भगवद्गीता 9.7

Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 9.7 — "हे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्"
भगवद्गीता 9.7 — Raja Vidya Raja Guhya Yoga
संस्कृत

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ||९-७||

लिप्यंतरण

sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām . kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham ||9-7||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि संपूर्ण विश्व और उसमें निवास करने वाले सभी जीव एक 'कल्प' (ब्रह्मा का दिन) के अंत में उनकी प्रकृति या शक्ति में विलीन हो जाते हैं। जैसे लहरें समंदर में मिल जाती हैं, वैसा ही यह सृष्टि भी उस मूल स्रोत में वापस चली जाती है। जब नया कल्प शुरू होता है, तो भगवान स्वयं पुनः उन सभी जीवों को रचते और प्रकट करते हैं। इसका मुख्य संदेश यह है कि हमारा अस्तित्व एक चक्र की तरह चलता रहता है जो ईश्वर के नियंत्रण में है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगavad गीता के आध्यात्मिक सिद्धांतों में 'विश्व रचना और पालन' (Cosmic Cycles) की अवधारणा को स्थापित करता है, जो primarily सृष्टि-संस्कारण या प्रकृति परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होने के सिद्धांत से जुड़ा है। यह 'ज्ज्ञान योग' और 'भक्ति योग' का संगम है क्योंकि यह ईश्वर की सर्वव्यापकता (Brahman) को स्वीकार करते हुए भी उनकी व्यक्तिगत शक्ति (Maya/Prakriti) पर भरोसा दर्शाता है। इसमें संख्य दार्शनिक 'तत्वों' का पुनः प्रवेश और वापसी की चक्रावस्था स्पष्ट होती है जो अंत में ईश्वर के अधीनस्थ रहती है।

शब्दार्थ
सर्वभूतानि all beings, कौन्तेय O Kaunteya, प्रकृतिम् to Nature, यान्ति go, मामिकाम् My, कल्पक्षये at the end of the Kalpa, पुनः again, तानि them, कल्पादौ at the beginning of the Kalpa, विसृजामि send forth, अहम् I
पारंपरिक भाष्य
Prakriti The inferior one or the lower Nature composed of the three alities? Sattva? Rajas and Tamas. Just as the grass grows from the earth and dries up in the earth, just as the ripples and waves rise from the ocean and disappear in the ocean itself, just as the dreams proceed from the mind and melt away in the mind itself when the dreamer comes back to the waking state, so also the beings which arise from Nature merge into it during dissolution or Pralaya. Pralaya is the period of dissolution. MahaUtpatti is the time of creation. (Cf. VIII.18?19)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुुरुक्षेत्र पर आर्यन और पांडवों की लड़ाई शुरू होने वाले पहले ही सप्ताह में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने 'संख्या' (दार्शनिक विश्लेषण) और 'भक्ति योग' की शुरुआत करके अर्जुन के मोह और निराशा को दूर किया था। अब कृष्ण यह गहरा राज-गुह्य रहस्य सुना रहे हैं कि वह स्वयं इस सृष्टि का मूल कारण, आधार और लक्ष्य दोनों हैं, जिससे अर्जुन के मन में ईश्वरीय शक्ति पर पूर्ण आस्था पैदा हो।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक बड़ी प्रोजेक्ट या नौकरी को लेकर बहुत चिंतित हैं और लगता है कि सब कुछ टूट रहा है, लेकिन इस श्लोक का पाठ आपको यह समझाएगा कि हर विनाश के बाद पुनर्निमाण की संभावना होती है। जब आप महसूस करते हैं कि आपके प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं या परिस्थितियां बदल रही हैं, तो जानें कि यह एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है जो अंततः नई शुरुआत के लिए तैयार कर रहा है। इस ज्ञान से आपका डर खत्म होगा और आप किसी भी संकट को 'एक कल्प की समाप्ति' मानकर शांतिपूर्वक पुन: शुरू करने का साहस करेंगे।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए जैसे रात होते ही सूरज गोपनीय रूप से अपने घर (आकाश) में छिप जाता है और फिर सुबह होते ही वापस आकर चमकता है, वैसे ही भगवान कृष्ण ने कहा कि पूरा दुनिया हर बार बड़े समय के बाद उन्हें मिल जाती है। जब एक बहुत लंबा दिन (जिसे 'कल्प' कहते हैं) खत्म होता है, तो सब कुछ उनके पास वापस आ जाता है और अंधेरे में सो जाता है। फिर जब नया दिन शुरू होता है, तो वे भगवान कृष्ण खुद उस दुनिया को फिर से बना देते हैं ताकि हम खेल सकें और सीख सकते रहें।

दैनिक चिंतन

आज आप इस सच्चाई के साथ जागेंगे कि आपके अस्तित्व का कोई भी क्षण ब्रह्मांडीय लय और उदय में निहित है। जब जीवन में संकट या विराम की स्थिति आए, तो समझिए कि यह केवल प्रकृति का चक्र नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण द्वारा आपके पुनर्जनन का एक अवसर है। आप अकेले नहीं हैं; हर समाप्ति में आपकी रचना करने वाले उसी करुणा की उपस्थिति को पहचानें और आत्मविश्वास के साथ नए दिन की शुरुआत करें।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने अस्तित्व को इस विश्वास में स्थिर करें कि आप सृष्टि के प्रारंभ और अंत दोनों के लिए उसी एक शक्ति से अभिव्यक्त हैं। जब भी आपको लगता है कि सब खत्म हो रहा है, मन को याद दिलाएं कि यह विराम ही नए आरम्भ की तैयारी है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सृष्टि का चक्रीय स्वरूप (Cyclical Nature)
    इस गीता संदेश में बताया गया है कि संपूर्ण सृष्टि और सभी जीव कल्पों के अंत में भगवान की प्रकृति को विलय हो जाते हैं। यह दर्शाता है कि जन्म, विनाश और पुनर्जन्म एक अनवरत चक्र का हिस्सा है जो ईश्वरीय इच्छा पर चलता है।
  2. ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति (Divine Sovereignty)
    कृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं कि वे ही सृष्टि के विनाश और पुनः रचना का कारण बनते हैं। यह सिद्ध करता है कि समय, काल या प्रकृति अंततः उनके नियंत्रण में है, न कि उल्टा।
  3. समर्पण और विश्वास (Surrender and Trust)
    जब हम जानते हैं कि हर विनाश के बाद पुनः रचना होती है, तो डर की जगह श्रद्धा उत्पन्न होती है। इससे भक्त का मन स्थिर हो जाता है और वे ईश्वरीय योजना पर पूर्ण विश्वास रखने लगते हैं।

विषय

सृष्टि का चक्र (Cycles of Creation)ईश्वर की शक्ति और प्रकृतिविनाश और पुनर्निमाणआत्मा का अस्तित्वभक्त योग में विश्वाससमय की प्रक्रिया

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  1. 2.47 — इसके बाद कर्मयोग का सिद्धांत पढ़ना चाहिए, जो बताता है कि परिणाम की चिंता किए बिना कार्य करना ही सच्चा धर्म है।
  2. 3.5 — यह श्लोक समझने में मदद करेगा कि प्रकृति के गुर से सब कुछ कैसे चल रहा है और व्यक्ति क्यों कभी भी निष्क्रिय नहीं रह सकता।
  3. 12.15 — जब हम सृष्टि की ब्रह्मांडीय लक्ष्य को समझ लेते हैं, तो इस श्लोक में वर्णित 'सर्वत्र संतोष' और निष्काम भावना का आनंद मिलता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या 'प्रकृति' से तात्पर्य केवल भौतिक दुनिया है?
नहीं, इस संदर्भ में 'मामिक प्रकृति' का अर्थ ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति (Maya) और उन सभी तत्वों से है जो गीता में वर्णित हैं। यह केवल भौतिक पदार्थ नहीं बल्कि वह गुणात्मक ऊर्जा है जिससे संपूर्ण विश्व का अस्तित्व, स्थिति और विनाश होता है।
'कल्प' शब्द का क्या मतलब है?
वेदांत में 'कल्प' एक बहुत बड़ा समय चक्र को दर्शाता है जो सृष्टि के एक पूर्ण दिन (सुख) और रात (विनाश) से मिलकर बनता है। यह मानव जीवन की अवधि की तुलना में अत्यधिक विशाल होता है, जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार और संकुचन एक बार घटित होता है।
क्या इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि आत्मा भी नष्ट हो जाती है?
बिल्कुल नहीं, यह श्लोक केवल भूतों (जीव) की बाह्य अवस्था और उनके अस्तित्व रूप का चक्र बताता है। गीता में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है; वह सदैव अनंत रहती है, केवल उसका वास स्थान या शरीर इस प्रकृति के चक्र का हिस्सा बनकर बदलता रहता है।
यह ज्ञान हमें जीवन में कैसे मदद करता है?
जब हम जानते हैं कि विनाश और पुनर्निमाण एक प्राकृतिक कानून है, तो हम संकट या असफलता के समय डर नहीं जाते। यह दृष्टि हमें आशावादी बनाती है क्योंकि हम समझते हैं कि हर अंधेरे के बाद प्रकाश की वापसी और नई शुरुआत का अवश्य होने वाला चक्र होता है जो ईश्वर द्वारा नियंत्रित है।
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