भगवद्गीता 15.1
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवानुवाच | ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् | छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ||१५-१||
śrībhagavānuvāca . ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam . chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit ||15-1||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन से संसार की प्रकृति का उपमा देते हुए कहते हैं कि यह ब्रह्म संपदा जैसी एक विशाल वृक्ष है जिसकी मूल आकाश में (परब्रह्म में) और शाखाएँ पृथ्वी पर नीचे की ओर फैली हुई हैं। इस अदृश्य वृक्ष के पत्ते वेद कहे गए हैं, क्योंकि वे इस जगत को समझने का मार्ग दिखाते हैं। जो व्यक्ति इस संसार-वृक्ष की वास्तविक प्रकृति और उसकी मूल स्रोत को जान लेता है, वह ही वेदों का असली ज्ञाता (वेदविद्) कहलाता है। यह श्लोक हमें बताता है कि सामान्य जीवन में फंसे रहने के बजाय इस वृक्ष की पहचान करके उससे मुक्त होना आवश्यक है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग के तहत आता है जो संसार की अनित्यता और ब्रह्म को समझने पर केंद्रित है। यह 'संक्या' दर्शन का एक गहरा प्रतीक है, जिसमें जीवों को इस वृक्ष से जुड़े रहकर या उसे जड़ो के माध्यम से मुक्त करके मोक्षा की ओर ले जाने वाली श्रेष्ठता (Purushottama) पर जोर दिया जाता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी-संवाद और अर्जुन की करुणा का परिणामस्वरूप दिया जा रहा है। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने अर्जुन को अपने दिव्य रूप (विश्वरूप) के बाद समझाया कि यह शरीर एक क्षणभंगुर वस्तु है और युद्ध का दायित्व निभाकर ही आत्मा की मुक्ति होती है। कुरुक्षेत्र पर अर्जुन गहरे संघर्ष में था, इसलिए भगवान ने उसे इस जटिल तत्वज्ञान को समझने के लिए 'अश्वत्थ वृक्ष' का सादा और स्पष्ट रूपक दिया ताकि वह बंधनों की प्रकृति को पहचान सके।
आज के जीवन में
आज के आधुनिक जीवन में, जब हम कार्यस्थल पर लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों (शाखाओं) और सामाजिक दबावों से घिरे रहते हैं, तो अक्सर यह लगता है कि हम असफल हो रहे हैं या भटक गए हैं। इस श्लोक का प्रयोग करते हुए आप देखेंगे कि अगर आप अपनी ऊर्जा को केवल 'शाखाओं' (परिणाम और बाहरी सफलता) पर केंद्रित करने की बजाय, उस मूल (आत्म-ज्ञान या ईश्वर से जुड़ाव) में वापस ले जाएं तो तनाव कम हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब किसी महत्वपूर्ण निर्णय का भ्रम होता है, तो यह समझना कि 'परिणाम' (शाखाएँ) अस्थायी हैं और 'कर्मयोग' (मूल से जुड़ाव) स्थायी है, आपको शांति प्रदान करता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो एक ऐसा विशाल पेड़ जो उल्टा लगा हुआ है, जैसे कोई लटकता हुआ झूला जिसकी जड़े आसमान में हों और डालियाँ नीचे की ओर पृथ्वी पर फैली हों। कृष्ण भगवान कहते हैं कि यह पूरा दुनिया इस उल्टे पेड़ का एक रूप है, और उसके हर पत्ते पर हमारी जीवन-शिक्षाएँ (वेद) लिखी हुई हैं। अगर कोई बच्चा समझ जाए कि असली जड़े कहाँ लगी हैं और कैसे उस पेड़ से अलग होकर ऊपर की ओर बढ़ना है, तो वह बहुत समझदार बन जाता है।
दैनिक चिंतन
प्यारे मित्र, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारा संसार एक ऐसा विशाल वृक्ष की तरह है जिसकी जड़ें आकाश में और शाखाएं धरती पर फैली हैं? यह समझना ही वास्तविक ज्ञान का मार्ग है जब तक हम इस अस्थिर संसार के बंधनों को नहीं तोड़ते, तब तक हम सच्चे सुख की ओर नहीं बढ़ सकते। आपका प्रत्येक कर्म और इच्छा इन शाखाओं में से एक-एक डाली बनकर आपको या तो आगे ले जाती है या पीछे खिंचती है। आज के दिन यह साधना करें कि आप उन बंधनों को काटने की शक्ति प्राप्त करें जो आपको इस भ्रमयुक्त जगत में बांधे हुए हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन की आंखों से उस अदृश्य वृक्ष को देखें जिसकी जड़ें स्वर्ग में हैं और शाखाएं पृथ्वी पर फैली हुई हैं। गहरी सांस लेते हुए यह कल्पना करें कि आपका वास इस संसार के बंधनों की ओर खिंचने वाले इन मूलों को तोड़कर, उस स्थिर अश्वत्थ वृक्ष में लगे होने का अनुभव कर रहे हैं जो कभी नहीं भ्रष्ट होता।
मुख्य शिक्षाएँ
- ऊर्ध्वमूल और अधःशाखा: वस्तुतंत्र की प्रकृति
श्री कृष्ण संसार को एक ऐसे अश्वत्थ वृक्ष के रूप में वर्णित करते हैं जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म) और शाखाएं नीचे (संसार/प्रलय) की ओर फैली होती हैं। यह दर्शाता है कि इस दुनिया का स्रोत ईश्वरीय है, परंतु इसके प्रभाव हमारी निम्न भौतिक इच्छाओं और कर्मों में दिखाई देते हैं। - वेद: वृक्ष के पर्ण
इस अमर संसार-वृक्ष की पत्तियां वेद मंत्र माने गए हैं, जो इस जगत के नियमों और धर्म का मार्गदर्शन करते हैं। जिस व्यक्ति ने इन वेदों को समझ लिया है और उनके द्वारा जीवन जीने वाला है, वही सच्चे अर्थ में 'वेद-विद्' या वास्तविक ज्ञानी कहलाता है। - अस्थिर से स्थिर की ओर: मोक्ष का मार्ग
यह वृक्ष 'अव्यय' (नष्ट न होने वाला) नहीं, बल्कि इसका मूल और स्रोत अव्यय है; संसार स्वयं निश्चलता से मुक्त है। ज्ञानी पुरुष उसी स्थिर आधार को जानने के लिए इस भ्रमयुक्त वृक्ष की शाखाओं (इंद्रियों, मन और बुद्धि) का त्याग करके आत्म-साक्षात्कार करते हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 15.2 — यह श्लोक उसी वर्णन को आगे बढ़ाता है और बताता है कि इस वृक्ष की शाखाएं, जड़ें और पत्तियां कैसे अज्ञान के कारण फैली हुई हैं।
- 15.3 — यह श्लोक स्पष्ट करता है कि हमें इस संसार-वृक्ष से कभी भी बंधन नहीं होना चाहिए, और उसी स्थिर आधार की ओर मुड़ने का आदेश देता है।
- 15.7 — यह श्लोक बताता है कि कैसे हमारे जीव-आत्माएं इस वृक्ष के शाखाओं (इंद्रियों) में फंसकर संसार का अनुभव करती हैं, जो आगे की समझ को गहरा बनाएगा।
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