि वे उस सत्ता को अपने नियंत्रण में रखकर ही इस विश्व का पुनरुद्धार करते हैं।
  2. दिव्य चेतना की प्रेरणा
    'प्रकृतिं स्वामावष्टभ्य' से तात्पर्य है कि ईश्वर उस निर्जीव शक्ति को अपनी चेतना और दिशा देते हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर जीवित प्राणी की सृजन-क्रिया में परमात्म का स्पर्श निहित होता है।
  3. आविर्भाव और लय का चक्र
    'पुनः पुनः' शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि सृष्टि कभी एक बार नहीं, बल्कि निरंतर आकार लेती और टूटती रहती है। यह अनादि-अव्याहत चक्र हमें सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन ही नियति का स्वरूप है।

विषय

भगवान की सृष्टि शक्तिप्रकृति का नियंत्रणजीवों की प्रकृतिनियम और स्वभावआत्म-ज्ञानकर्ता और कर्म

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आगे पढ़ें

  1. 2.13 — यह श्लोक जन्म और मृत्यु के चक्र को समझने में मदद करेगा, जो 9वीं अध्याय की सृष्टि-वर्णन से सीधा जुड़ा है।
  2. 3.5 — कर्म और प्रकृति के संबंध को समझने के लिए यह श्लोक आवश्यक है, जो बताता है कि कैसे कर्मचारी स्वयं अपनी गतिविधियों में फंसते हैं।
  3. 13.20 — पुरुष और प्रकृति के भेद को स्पष्ट करने वाला यह श्लोक 9वीं अध्याय की 'प्रकृति' अवधारणा का गहरा विश्लेषण देता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'अवश' (helpless) शब्द का क्या अर्थ है?
यहाँ 'अवश' शब्द का तात्पर्य यह नहीं कि जीवात्मा बिल्कुल बेजान या असहाय है, बल्कि इसका मतलब है कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा के बिना प्रकृति की तीन गुणों (सत्व, रजोगुण और तमोगुण) द्वारा संचालित होते हैं। जब तक कोई व्यक्ति ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त नहीं करता, वह इन प्राकृतिक बलों का पालन करने के लिए बाध्य होता है।
भगवान कृष्ण स्वयं इस श्लोक में क्या कह रहे हैं?
कृष्ण कहते हैं कि वे अपनी प्रकृति (महान सामर्थ्य) को अपने वश में रखकर, बार-बार इस संपूर्त विश्व और सभी जीवों को रचते हैं। यह दर्शाता है कि भगवान स्वयं निर्माता नहीं हैं बल्कि वह शक्ति का प्रयोग करते हैं जो उनकी ही है, जिससे वे निरंतर सृष्टि बनाए रखने में सक्षम होते हैं।
क्या यह श्लोक बताता है कि हमारे पास कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है?
नहीं, इसका मतलब यही नहीं है; बल्कि यह कहता है कि जब तक व्यक्ति अपनी प्रकृति के गुणों से मुक्त नहीं होता, तब तक वह उनकी असीम शक्ति और नियमों में फंसा रहता है। गीता का उद्देश्य इस 'अवश' अवस्था को तोड़ना है ताकि भक्ता अपने कर्मों को स्वतंत्र इच्छा के साथ और ईश्वर की ओर समर्पित कर सकें, न कि प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित हो।
यह श्लोक 'राजविद्या राजगुह्य योग' (अध्याय 9) से कैसे जुड़ा है?
इस अध्याय में भगवान कृष्ण अपने सर्वशक्तिमान स्वरूप और संपूर्त विश्व को नियंत्रित करने की अपनी क्षमता का वर्णन करते हैं। श्लोक 9.8 इस बात को स्पष्ट करता है कि वे स्वयं प्रकृति के निर्माता हैं, जो उन्हें यह 'गुह्य' (राजसी) ज्ञान देती है कि सभी जीव उनके वश में आकर चलते हैं और अंततः उनमें ही लीन होते हैं।
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